क्या कृषि, राइस मिल और पुल प्रोजेक्ट बदलेंगे बर्धमान पूर्व की राजनीतिक तस्वीर?

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क्या कृषि, राइस मिल और पुल प्रोजेक्ट बदलेंगे बर्धमान पूर्व की राजनीतिक तस्वीर?

सारांश

बर्धमान पूर्व, जिसे 'धान का कटोरा' कहा जाता है, अब एक महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र बन गया है। यहाँ के विकास कार्य और राजनीतिक समीकरण ममता बनर्जी के लिए चुनौती बन सकते हैं।

Key Takeaways

  • बर्धमान पूर्व का राजनीतिक परिदृश्य बदल रहा है।
  • कृषि और राइस मिलें यहाँ की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार हैं।
  • टीएमसी का यहाँ एक मजबूत संगठन है।
  • पुल निर्माण से विकास की संभावनाएँ बढ़ी हैं।
  • ममता बनर्जी की रणनीति आगामी चुनाव के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

कोलकाता, 12 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। जब आप पश्चिम बंगाल के नक्शे पर नजर डालते हैं, तो हुगली, अजय और दामोदर नदियों के मध्य स्थित एक क्षेत्र अपनी हरियाली के कारण आपका ध्यान आकर्षित करता है। इसे सदियों से बंगाल का 'धान का कटोरा' कहा जाता है, और यह है 'बर्धमान पूर्व'।

2017 में, प्रशासनिक सुविधाओं के लिए बर्धमान जिले को दो भागों में विभाजित किया गया, जिसमें पूर्व बर्धमान एक नए रूप में उभरा। यह 7 विधानसभा क्षेत्रों को समेटे हुए एक लोकसभा सीट है जो अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित है।

बर्धमान पूर्व की ज़मीन में दो रंग हैं। पूर्व की उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी धान, आलू और सरसों की खेती में प्रसिद्ध है, जबकि पश्चिम की मिट्टी लाल रंग की है।

जनसांख्यिकी के दृष्टिकोण से यह सीट एक 'राजनीतिक थ्रिलर' से कम नहीं है। यहाँ की लगभग 85 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है, जिसमें 73.75 प्रतिशत हिंदू और 25.14 प्रतिशत मुस्लिम हैं। मुस्लिम समुदाय चुनावों में 'किंगमेकर' की भूमिका निभाता है।

चूंकि यह सीट अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित है, असली खेल दलित वोटों के भीतर होता है। बाहरी नजर से एससी वर्ग एक समान दिखता है, लेकिन अंदर गहरी खाई है। यहां मुख्य रूप से तीन उप-जातियां (नामशूद्र, बाग्दी और बाउरी) हैं।

नामशूद्र समुदाय ने शिक्षा में (लगभग 80 प्रतिशत साक्षरता) और राजनीति में उल्लेखनीय प्रगति की है। सरकारी नौकरियों से लेकर नेतृत्व में उनका दबदबा है। दूसरी ओर, बाग्दी और बाउरी समुदाय आज भी हाशिए पर हैं, जिनकी साक्षरता दर 38 से 60 प्रतिशत के बीच है और ये मुख्य रूप से भूमिहीन खेतिहर मजदूर हैं। राजनीतिक दल इन्हीं वंचित समुदायों के बीच कल्याणकारी योजनाओं का जाल बिछाकर सत्ता की चाबी तलाशते हैं।

बर्धमान की अर्थव्यवस्था राइस मिलों पर निर्भर है। यहाँ विकास की कुछ किरणें भी दृष्टिगोचर होती हैं। 'शिल्पा सेतु' (334 करोड़ रुपए) और कालना-शांतिपुर पुल (1,098 करोड़ रुपए) जैसे बड़े प्रोजेक्ट इस क्षेत्र के भूगोल को बदलने वाले हैं। ये पुल न केवल दूरी को कम करेंगे, बल्कि नदिया के प्रसिद्ध 'तंत साड़ी' बुनकरों को बर्धमान के बड़े बाजारों से जोड़ देंगे।

बर्धमान पूर्व लोकसभा सीट सिर्फ एक चुनाव क्षेत्र नहीं है, बल्कि 7 अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों का एक ऐसा जाल है जिसे भेदना विपक्ष के लिए बहुत कठिन रहा है। 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के नतीजे दिखाते हैं कि यहाँ ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस का एकछत्र राज है। इन सभी सीटों पर वर्तमान में टीएमसी के विधायक काबिज हैं।

रैना (एससी): कृषि केंद्रित इस आरक्षित सीट पर तृणमूल की मजबूत पकड़ है। पंचायत स्तर पर मजबूत नेटवर्क ने यहाँ टीएमसी विधायक शंपा धारा की स्थिति को अजेय बना रखा है।

