₹326 करोड़ बैंक फ्रॉड: ईडी ने हैदराबाद में KVPL से जुड़े 7 ठिकानों पर छापेमारी, ₹15 लाख नकद जब्त
सारांश
मुख्य बातें
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के हैदराबाद जोनल कार्यालय ने शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2026 को तेलंगाना के हैदराबाद, सिकंदराबाद और मेडचल-मलकाजगिरी जिलों में 7 ठिकानों पर एक साथ तलाशी अभियान चलाया। यह कार्रवाई मेसर्स कनकधरा वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड (KVPL) और इसके निदेशकों पर कथित ₹326.49 करोड़ के बैंक धोखाधड़ी मामले में 'प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट' (PMLA), 2002 के तहत की गई।
छापेमारी का दायरा
तलाशी ली गई जगहों में KVPL का रजिस्टर्ड कार्यालय, उसके निदेशकों के आवास और उन संस्थाओं व व्यक्तियों के ठिकाने शामिल रहे, जिन्होंने कथित तौर पर बैंक फंड के डायवर्जन में सहायता की थी। ईडी अधिकारियों ने बताया कि छापेमारी के दौरान फंड डायवर्जन और मनी लेयरिंग से संबंधित आपत्तिजनक दस्तावेज, डिजिटल डिवाइस तथा अन्य रिकॉर्ड जब्त किए गए। इसके अलावा, ₹15 लाख की बिना हिसाब-किताब वाली नकदी भी बरामद की गई। कई अचल संपत्तियों और निवेशों की भी पहचान की गई है।
मामले की पृष्ठभूमि
ईडी की यह जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा 8 दिसंबर 2022 को दर्ज उस एफआईआर पर आधारित है, जो पंजाब नेशनल बैंक (PNB) की शिकायत पर दर्ज हुई थी। एफआईआर में KVPL के निदेशकों और अन्य व्यक्तियों को आरोपी बनाया गया है। यह धोखाधड़ी PNB के नेतृत्व में गठित एक बैंक समूह — जिसमें IDBI बैंक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (UBI) और बैंक ऑफ बड़ौदा शामिल हैं — के साथ हुई, जिससे कुल ₹326.49 करोड़ का नुकसान हुआ।
धोखाधड़ी का तरीका
जांच में सामने आया है कि KVPL को दी गई बैंक गारंटी और लेटर ऑफ क्रेडिट सुविधाओं का कथित तौर पर दुरुपयोग किया गया। फंड को संबंधित संस्थाओं और बिचौलियों के जरिए दूसरी जगह भेजा गया। इस प्रक्रिया में स्टील खरीद के फर्जी इनवॉइस और ट्रांसपोर्ट दस्तावेजों का भी इस्तेमाल किया गया। ईडी के अनुसार, KVPL ने ऋणदाता बैंकों की जानकारी के बिना कंसोर्टियम व्यवस्था के बाहर बैंक खाते भी संचालित किए।
आगे की जांच
ईडी ने स्पष्ट किया है कि मामले में जांच अभी जारी है। बरामद दस्तावेजों और डिजिटल साक्ष्यों के विश्लेषण के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। गौरतलब है कि यह मामला उस व्यापक पैटर्न का हिस्सा है जिसमें फर्जी ट्रेड डॉक्युमेंट्स के जरिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से बड़ी धनराशि निकाली जाती है — एक ऐसी प्रणालीगत कमज़ोरी जिसे दूर करने के लिए नियामक एजेंसियाँ वर्षों से प्रयासरत हैं।