10 जुलाई 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

भीष्म साहनी जयंती: 'तमस' के रचयिता जिन्होंने हिंदी साहित्य को इंसानियत का आईना दिखाया

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
भीष्म साहनी जयंती: 'तमस' के रचयिता जिन्होंने हिंदी साहित्य को इंसानियत का आईना दिखाया

सारांश

भीष्म साहनी सिर्फ लेखक नहीं थे — वे विभाजन की पीड़ा के जीवित गवाह थे जिन्होंने उस दर्द को 'तमस' में ढाल दिया। रावलपिंडी की गलियों से मॉस्को के अनुवाद कक्ष तक और फिर दिल्ली के रंगमंच तक — उनकी यात्रा हिंदी साहित्य की सबसे समृद्ध विरासतों में से एक है।

मुख्य बातें

भीष्म साहनी का जन्म 8 अगस्त 1915 को रावलपिंडी (अविभाजित पंजाब) में हुआ; निधन 11 जुलाई 2003 को नई दिल्ली में।
उनका उपन्यास 'तमस' ( 1973 ) सांप्रदायिक हिंसा पर हिंदी साहित्य का सबसे चर्चित दस्तावेज़ माना जाता है।
1957–1963 के बीच मॉस्को में रहकर लगभग दो दर्जन रूसी कृतियों का हिंदी अनुवाद किया, जिनमें टॉल्स्टॉय का 'पुनरुत्थान' प्रमुख है।
1975 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1998 में पद्म भूषण और 2002 में साहित्य अकादमी फेलोशिप से सम्मानित।
सफदर हाशमी की शहादत के बाद सांस्कृतिक एकता के लिए 'सहमत' संस्था की स्थापना की।
नाटक 'हानूश' , 'कबीरा खड़ा बाजार में' और 'माधवी' भारतीय रंगमंच के स्थायी स्तंभ हैं।

भीष्म साहनी — हिंदी साहित्य के वह अप्रतिम स्तंभ जिन्होंने विभाजन की त्रासदी, सांप्रदायिक उन्माद और इंसानी संवेदना को अपनी लेखनी से अमर कर दिया — का जन्म 8 अगस्त 1915 को अविभाजित पंजाब के रावलपिंडी में हुआ था। उनका परिवार मूलतः भेरा का था, जहाँ आज भी उनके पूर्वजों की स्मृति में 'साहनी क्वार्टर' मौजूद हैं। 11 जुलाई 2003 को नई दिल्ली में उनके निधन के दो दशक से अधिक बाद भी उनकी रचनाएँ भारतीय समाज की अंतरात्मा को झकझोरती हैं।

बहुसांस्कृतिक रावलपिंडी में बचपन और शुरुआती लेखन

भीष्म साहनी रावलपिंडी के एक जीवंत और बहुसांस्कृतिक परिवेश में पले-बढ़े, जहाँ वे अपने मुस्लिम मित्रों के साथ हॉकी खेलते थे। इसी बहुलतावादी माहौल ने उनके भीतर साम्प्रदायिक सौहार्द की वह बुनियाद रखी जो आगे चलकर उनकी साहित्यिक दृष्टि का केंद्रबिंदु बनी। उल्लेखनीय है कि ग्यारहवीं कक्षा में ही उनकी पहली कहानी 'आबला' प्रकाशित हो चुकी थी — एक ऐसा संकेत जो आने वाले महान साहित्यकार की झलक दे रहा था।

अपने बड़े भाई और प्रसिद्ध अभिनेता बलराज साहनी को आदर्श मानते हुए उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर से अंग्रेजी साहित्य में एमए की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद कुछ समय के लिए उन्होंने अपने पिता के व्यापार में भी हाथ बँटाया।

स्वतंत्रता संग्राम, विभाजन और वैचारिक यात्रा

देश के स्वाधीनता आंदोलन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता अटूट थी। 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' में सक्रिय भागीदारी के कारण वे जेल भी गए। विभाजन के उथल-पुथल भरे दिनों में वे कांग्रेस के सक्रिय सदस्य थे और मार्च 1947 में रावलपिंडी में दंगे भड़कने पर उन्होंने शरणार्थियों के लिए राहत कार्य का संचालन किया।

बाद में बलराज साहनी के प्रभाव में वे भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) से जुड़े। इप्टा के मंच ने उनके भीतर के प्रगतिशील विचारों को और धार दी, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने कांग्रेस छोड़कर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। यह वैचारिक परिवर्तन उनकी रचनाओं में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है — उनका लेखन सदैव शोषित, विस्थापित और हाशिये पर खड़े इंसान की आवाज़ बना रहा।

अध्यापन, मॉस्को प्रवास और अनुवाद कार्य

आजीविका के लिए उन्होंने अंबाला और खालसा कॉलेज, अमृतसर में अध्यापन किया और बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन कॉलेज में अंग्रेजी के व्याख्याता नियुक्त हुए। 1958 में उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।

1957 से 1963 के बीच उनका जीवन मॉस्को में बीता, जहाँ उन्होंने 'विदेशी भाषा प्रकाशन गृह' में अनुवादक के रूप में कार्य किया। इस दौरान उन्होंने लियो टॉल्स्टॉय के कालजयी उपन्यास 'पुनरुत्थान' सहित लगभग दो दर्जन रूसी कृतियों का हिंदी में अनुवाद किया — एक ऐसा योगदान जिसने हिंदी पाठकों को विश्व साहित्य के खज़ाने से जोड़ा। भारत लौटने के बाद उन्होंने प्रसिद्ध पत्रिका 'नयी कहानियाँ' का संपादन संभाला और प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव के रूप में भी सेवाएँ दीं। सफदर हाशमी की शहादत के बाद सांस्कृतिक एकजुटता के लिए उन्होंने 'सहमत' नामक संस्था की स्थापना भी की।

