सार्वजनिक जगहों पर नमाज सही नहीं: मुस्लिम धर्मगुरु ने किया सीएम योगी के बयान का समर्थन
सारांश
मुख्य बातें
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सड़कों पर नमाज न पढ़ने संबंधी बयान पर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इस विवाद में एक अहम मोड़ तब आया जब उत्तर प्रदेश के शाही मुख्य मुफ्ती मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन ने मुख्यमंत्री के बयान को इस्लामी सिद्धांतों और न्यायालय के आदेशों के अनुरूप बताते हुए खुलकर समर्थन किया। जहाँ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता सीएम के साथ खड़े हैं, वहीं विपक्षी दल इस बयान की आलोचना कर रहे हैं।
मुस्लिम धर्मगुरु का स्पष्ट समर्थन
मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन ने कहा, 'सीएम योगी आदित्यनाथ का यह बयान कि सड़कों पर नमाज नहीं पढ़ी जाती, बिल्कुल सही है। इस मामले पर हाई कोर्ट के आदेश पहले ही जारी हो चुके हैं।' उन्होंने इस्लामी आधार का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जहाँ विवाद की आशंका हो या जो स्थान सार्वजनिक हो, वहाँ नमाज अदा करने का प्रावधान इस्लाम में नहीं है। उनके इस बयान ने इस पूरे राजनीतिक विमर्श को एक नया आयाम दे दिया है।
मंत्रियों की प्रतिक्रिया
उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री दानिश आजाद अंसारी ने कहा कि सरकार दिशा-निर्देश जारी करती है और सभी को उनका पालन करना चाहिए। उन्होंने कहा, 'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा और संरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लगातार काम किया है।' अंसारी ने यह भी जोड़ा कि समाज को विकास की ओर ले जाना सभी का साझा एजेंडा होना चाहिए।
उत्तर प्रदेश सरकार के एक अन्य मंत्री अनिल राजभर ने सीधे शब्दों में कहा कि सड़कें लोगों के आवागमन के लिए हैं, नमाज के लिए नहीं। उन्होंने कहा, 'सड़कों पर कब्जा होने से यातायात बाधित होता है। मुसलमानों को नमाज के लिए मस्जिद जाना चाहिए।'
राजनीतिक विवाद की पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह बयान उस समय आया है जब उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक स्थानों पर धार्मिक गतिविधियों को लेकर बहस पहले से ही जारी है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय सहित कई अदालतें सार्वजनिक सड़कों पर नमाज के संदर्भ में पहले भी टिप्पणियाँ कर चुकी हैं। यह ऐसे समय में आया है जब राज्य में सांप्रदायिक सौहार्द और कानून-व्यवस्था दोनों ही राजनीतिक विमर्श के केंद्र में हैं।
विपक्ष का रुख
विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री के बयान को ध्रुवीकरण की राजनीति से जोड़ते हुए आलोचना की है। आलोचकों का कहना है कि इस तरह के बयान अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाने वाले हैं। हालाँकि, मौलाना हुसैन के समर्थन ने विपक्ष के इस तर्क को कमजोर किया है।
आगे क्या
यह विवाद राज्य में धार्मिक स्थलों और सार्वजनिक स्थानों के उपयोग को लेकर नीतिगत बहस को और गहरा कर सकता है। मुस्लिम धर्मगुरु के समर्थन के बाद यह देखना अहम होगा कि समुदाय के भीतर इस मुद्दे पर आम सहमति किस दिशा में बनती है।