तिरुनेलवेली बाल यौन उत्पीड़न: मदुरै बेंच ने आनंद शेखर की मौत की सजा पर मुहर लगाई
सारांश
मुख्य बातें
मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने मंगलवार, 30 जून 2026 को तिरुनेलवेली बाल यौन उत्पीड़न मामले में दोषी आनंद शेखर की मौत की सजा को बरकरार रखा। तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले के मेलापालयम में 2023 में तीन नाबालिग लड़कियों को जान से मारने की धमकी देने और उनमें से एक के साथ यौन उत्पीड़न करने के अपराध में यह सजा सुनाई गई थी। डिवीजन बेंच ने इस मामले को 'सबसे दुर्लभ मामलों' की श्रेणी में रखते हुए फाँसी की सजा की पुष्टि की।
मुख्य घटनाक्रम
2023 में पलायमकोट्टई के ऑल वुमन पुलिस स्टेशन ने आनंद शेखर के विरुद्ध मामला दर्ज किया था। आरोप था कि उसने मेलापालयम में तीन नाबालिग लड़कियों को जान से मारने की धमकी दी और उनमें से एक के साथ यौन उत्पीड़न किया। गिरफ्तारी के बाद 12 मार्च को तिरुनेलवेली की स्पेशल पॉक्सो कोर्ट ने उसे दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई। तमिलनाडु सरकार ने विधिक प्रावधानों के अनुसार पलायमकोट्टई के पुलिस इंस्पेक्टर के माध्यम से मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ में सजा की पुष्टि हेतु संदर्भ दायर किया।
न्यायालय की टिप्पणियाँ
जस्टिस आनंद वेंकटेश और जस्टिस के.के. रामकृष्णन की डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा, 'बच्चों की सुरक्षा में कानून को रीढ़ की हड्डी की तरह काम करना चाहिए। यह फैसला ऐसे अपराध करने वालों के लिए एक चेतावनी होनी चाहिए।'
बेंच ने स्पष्ट किया, 'यह फैसला बदला लेने की कार्रवाई नहीं है, बल्कि न्याय दिलाने और समाज की नैतिक व्यवस्था को बहाल करने की कोशिश है। सर्वोच्च न्यायालय पहले ही कह चुका है कि जब अपराध बहुत गंभीर प्रकृति के हों तो न्यायाधीशों को न्याय की तलवार चलाने में हिचकिचाना नहीं चाहिए।'
अदालत ने आगे कहा, 'एक सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमज़ोर लोगों, खासकर बच्चों की सुरक्षा कैसे करता है। दोषी ने न केवल पीड़ितों के साथ शारीरिक हिंसा की, बल्कि जानबूझकर तीन मासूम बच्चियों पर क्रूरता भी की।'
पीड़ितों की पहचान सुरक्षित रखने का निर्देश
मदुरै पीठ ने रजिस्ट्रार को निर्देश दिया कि मामले का निपटारा करने से पूर्व न्यायिक अभिलेखों — जिसमें ट्रायल कोर्ट का फैसला और अन्य दस्तावेज़ शामिल हैं — से बाल पीड़ितों की पहचान उजागर करने वाले सभी संदर्भ हटाए जाएँ। यह कदम पॉक्सो अधिनियम के तहत पीड़ितों की गोपनीयता सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कानूनी परिप्रेक्ष्य
बेंच ने सर्वोच्च न्यायालय के 'सबसे दुर्लभ मामलों' के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि यह प्रकरण उसी श्रेणी में आता है। अदालत ने यह भी कहा कि दोषी ने न सिर्फ कानून का उल्लंघन किया, बल्कि बच्चों की मासूमियत को भी नष्ट कर दिया। 'ऐसे बर्बर मामले में दया दिखाने से समाज में गलत संदेश जाएगा और यह न्याय के साथ अन्याय होगा' — बेंच ने अपने निर्णय में रेखांकित किया।
आगे की प्रक्रिया
उच्च न्यायालय द्वारा मौत की सजा की पुष्टि के बाद अब यह मामला अनिवार्य रूप से सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष जाएगा, जहाँ दोषी को अपील का अधिकार होगा। इसके अतिरिक्त दोषी राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दायर कर सकता है। यह मामला तमिलनाडु में बाल सुरक्षा और पॉक्सो कानून के कठोर क्रियान्वयन की दिशा में एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।