जमालपुर (एससी): दलित और अल्पसंख्यक बहुल इस क्षेत्र में सरकार की कल्याणकारी योजनाओं ने आलोक कुमार माझी को बड़ी जीत दिलाई है।

कालना (एससी): तंत साड़ी के बुनकरों और किसानों के इस क्षेत्र में भी सत्ताधारी दल का भारी दबदबा है। यहाँ भी टीएमसी के देबोप्रसाद बाग विधायक हैं।

मेमारी एक प्रमुख व्यापारिक, परिवहन और कृषि केंद्र है। यहाँ से जीते टीएमसी के विधायक मधुसूदन भट्टाचार्य ने पार्टी के ग्रामीण वोट बैंक को मजबूती से बांध रखा है।

पुरबस्थली दक्षिण: यह क्षेत्र राज्य के टीएमसी कद्दावर मंत्री स्वपन देबनाथ का अभेद्य गढ़ माना जाता है। यहाँ उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता भी काफी अधिक है।

पुरबस्थली उत्तर: भगीरथी नदी के कटाव जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करने के बावजूद यहाँ का राजनीतिक मिजाज तपन चटर्जी और तृणमूल के पक्ष में झुका हुआ है।

कटवा विधानसभा सीट: कटवा थर्मल पावर प्रोजेक्ट के भूमि अधिग्रहण के पुराने विवाद और नदी कटाव यहाँ के प्रमुख मुद्दे हैं। फिर भी, टीएमसी के रवींद्रनाथ चटर्जी जैसे अनुभवी नेता ने यहाँ अपना किला सुरक्षित रखा है।

सातों विधानसभा में यह 'क्लीन स्वीप' दर्शाता है कि स्थानीय स्तर पर तृणमूल का संगठन कितना मजबूत है। पंचायत से लेकर विधानसभा और लोकसभा तक, इस 'धान के कटोरे' में फिलहाल घास-फूल ही लहलहा रहा है।

पिछले एक दशक में बर्धमान पूर्व की सियासी जमीन ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। 2014 में यहाँ असली लड़ाई तृणमूल कांग्रेस और वामदलों (सीपीआई-एम) के बीच थी, जब भाजपा को मात्र 13 प्रतिशत वोट मिले थे।

2019 में बंगाल की राजनीति में बदलाव आया। लोकसभा चुनाव में वामदलों का वोट बैंक ढह गया और एक 'सामरिक मतदान' के तहत लेफ्ट का वोटर भाजपा की ओर बढ़ा। नतीजा यह हुआ कि भाजपा सीधे 38.32 प्रतिशत पर पहुंच गई और टीएमसी की जीत का अंतर घटकर मात्र 89 हजार रह गया।

2024 के लोकसभा चुनावों के लिए ममता बनर्जी ने खतरे को भांप लिया और एक महत्वपूर्ण फैसला लिया। उन्होंने अपने मौजूदा सांसद सुनील कुमार मंडल का टिकट काटकर एक पढ़ी-लिखी महिला उम्मीदवार डॉ. शर्मिला सरकार को मैदान में उतारा।

इस मास्टरस्ट्रोक ने खेल को पलट दिया। डॉ. शर्मिला सरकार ने न केवल 48.11 प्रतिशत वोट हासिल किए, बल्कि भाजपा के असीम कुमार सरकार को 1 लाख 60 हजार से अधिक वोटों के विशाल अंतर से पराजित किया। भाजपा लगभग 37 प्रतिशत पर ही रह गई।

Point of View

NationPress
15/03/2026

Frequently Asked Questions

बर्धमान पूर्व की प्रमुख राजनीतिक चुनौतियाँ क्या हैं?
बर्धमान पूर्व में दलित वोटों का खेल, मुस्लिम समुदाय की भूमिका और विकास कार्यों का प्रभाव, प्रमुख राजनीतिक चुनौतियाँ हैं।
बर्धमान पूर्व का आर्थिक आधार क्या है?
यहाँ की अर्थव्यवस्था मुख्यतः राइस मिलों पर निर्भर है, जो कृषि से जुड़ी गतिविधियों पर आधारित है।
टीएमसी की स्थिति बर्धमान पूर्व में कैसी है?
टीएमसी का यहाँ का संगठन काफी मजबूत है और पिछले चुनावों में इसे एकतरफा जीत मिली थी।
बर्धमान पूर्व में विकास कार्यों का क्या प्रभाव है?
विकास कार्य जैसे पुल निर्माण और शिल्पा सेतु यहाँ के भूगोल और आर्थिक स्थिति में बदलाव ला रहे हैं।
2024 का चुनाव बर्धमान पूर्व में कैसे प्रभावित होगा?
2024 के चुनाव में ममता बनर्जी द्वारा उठाए गए कदम और उम्मीदवार चयन महत्वपूर्ण होंगे।
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