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तेजस्वी यादव का बड़ा आरोप: बिहार-बंगाल चुनाव में फर्जीवाड़ा, दोबारा मतदान की माँग

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तेजस्वी यादव का बड़ा आरोप: बिहार-बंगाल चुनाव में फर्जीवाड़ा, दोबारा मतदान की माँग

सारांश

तेजस्वी यादव ने पटना में बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनावों को कथित फर्जीवाड़े की उपज बताया और पुनर्मतदान की माँग उठाई। उन्होंने दावा किया कि दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीनों में 14 बार आपत्तियाँ दर्ज कराईं, पर जवाब नहीं मिला — और SIR के ज़रिए मतदाता सूची में हेरफेर का आरोप भी लगाया।

मुख्य बातें

तेजस्वी यादव ने 23 सितंबर 2026 को पटना में प्रेस वार्ता कर बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनावों में फर्जीवाड़े का आरोप लगाया।
दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों पर आपत्ति दर्ज कराई — यह दावा एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट पर आधारित है।
SIR प्रक्रिया के ज़रिए मतदाता सूची में हेरफेर का आरोप; राजद ने इसे सुप्रीम कोर्ट तक चुनौती दी थी।
चुनावी रिकॉर्ड की सुरक्षा अवधि कथित तौर पर 1 वर्ष से घटाकर 45 दिन की गई — साक्ष्य जुटाने पर असर का दावा।
CEC नियुक्ति प्रक्रिया से प्रधान न्यायाधीश की भूमिका हटाने का विरोध; राजद आगे कानूनी और राजनीतिक कदम उठाएगा।

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता और बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने बुधवार, 23 सितंबर 2026 को पटना में एक प्रेस वार्ता के दौरान चुनाव आयोग (ECI) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर तीखे आरोप लगाए। उन्होंने बिहार और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों को कथित तौर पर फर्जीवाड़े की उपज बताते हुए दोनों राज्यों में पुनः चुनाव कराने की माँग की।

प्रेस वार्ता में क्या बोले तेजस्वी

तेजस्वी यादव ने कहा कि एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनके अनुसार, रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई है।

यादव ने कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया पर दो आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद आयोग ने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया, जो उनके अनुसार संस्था की स्वायत्तता पर सवाल उठाता है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर आरोप लगाया कि वे कथित तौर पर केंद्र सरकार के दबाव में काम कर रहे हैं।

SIR और मतदाता सूची पर विवाद

राजद ने बिहार में SIR शुरू होने के समय से ही इसका विरोध किया था और पार्टी इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले गई थी। तेजस्वी ने आरोप लगाया कि SIR के ज़रिए आम मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से काटे जा रहे हैं, जबकि BJP के कथित समर्थकों के नाम जोड़े जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मूल भावना के विरुद्ध है।

गौरतलब है कि SIR को लेकर देशभर में विपक्षी दलों ने व्यापक स्तर पर विरोध दर्ज कराया है और यह मामला न्यायालयों में भी विचाराधीन रहा है।

चुनावी रिकॉर्ड और CEC नियुक्ति पर सवाल

तेजस्वी ने चुनाव से संबंधित रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की अवधि में कथित बदलाव का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने दावा किया कि पहले मतदान और मतगणना की रिकॉर्डिंग एक वर्ष तक सुरक्षित रखी जाती थी, जिसे घटाकर कथित तौर पर 45 दिन कर दिया गया है। उनके अनुसार, इससे चुनावी प्रक्रिया को अदालत में चुनौती देने वालों के लिए साक्ष्य जुटाना कठिन हो जाता है।

उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया में हुए बदलाव का भी विरोध किया। उनका कहना है कि पहले इस चयन प्रक्रिया में भारत के प्रधान न्यायाधीश की भूमिका थी, जिसे बाद में एक केंद्रीय मंत्री से प्रतिस्थापित कर दिया गया।

