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पीयूष गोयल: लागत लाभ से भारत आरएंडडी में ₹12 लाख करोड़ के अवसर हासिल कर सकता है

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पीयूष गोयल: लागत लाभ से भारत आरएंडडी में ₹12 लाख करोड़ के अवसर हासिल कर सकता है

सारांश

पीयूष गोयल का दावा है कि भारत की शोध लागत यूरोप की तुलना में छठे हिस्से पर है — और यही असमानता ₹12 लाख करोड़ के आरएंडडी अवसर की नींव है। सरकार और उद्योग के साझा ₹2 लाख करोड़ निवेश से आईआईटी और मेडिकल कॉलेजों को वैश्विक शोध केंद्र बनाने की महत्वाकांक्षी रूपरेखा सामने आई है।

मुख्य बातें

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने 9 सितंबर 2026 को कहा कि भारत आरएंडडी क्षेत्र में ₹10–12 लाख करोड़ के अवसर हासिल कर सकता है।
भारत में शोध लागत स्विट्जरलैंड और यूरोप की तुलना में पाँचवें-छठे हिस्से के बराबर बताई गई।
प्रस्तावित मॉडल में सरकार ₹1 लाख करोड़ और उद्योग जगत बराबर का निवेश करेगा।
आईआईटी, मेडिकल कॉलेजों और उत्कृष्टता केंद्रों की क्षमताओं का उपयोग इस योजना का आधार है।
सरकार बल्क ड्रग पार्क और 100 नए औद्योगिक पार्क विकसित कर रही है; विकसित भारत 2047 लक्ष्य से जोड़ा गया।

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने 9 सितंबर 2026 को कहा कि भारत अपने लागत लाभ का सदुपयोग करते हुए रिसर्च एंड डेवलपमेंट (आरएंडडी) क्षेत्र में ₹10 से 12 लाख करोड़ तक के अवसर अर्जित कर सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस संभावना को साकार करने के लिए सरकारी निवेश को उद्योग जगत और देश के प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों की क्षमताओं के साथ समन्वित करना अनिवार्य होगा।

लागत लाभ: भारत की सबसे बड़ी ताकत

गोयल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा किए गए एक वीडियो में बताया कि भारत में शोध की लागत स्विट्जरलैंड या यूरोप की तुलना में लगभग पाँचवें या छठे हिस्से के बराबर है। उनके अनुसार यह असाधारण लागत अंतर भारत को वैश्विक इनोवेशन हब के रूप में स्थापित करने का ऐतिहासिक अवसर प्रदान करता है।

उन्होंने कहा, 'अगर उद्योग बराबर का योगदान देता है और हम अपने अकादमिक संस्थानों का इस्तेमाल करते हैं, तो हम वास्तव में 10-12 लाख करोड़ रुपए का रिसर्च एंड डेवलपमेंट कर सकते हैं।' यह बयान उन्होंने एक्स पर साझा वीडियो में दिया।

सरकार और उद्योग का साझा निवेश मॉडल

मंत्री ने एक ठोस वित्तीय रूपरेखा भी प्रस्तुत की। उनके अनुसार यदि केंद्र सरकार ₹1 लाख करोड़ के निवेश से आरएंडडी कार्यक्रम आरंभ करे और उद्योग जगत इसमें बराबर का योगदान दे, तो भारत के मेडिकल कॉलेजों, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) और अन्य उत्कृष्टता केंद्रों की क्षमताओं का पूरा उपयोग किया जा सकता है।

यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर देश अपनी आरएंडडी क्षमताओं को मजबूत करने की होड़ में हैं और भारत इस दौड़ में अपनी लागत-दक्षता को प्रमुख हथियार के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।

फार्मा और हेल्थकेयर क्षेत्र पर विशेष जोर

गोयल ने उत्पाद डिजाइन, क्लीनिकल ट्रायल और चिकित्सा उपकरणों के निर्माण जैसे उच्च-मूल्य क्षेत्रों में भारत की संभावनाओं को रेखांकित किया। भारत हेल्थ ग्लोबल एक्सपो 2026 को सितंबर की शुरुआत में संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि भारत को एक भरोसेमंद वैश्विक हेल्थकेयर साझेदार के रूप में अपनी स्थिति और सुदृढ़ करनी चाहिए।

उन्होंने कहा था कि 'दुनिया की फार्मेसी' के रूप में पहचाने जाने वाले भारत के पास नई दवाओं, बायोसिमिलर्स और बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में विस्तार का व्यापक अवसर है। गौरतलब है कि जेनेरिक दवाओं में भारत की वैश्विक हिस्सेदारी पहले से ही उल्लेखनीय है, और अब सरकार इस आधार को इनोवेशन की ओर मोड़ना चाहती है।

स्वदेशी उत्पादन और औद्योगिक ढाँचे का विस्तार

मंत्री ने एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (एपीआई) और प्रमुख कच्चे माल के घरेलू उत्पादन को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान में आयात पर निर्भर उत्पादों का स्वदेशी विकल्प तैयार करना रणनीतिक दृष्टि से अनिवार्य है।

