रियल-टाइम सेल ऑब्जर्वेशन से कैंसर की दवा खोज में क्रांति संभव: डॉ. श्याम अग्रवाल
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के चेयरपर्सन डॉ. श्याम अग्रवाल के अनुसार, रियल-टाइम ऑब्जर्वेशन टेक्नोलॉजी शोधकर्ताओं को यह समझने में अहम भूमिका निभा सकती है कि जीवित कोशिकाएं संभावित दवाओं पर किस प्रकार प्रतिक्रिया देती हैं। उन्होंने कहा कि यह तकनीक सूक्ष्म बायोकेमिकल बदलावों की पहचान में तेज़ी ला सकती है और प्री-क्लिनिकल रिसर्च के दौरान असरदार इलाज के तरीकों को बेहतर ढंग से चिह्नित करने में सहायक हो सकती है।
विशेषज्ञ की राय: प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी की नई दिशा
डॉ. अग्रवाल ने कहा, 'कॉम्प्रिहेंसिव जीनोम प्रोफाइलिंग (CGP) और मिनिमल रेसिडुअल डिज़ीज़ डिटेक्शन (MRD) के साथ प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी को समझने से डॉक्टरों को कैंसर के मरीज़ों के लिए टारगेटेड पर्सनलाइज़्ड मेडिसिन को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।' यह टिप्पणी ऐसे समय में महत्त्वपूर्ण है जब भारत में कैंसर का बोझ लगातार बढ़ रहा है और नई दवाओं की खोज में सफलता दर अत्यंत कम बनी हुई है।
प्रिसिजेनेटिक्स का रियल-टाइम प्लेटफॉर्म
भारतीय मूल की बायोटेक उद्यमी परमिता मिश्रा, जो सैन फ्रांसिस्को स्थित कंपनी 'प्रिसिजेनेटिक्स' की संस्थापक और सीईओ हैं, ने इस तकनीक की कार्यप्रणाली स्पष्ट करते हुए कहा, 'जब शोधकर्ता जैविक ऑटोप्सी पर निर्भर रहने के बजाय लगातार यह मापते हैं कि कोशिकाएं कैसा व्यवहार करती हैं, तो उन्हें ऐसी जानकारी मिल सकती है जिसे पहले देखना असंभव था।' उनका यह प्लेटफॉर्म जीवित कोशिकाओं से रियल-टाइम बायोकेमिकल जानकारी हासिल करने में सक्षम है।
पारंपरिक प्रयोगशाला तकनीकों में विश्लेषण से पहले कोशिकाओं को स्टेन करने, फिक्स करने या तोड़ने की ज़रूरत होती है, जबकि यह प्लेटफॉर्म जीवित बायोलॉजी की निरंतर निगरानी करता है। इससे वैज्ञानिक अलग-थलग एंड-पॉइंट माप पर निर्भर रहने के बजाय समय के साथ सेलुलर व्यवहार का अध्ययन कर सकते हैं।
कैंसर से परे भी व्यापक संभावनाएं
मिश्रा के अनुसार, इस तकनीक का प्रभाव केवल कैंसर तक सीमित नहीं है — इम्यूनोलॉजी, न्यूरोसाइंस, दुर्लभ बीमारियाँ और रीजेनरेटिव मेडिसिन भी इसके दायरे में आते हैं। गौरतलब है कि कैंसर की दवा का विकास फार्मास्युटिकल रिसर्च के सबसे कठिन क्षेत्रों में से एक माना जाता है, और उद्योग के अध्ययनों के अनुसार क्लिनिकल डेवलपमेंट में आने वाली अधिकांश ऑन्कोलॉजी दवाएं मरीज़ों तक पहुँचने से पहले ही विफल हो जाती हैं।
भारत में कैंसर का बढ़ता बोझ
इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) के आँकड़ों के अनुसार, 2022 में भारत में कैंसर के अनुमानित 14 लाख नए मामले सामने आए। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने अनुमान लगाया है कि आने वाले दशक में देश में कैंसर का बोझ और बढ़ता रहेगा। इस परिप्रेक्ष्य में रियल-टाइम सेल ऑब्जर्वेशन जैसी तकनीकों का महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है।
आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तकनीक प्री-क्लिनिकल रिसर्च में व्यापक रूप से अपनाई जाती है, तो दवा विकास की सफलता दर में सुधार की संभावना है। वैज्ञानिक समुदाय अब इस दिशा में आगे के परीक्षणों और सहयोग की ओर देख रहा है।