साहित्यिक विरासत: 'तमस' से 'माधवी' तक

भीष्म साहनी का उपन्यास 'तमस' (1973) सांप्रदायिक हिंसा और इंसानी लाचारी का ऐसा जीवंत महाकाव्य है जो आज भी पाठक की अंतरात्मा को हिला देता है। उनकी कहानी 'अमृतसर आ गया है' ट्रेन के यात्रियों के बदलते व्यवहार के माध्यम से दिखाती है कि कैसे सांप्रदायिक उन्माद इंसान को हैवान बना देता है। उपन्यास 'मय्यादास की माड़ी' पंजाब में सिख साम्राज्य के पतन और ब्रिटिश शासन के उदय के बीच बिखरते सामाजिक मूल्यों का ऐतिहासिक दस्तावेज़ है।

नाटक के क्षेत्र में उनके 'हानूश' (1977), 'कबीरा खड़ा बाजार में' (1981) और 'माधवी' (1982) आज भी भारतीय रंगमंच के मार्गदर्शक स्तंभ माने जाते हैं।

पुरस्कार और सम्मान

उनकी साहित्यिक साधना को देश-विदेश में व्यापक मान्यता मिली। 1975 में उपन्यास 'तमस' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1981 में लोटस लिटरेचर प्राइज, 1998 में पद्म भूषण और 2002 में साहित्य अकादमी फेलोशिप से सम्मानित किए गए। 11 जुलाई 2003 को नई दिल्ली में उनका निधन हुआ, किंतु उनकी रचनाएँ आज भी हिंदी साहित्य और भारतीय समाज को दिशा देती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

वह आज भी भारतीय समाज में जड़ें जमाए है। उनकी विशेषता यह थी कि वे वैचारिक प्रतिबद्धता को कभी कला की बलि नहीं चढ़ने देते थे — 'तमस' में कोई खलनायक नहीं, केवल परिस्थितियों के शिकार इंसान हैं। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर उन्हें केवल 'विभाजन के लेखक' तक सीमित कर देती है, जबकि 'मय्यादास की माड़ी' और 'माधवी' जैसी रचनाएँ उनकी ऐतिहासिक और पौराणिक गहराई को रेखांकित करती हैं। आज जब साहित्य और राजनीति के बीच की रेखा धुँधली होती जा रही है, भीष्म साहनी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि लेखक की असली ताकत उसकी निष्पक्ष मानवीय दृष्टि में होती है।
RashtraPress
10 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भीष्म साहनी कौन थे और उनका हिंदी साहित्य में क्या योगदान है?
भीष्म साहनी हिंदी के प्रमुख कथाकार, नाटककार और अनुवादक थे जिनका जन्म 8 अगस्त 1915 को रावलपिंडी में हुआ था। उन्होंने 'तमस', 'मय्यादास की माड़ी' जैसे उपन्यासों और 'हानूश', 'माधवी' जैसे नाटकों से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। विभाजन की त्रासदी और सांप्रदायिक हिंसा पर उनका लेखन आज भी अपरिहार्य माना जाता है।
'तमस' उपन्यास किस विषय पर है और इसे साहित्य अकादमी पुरस्कार कब मिला?
'तमस' (1973) 1947 के विभाजन के दौरान पंजाब में हुई सांप्रदायिक हिंसा और इंसानी लाचारी पर आधारित उपन्यास है। इसे 1975 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह उपन्यास बाद में दूरदर्शन पर धारावाहिक के रूप में भी प्रसारित हुआ और व्यापक चर्चा का विषय बना।
भीष्म साहनी ने मॉस्को में क्या कार्य किया?
भीष्म साहनी 1957 से 1963 तक मॉस्को में 'विदेशी भाषा प्रकाशन गृह' में अनुवादक के रूप में कार्यरत रहे। इस दौरान उन्होंने लियो टॉल्स्टॉय के 'पुनरुत्थान' सहित लगभग दो दर्जन रूसी कृतियों का हिंदी अनुवाद किया, जिससे हिंदी पाठकों को विश्व साहित्य से परिचय मिला।
भीष्म साहनी को कौन-कौन से प्रमुख पुरस्कार मिले?
उन्हें 1975 में 'तमस' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1981 में लोटस लिटरेचर प्राइज, 1998 में पद्म भूषण और 2002 में साहित्य अकादमी फेलोशिप प्राप्त हुई। ये सम्मान उनके साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति के प्रतीक हैं।
'सहमत' संस्था क्या है और भीष्म साहनी ने इसे क्यों स्थापित किया?
'सहमत' (Safdar Hashmi Memorial Trust) एक सांस्कृतिक संस्था है जिसकी स्थापना भीष्म साहनी ने नाटककार सफदर हाशमी की शहादत के बाद सांस्कृतिक एकजुटता और प्रगतिशील कला को जीवित रखने के उद्देश्य से की थी। यह संस्था आज भी सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना के क्षेत्र में सक्रिय है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 1 महीना पहले
  2. 4 महीने पहले
  3. 6 महीने पहले
  4. 6 महीने पहले
  5. 8 महीने पहले
  6. 11 महीने पहले
  7. 11 महीने पहले
  8. 1 साल पहले