तस्लीमा नसरीन की 1 अगस्त कोलकाता वापसी: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की असली परीक्षा
सारांश
मुख्य बातें
विवादास्पद बांग्लादेशी-मूल की लेखिका तस्लीमा नसरीन 1 अगस्त को कोलकाता में एक कट्टरवाद-विरोधी साहित्यिक कार्यक्रम में भाग लेने वाली हैं — यह वही शहर है जहाँ से उन्हें नवंबर 2007 में कट्टरपंथी दबाव के बीच जबरन निकाला गया था। यह यात्रा राजनीतिक और वैचारिक दोनों स्तरों पर तीखी बहस का केंद्र बन गई है, क्योंकि पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद यह उनकी पहली संभावित उपस्थिति होगी।
2007 का निष्कासन: पृष्ठभूमि
नवंबर 2007 में कट्टरपंथी समूहों ने कोलकाता में हिंसक बंद और दंगे भड़काए थे। उनकी आत्मकथात्मक कृति 'द्विखंडितो' (दो भागों में विभाजित) को निशाना बनाते हुए इन समूहों ने उनके निष्कासन की माँग की थी। तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने कथित तौर पर इस दबाव के सामने घुटने टेक दिए और नसरीन को शहर छोड़ना पड़ा। इसके बाद उनकी रचनाओं पर प्रतिबंध जारी रहा और तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार के दौर में भी राज्य में उनके प्रवेश पर अनौपचारिक रोक बनी रही।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राज्यसभा सांसद और पश्चिम बंगाल के वर्तमान पार्टी प्रमुख समिक भट्टाचार्य ने पिछले साल मार्च में संसद के उच्च सदन में माँग की थी कि नसरीन को कोलकाता लौटने की अनुमति दी जाए। यह बयान बाद में एक तीव्र राजनीतिक संदेश के रूप में उभरा।
वहीं, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेता सुजान चक्रवर्ती ने कहा कि किसी विदेशी नागरिक के प्रवास संबंधी निर्णय केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, न कि राज्य सरकार के। उन्होंने कहा, 'पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार रही होगी, लेकिन केंद्र में नहीं — तो राज्य सरकार को दोष क्यों दिया जाए?'
तृणमूल कांग्रेस विधायक अखरुज्जमा ने इस यात्रा पर तीखी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि नसरीन ने मुस्लिम समुदाय और इस्लाम में शरिया के विरुद्ध बहुत कुछ कहा है और यदि सरकार ऐसे व्यक्ति का सम्मान करती है तो यह एक राजनीतिक संदेश है।
नई सरकार का रुख
नई राज्य सरकार इस आयोजन को एक वैचारिक बदलाव के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत कर रही है और नसरीन की यात्रा के लिए सुरक्षा व्यवस्था को सक्रिय रूप से मज़बूत कर रही है। गौरतलब है कि यह वही शहर है जिसे नसरीन अपना 'गोद लिया हुआ घर' मानती थीं, और जहाँ से उनका निष्कासन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थकों के लिए लंबे समय से एक कलंक बना हुआ है।
आगे क्या
यह यात्रा न केवल एक लेखिका की वापसी है, बल्कि यह परखेगी कि क्या पश्चिम बंगाल में वैचारिक असहमति और साहित्यिक अभिव्यक्ति के लिए वास्तविक स्थान बन पाया है। 1 अगस्त का कार्यक्रम कट्टरवाद-विरोधी विमर्श को केंद्र में रखेगा — और उसके इर्द-गिर्द जमा होने वाली राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ राज्य के सामाजिक माहौल का असली आईना होंगी।