डूसू चुनाव 2026: एनएसयूआई का टिकट कटा, दीपांशु शौकीन ने निर्दलीय लड़कर 30,615 वोटों से जीता उपाध्यक्ष पद
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) के 2026 चुनाव में उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने 30,615 वोट हासिल कर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) द्वारा टिकट न दिए जाने के बाद शौकीन ने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा और अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी से लगभग दोगुने वोट हासिल करके जीत का परचम लहराया।
मतदान के आँकड़े और जीत का अंतर
उपाध्यक्ष पद के लिए कुल 60,854 वोट डाले गए। दीपांशु शौकीन को 30,615 वोट मिले, जबकि इशू मौर्या को 16,910, वीर चतरथ को 4,313 और अरण्य सिंह राठौड़ को 2,274 वोट मिले। शौकीन और दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार के बीच 13,705 वोटों का अंतर इस जीत को और भी उल्लेखनीय बनाता है।
गौरतलब है कि किसी बड़े छात्र संगठन के समर्थन के बिना, केवल व्यक्तिगत लोकप्रियता और ज़मीनी संपर्क के दम पर इतनी बड़ी जीत हासिल करना असाधारण माना जा रहा है। डीयू से जुड़े छात्रों के बीच शौकीन की स्वीकार्यता और पहुँच का यह सबसे बड़ा प्रमाण है।
विजेता की प्रतिक्रिया
जीत के बाद दीपांशु शौकीन ने कहा, 'छात्रों ने मुझ पर भरोसा किया है। मैंने सिर्फ उनकी आवाज बनने की कोशिश की है। अब जिम्मेदारी और बढ़ गई है। मेरा वादा है कि छात्रों के हित के लिए डूसू जवाबदेह बनेगा।' शौकीन ने यह भी कहा कि चुनाव प्रचार के दौरान किए गए वादों को वह नहीं भूलेंगे और अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाएँगे।
तीन अन्य पदों पर एबीवीपी का दबदबा
डूसू के शेष तीनों प्रमुख पदों — अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव — पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के उम्मीदवार विजयी रहे।
अध्यक्ष पद के लिए कुल 60,845 वोट डाले गए, जिनमें एबीवीपी के यश डबास को 24,576 और एनएसयूआई के विजय शंकर मीणा को 22,523 वोट मिले। इस पद पर 4,310 छात्रों ने नोटा का विकल्प चुना, जो एक उल्लेखनीय आँकड़ा है।
सचिव पद के लिए 60,776 वोट पड़े। एबीवीपी की रिया छावड़ी को 21,650 और एनएसयूआई की नम्रता चौधरी को 14,869 वोट मिले। पंकज कुमार को 7,639 और नोटा को 7,884 वोट प्राप्त हुए।
संयुक्त सचिव पद के लिए 60,825 वोट डाले गए। एबीवीपी के लक्ष्यराज सिंह को 16,615, विशेष यादव को 15,778, एनएसयूआई के गोपाल चौधरी को 15,206 और नोटा को 7,389 वोट मिले। यह सीट महज़ 837 वोटों के अंतर से एबीवीपी के खाते में गई।
आम जनता पर असर और राजनीतिक संदेश
यह ऐसे समय में आया है जब केंद्रीय विश्वविद्यालयों की छात्र राजनीति में बड़े दलों के छात्र संगठनों का वर्चस्व लगातार बना रहा है। शौकीन की जीत यह संकेत देती है कि छात्र मतदाता पारंपरिक दलीय ढाँचे से इतर व्यक्तित्व और जमीनी जुड़ाव को प्राथमिकता देने लगे हैं। यह एनएसयूआई के लिए एक महत्वपूर्ण सबक भी है — टिकट आवंटन में की गई चूक ने पार्टी को उस उम्मीदवार से वंचित कर दिया जो सबसे अधिक वोट पाने वाला साबित हुआ।
आने वाले दिनों में नई डूसू कार्यकारिणी का गठन होगा, जहाँ एबीवीपी के तीन पदाधिकारियों और निर्दलीय उपाध्यक्ष के बीच तालमेल कैसे बनता है, यह देखना दिलचस्प होगा।