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उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने सीएसआईआर-एनआईओ गोवा का दौरा किया, समुद्र विज्ञान को बताया मानवता की ज़रूरत

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उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने सीएसआईआर-एनआईओ गोवा का दौरा किया, समुद्र विज्ञान को बताया मानवता की ज़रूरत

सारांश

उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने पणजी के सीएसआईआर-एनआईओ में वैज्ञानिकों और छात्रों को संबोधित करते हुए महासागरों को भारत की रणनीतिक शक्ति का आधार बताया। उन्होंने सूक्ष्म प्लास्टिक से लेकर जलवायु संकट तक की चुनौतियों पर ज़ोर दिया और डीप ओशन मिशन को भारत की भविष्योन्मुखी सोच का प्रतीक कहा।

मुख्य बातें

उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने 31 मई 2025 को पणजी, गोवा स्थित सीएसआईआर-एनआईओ का दौरा किया।
उन्होंने कहा कि 11,000 किलोमीटर लंबी तटरेखा वाले भारत के लिए महासागर वैश्विक व्यापार और रणनीतिक शक्ति के सेतु हैं।
सीएसआईआर और नॉर्वे की अनुसंधान परिषद के बीच हस्ताक्षरित MoU की सराहना की, जो अनुसंधान और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देगा।
जलवायु परिवर्तन, सूक्ष्म प्लास्टिक , समुद्री प्रदूषण और जैव विविधता हानि को तटीय समुदायों के लिए गंभीर खतरा बताया।
डीप ओशन मिशन , ब्लू इकोनॉमी पहल और ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को भारत की साहसिक भविष्य-दृष्टि का प्रमाण बताया।
युवा शोधकर्ताओं को श्रीनिवास रामानुजन के जीवन से प्रेरणा लेकर निडरता से काम करने का आह्वान किया।

उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने 31 मई 2025 को गोवा के पणजी स्थित सीएसआईआर-राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (सीएसआईआर-एनआईओ) का दौरा किया और वहाँ वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं तथा छात्रों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि 11,000 किलोमीटर लंबी तटरेखा वाले भारत के लिए महासागर केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र है जिसका संरक्षण अनिवार्य है। यह दौरा ऐसे समय में हुआ जब भारत अपनी ब्लू इकोनॉमी और डीप ओशन मिशन को नई गति देने में जुटा है।

महासागर: सीमा नहीं, सेतु

राधाकृष्णन ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि भारत के समुद्र देश को विश्व से अलग करने वाली सीमाएँ नहीं हैं, बल्कि ये वैश्विक व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक समृद्धि और रणनीतिक शक्ति से जोड़ने वाले पुल हैं। उन्होंने भारत की समुद्री विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि सदियों से हिंद महासागर ने भारतीय सभ्यता को आकार दिया है और प्राचीन व्यापारियों, विद्वानों तथा नाविकों ने समुद्र पार सांस्कृतिक एवं आर्थिक संबंध स्थापित किए।

सीएसआईआर-एनआईओ की भूमिका और अंतरराष्ट्रीय सहयोग

उपराष्ट्रपति ने सीएसआईआर-एनआईओ को लगभग छह दशकों से भारत के अग्रणी वैज्ञानिक संस्थानों में से एक बताया और कहा कि यह संस्थान अपने शोध, नवाचार और अन्वेषण के ज़रिये भारत को आत्मनिर्भर और भविष्य के लिए तैयार बनाने में योगदान दे रहा है। उन्होंने सीएसआईआर और नॉर्वे की अनुसंधान परिषद के बीच हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन (MoU) का विशेष उल्लेख किया और कहा कि यह साझेदारी अनुसंधान, नवाचार, प्रौद्योगिकी विकास और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देगी। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय अनुसंधान संस्थानों को वैश्विक मानकों के अनुरूप निरंतर सीखते रहना चाहिए।

समुद्री चुनौतियाँ और जलवायु संकट

राधाकृष्णन ने जलवायु परिवर्तन, बढ़ते समुद्री जल स्तर, समुद्री प्रदूषण, जैव विविधता हानि और सूक्ष्म प्लास्टिक जैसी बढ़ती चुनौतियों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि दुनिया भर के तटीय समुदाय तेज़ी से असुरक्षित होते जा रहे हैं और विकास प्रकृति की कीमत पर नहीं हो सकता। उनके अनुसार, समुद्र विज्ञान अब केवल वैज्ञानिक अन्वेषण तक सीमित नहीं, बल्कि मानवता के भविष्य की रक्षा के लिए अनिवार्य हो गया है।