संवैधानिक तर्क और सुप्रीम कोर्ट का हवाला

तेजस्वी ने 1995 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्त समान अधिकार रखते हैं तथा मुख्य आयुक्त 'फर्स्ट अमंग इक्वल्स' की भूमिका में होते हैं। ऐसे में यदि दो चुनाव आयुक्तों ने 14 बार गंभीर आपत्तियाँ दर्ज कराई हैं, तो उनका स्पष्ट उत्तर मिलना चाहिए।

उन्होंने आरोप लगाया कि BJP ने CBI, ED, आयकर विभाग और चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं को प्रभावित किया है। उन्होंने बिहार, महाराष्ट्र, दिल्ली और हरियाणा में विपक्ष की हार को केवल चुनावी परिणाम मानने से इनकार करते हुए इसे कथित सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का नतीजा बताया।

आगे की रणनीति

राजद ने घोषणा की है कि वह इस मामले में आगे कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर सक्रिय रहेगा। तेजस्वी यादव ने दोहराया कि बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनाव कथित फर्जीवाड़े से प्रभावित हुए हैं और इन राज्यों में पुनः स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराए जाने चाहिए। यह ऐसे समय में आया है जब विपक्ष पहले से ही चुनावी प्रक्रिया को लेकर जन आंदोलन की तैयारी में जुटा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और इस बार के दावे भी उसी परंपरा की कड़ी हैं। लेकिन जो बात इस प्रेस वार्ता को थोड़ा अलग बनाती है, वह है अखबारी रिपोर्ट का वह दावा कि आयोग के भीतर ही दो सदस्यों ने 14 बार असहमति दर्ज कराई — यह यदि सत्यापित होता है, तो संस्थागत संकट की एक गंभीर तस्वीर उभरती है। दूसरी तरफ, पुनर्मतदान की माँग एक ऐसा राजनीतिक पैंतरा है जिसे भारत के संवैधानिक ढाँचे में स्वीकार कराना लगभग असंभव है — और यादव इसे भली-भाँति जानते हैं। असली सवाल यह है: क्या यह जन-जागरण का ईमानदार प्रयास है, या 2027 के चुनावी चक्र से पहले विरोधाभास की एक सुनियोजित कथा?
RashtraPress
23 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तेजस्वी यादव ने बिहार और बंगाल में क्या आरोप लगाए हैं?
तेजस्वी यादव ने 23 सितंबर 2026 को पटना में दावा किया कि बिहार और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव कथित फर्जीवाड़े से प्रभावित हुए हैं। उन्होंने दोनों राज्यों में पुनः स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की माँग की।
दो चुनाव आयुक्तों की 14 आपत्तियों का क्या मतलब है?
तेजस्वी ने एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई है। उनके अनुसार, इन आपत्तियों का अब तक कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) क्या है और इस पर विवाद क्यों है?
SIR मतदाता सूची की विशेष समीक्षा प्रक्रिया है। तेजस्वी यादव का आरोप है कि इस प्रक्रिया के ज़रिए आम मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं और BJP समर्थकों के नाम जोड़े जा रहे हैं। राजद ने बिहार में SIR शुरू होने के समय से ही इसका विरोध किया और मामले को सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचाया।
चुनावी रिकॉर्ड की सुरक्षा अवधि में क्या बदलाव का दावा किया गया है?
तेजस्वी यादव ने दावा किया कि पहले मतदान और मतगणना की रिकॉर्डिंग एक वर्ष तक सुरक्षित रखी जाती थी, जिसे कथित तौर पर घटाकर 45 दिन कर दिया गया है। उनके अनुसार, इससे चुनावी परिणामों को अदालत में चुनौती देने वालों के लिए साक्ष्य जुटाना कठिन हो जाता है।
CEC की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव पर तेजस्वी का क्या कहना है?
तेजस्वी यादव ने कहा कि पहले मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन में भारत के प्रधान न्यायाधीश की भूमिका थी, जिसे बाद में एक केंद्रीय मंत्री से प्रतिस्थापित कर दिया गया। उनका कहना है कि इस बदलाव ने चुनाव आयोग की स्वायत्तता को कमज़ोर किया है।
राष्ट्र प्रेस
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