सरकार इस दिशा में बल्क ड्रग पार्क और 100 नए औद्योगिक पार्क विकसित कर रही है, जिनमें फार्मास्युटिकल और हेल्थकेयर कंपनियों के लिए समर्पित क्षेत्र उपलब्ध कराए जाएंगे। इसके अतिरिक्त, गोयल ने रिसर्च एंड डेवलपमेंट इनोवेशन फंड सहित अन्य सरकारी योजनाओं का अधिकतम लाभ उठाने का आह्वान किया।

विकसित भारत 2047 का लक्ष्य

गोयल ने इस पूरी रणनीति को विकसित भारत 2047 के व्यापक लक्ष्य से जोड़ा। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि भारत को 2047 तक एक विकसित अर्थव्यवस्था बनना है, तो उसे अपने उत्पाद स्वयं विकसित करने और उनका पेटेंट कराने की दिशा में निर्णायक कदम उठाने होंगे। आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और उद्योग जगत इस साझा निवेश मॉडल को किस गति और पैमाने पर अमल में लाते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह तभी ठोस बनेगा जब सरकार ₹1 लाख करोड़ के प्रस्तावित निवेश के लिए स्पष्ट समयसीमा और जवाबदेही ढाँचा प्रस्तुत करे — अभी तक केवल वैचारिक रूपरेखा सामने आई है। भारत का आरएंडडी व्यय GDP के 0.7% के आसपास वर्षों से ठहरा हुआ है, जबकि चीन और दक्षिण कोरिया जैसे प्रतिस्पर्धी देश 2–4% खर्च करते हैं — यह अंतर महज लागत-दक्षता से नहीं पाटा जा सकता। आईआईटी और मेडिकल कॉलेजों की क्षमता वास्तविक है, लेकिन उद्योग-अकादमिक सहयोग के पुराने प्रयास नौकरशाही और आईपी-स्वामित्व विवादों में उलझते रहे हैं। बिना संरचनात्मक सुधार के, यह दृष्टिकोण एक और प्रेरणादायक भाषण बनकर रह सकता है।
RashtraPress
9 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पीयूष गोयल ने भारत के आरएंडडी में ₹12 लाख करोड़ के अवसर की बात क्यों कही?
गोयल के अनुसार भारत में शोध की लागत यूरोप और स्विट्जरलैंड की तुलना में पाँचवें-छठे हिस्से पर है, जो भारत को वैश्विक आरएंडडी के लिए अत्यंत आकर्षक गंतव्य बनाती है। यदि सरकार और उद्योग मिलकर ₹2 लाख करोड़ का निवेश करें और आईआईटी व मेडिकल कॉलेजों की क्षमता का उपयोग हो, तो ₹10–12 लाख करोड़ का शोध कार्य संभव है।
इस आरएंडडी योजना में सरकार और उद्योग का निवेश कितना होगा?
प्रस्तावित मॉडल के अनुसार केंद्र सरकार लगभग ₹1 लाख करोड़ का निवेश करेगी और उद्योग जगत उसमें बराबर का योगदान देगा। यह साझा निवेश मॉडल आईआईटी, मेडिकल कॉलेजों और अन्य उत्कृष्टता केंद्रों के माध्यम से क्रियान्वित किया जाएगा।
भारत के फार्मा और हेल्थकेयर क्षेत्र को इससे क्या फायदा होगा?
गोयल ने क्लीनिकल ट्रायल, उत्पाद डिजाइन, बायोसिमिलर्स, बायोटेक्नोलॉजी और चिकित्सा उपकरण निर्माण में भारत की संभावनाओं को रेखांकित किया। एपीआई और प्रमुख कच्चे माल के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने से आयात निर्भरता घटेगी और भारत वैश्विक हेल्थकेयर आपूर्ति श्रृंखला में और मजबूत भूमिका निभाएगा।
बल्क ड्रग पार्क और 100 औद्योगिक पार्क योजना क्या है?
सरकार बल्क ड्रग पार्क और 100 नए औद्योगिक पार्क विकसित कर रही है जिनमें फार्मास्युटिकल और हेल्थकेयर कंपनियों के लिए समर्पित क्षेत्र होंगे। यह पहल स्वदेशी उत्पादन क्षमता को मजबूत करने और आयात पर निर्भरता कम करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
विकसित भारत 2047 लक्ष्य से आरएंडडी का क्या संबंध है?
गोयल ने स्पष्ट किया कि 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बनने के लिए भारत को अपने उत्पाद स्वयं विकसित करने और उनका पेटेंट कराने की दिशा में आगे बढ़ना होगा। केवल जेनेरिक दवाओं या असेंबली पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा — इनोवेशन और आईपी निर्माण इस यात्रा के केंद्र में होने चाहिए।
राष्ट्र प्रेस
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