भारत की भविष्योन्मुखी पहलें

उपराष्ट्रपति ने डीप ओशन मिशन, ब्लू इकोनॉमी पहल, ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और नवीकरणीय ऊर्जा साझेदारी जैसे कार्यक्रमों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये पहलें एक साहसिक और भविष्योन्मुखी राष्ट्र की सोच को दर्शाती हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान भारत की भूमिका की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जब कई देश पेटेंट हासिल करने में लगे थे, तब भारत ने मानवता की सेवा को प्राथमिकता दी — यह वसुधैव कुटुंबकम की भावना का प्रतीक है।

युवा शोधकर्ताओं को प्रेरणा

युवा शोधकर्ताओं और छात्रों को संबोधित करते हुए राधाकृष्णन ने उन्हें निडर होकर सपने देखने और अथक परिश्रम करने का आग्रह किया। उन्होंने गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन के जीवन से प्रेरणा लेने की बात कही और कहा कि सच्ची उत्कृष्टता किसी विषय में गहरी व्यक्तिगत रुचि और समर्पण से जन्म लेती है। उपराष्ट्रपति ने विश्वास जताया कि जलवायु समाधान, समुद्री जैव प्रौद्योगिकी या महासागर संरक्षण में अगली बड़ी उपलब्धि इसी संस्थान के युवा प्रतिभाओं से निकल सकती है। अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने विभिन्न प्रयोगशालाओं और अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी प्रदर्शनी का भी अवलोकन किया।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा यह है कि ये साझेदारियाँ ज़मीनी शोध परिणामों और तटीय समुदायों के जीवन में कितना बदलाव लाती हैं। गौरतलब है कि भारत की तटरेखा पर निर्भर करोड़ों मछुआरों और तटीय निवासियों के लिए समुद्री प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियाँ नीतिगत भाषणों से कहीं अधिक तत्काल हैं। संस्थागत प्रोत्साहन और युवा वैज्ञानिकों को वास्तविक संसाधन मिलें, तभी रामानुजन जैसी प्रतिभाओं का आह्वान सार्थक होगा।
RashtraPress
14 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सीएसआईआर-राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (सीएसआईआर-एनआईओ) क्या है?
सीएसआईआर-एनआईओ गोवा के पणजी में स्थित भारत का प्रमुख समुद्र विज्ञान अनुसंधान संस्थान है, जो लगभग छह दशकों से महासागरीय शोध, नवाचार और अन्वेषण में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। यह संस्थान डीप ओशन मिशन और ब्लू इकोनॉमी जैसी राष्ट्रीय पहलों में वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।
उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने सीएसआईआर-एनआईओ दौरे में क्या कहा?
उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत के महासागर वैश्विक व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक शक्ति के सेतु हैं, न कि सीमाएँ। उन्होंने जलवायु परिवर्तन, सूक्ष्म प्लास्टिक और समुद्री प्रदूषण को तटीय समुदायों के लिए गंभीर खतरा बताया और युवा शोधकर्ताओं को निडरता से काम करने की प्रेरणा दी।
सीएसआईआर और नॉर्वे की अनुसंधान परिषद के बीच MoU का क्या महत्व है?
यह समझौता ज्ञापन सीएसआईआर और नॉर्वे की अनुसंधान परिषद के बीच हस्ताक्षरित हुआ है, जो अनुसंधान, नवाचार, प्रौद्योगिकी विकास और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देगा। उपराष्ट्रपति ने इसे अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग को मज़बूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।
भारत का डीप ओशन मिशन क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
डीप ओशन मिशन भारत सरकार की एक प्रमुख पहल है जिसका उद्देश्य गहरे समुद्र में खनिज संसाधनों की खोज, समुद्री जैव विविधता का अध्ययन और नई प्रौद्योगिकियों का विकास करना है। उपराष्ट्रपति ने इसे ब्लू इकोनॉमी और ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के साथ भारत की भविष्योन्मुखी वैज्ञानिक सोच का प्रतीक बताया।
समुद्र विज्ञान के क्षेत्र में भारत के सामने क्या प्रमुख चुनौतियाँ हैं?
उपराष्ट्रपति ने जलवायु परिवर्तन, बढ़ते समुद्री जल स्तर, समुद्री प्रदूषण, जैव विविधता हानि और सूक्ष्म प्लास्टिक को प्रमुख चुनौतियों के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि इन चुनौतियों से तटीय समुदाय तेज़ी से असुरक्षित होते जा रहे हैं और वैज्ञानिक प्रगति को करुणा, स्थिरता और जिम्मेदारी से निर्देशित होना चाहिए।
राष्ट्र प्रेस
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