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रियल-टाइम सेल ऑब्जर्वेशन से कैंसर की दवा खोज में क्रांति संभव: डॉ. श्याम अग्रवाल

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रियल-टाइम सेल ऑब्जर्वेशन से कैंसर की दवा खोज में क्रांति संभव: डॉ. श्याम अग्रवाल

सारांश

जीवित कोशिकाओं को रियल-टाइम में देखने की तकनीक कैंसर की दवा खोज को बदल सकती है — यह दावा है सर गंगा राम अस्पताल के डॉ. श्याम अग्रवाल और बायोटेक उद्यमी परमिता मिश्रा का। IARC के अनुसार 2022 में भारत में 14 लाख नए कैंसर मामले दर्ज हुए, और ICMR का अनुमान है कि यह बोझ और बढ़ेगा।

मुख्य बातें

श्याम अग्रवाल , चेयरपर्सन, मेडिकल ऑन्कोलॉजी, सर गंगा राम अस्पताल , के अनुसार रियल-टाइम ऑब्जर्वेशन तकनीक प्री-क्लिनिकल रिसर्च में कैंसर दवाओं की पहचान बेहतर कर सकती है।
CGP और MRD डिटेक्शन के साथ प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी से टारगेटेड पर्सनलाइज़्ड मेडिसिन को बढ़ावा मिलेगा।
परमिता मिश्रा की कंपनी प्रिसिजेनेटिक्स ( सैन फ्रांसिस्को ) जीवित कोशिकाओं की निरंतर निगरानी का प्लेटफॉर्म संचालित करती है।
IARC के अनुसार 2022 में भारत में कैंसर के अनुमानित 14 लाख नए मामले सामने आए।
ICMR का अनुमान है कि आने वाले दशक में भारत में कैंसर का बोझ और बढ़ेगा।

नई दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के चेयरपर्सन डॉ. श्याम अग्रवाल के अनुसार, रियल-टाइम ऑब्जर्वेशन टेक्नोलॉजी शोधकर्ताओं को यह समझने में अहम भूमिका निभा सकती है कि जीवित कोशिकाएं संभावित दवाओं पर किस प्रकार प्रतिक्रिया देती हैं। उन्होंने कहा कि यह तकनीक सूक्ष्म बायोकेमिकल बदलावों की पहचान में तेज़ी ला सकती है और प्री-क्लिनिकल रिसर्च के दौरान असरदार इलाज के तरीकों को बेहतर ढंग से चिह्नित करने में सहायक हो सकती है।

विशेषज्ञ की राय: प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी की नई दिशा

डॉ. अग्रवाल ने कहा, 'कॉम्प्रिहेंसिव जीनोम प्रोफाइलिंग (CGP) और मिनिमल रेसिडुअल डिज़ीज़ डिटेक्शन (MRD) के साथ प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी को समझने से डॉक्टरों को कैंसर के मरीज़ों के लिए टारगेटेड पर्सनलाइज़्ड मेडिसिन को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।' यह टिप्पणी ऐसे समय में महत्त्वपूर्ण है जब भारत में कैंसर का बोझ लगातार बढ़ रहा है और नई दवाओं की खोज में सफलता दर अत्यंत कम बनी हुई है।

प्रिसिजेनेटिक्स का रियल-टाइम प्लेटफॉर्म

भारतीय मूल की बायोटेक उद्यमी परमिता मिश्रा, जो सैन फ्रांसिस्को स्थित कंपनी 'प्रिसिजेनेटिक्स' की संस्थापक और सीईओ हैं, ने इस तकनीक की कार्यप्रणाली स्पष्ट करते हुए कहा, 'जब शोधकर्ता जैविक ऑटोप्सी पर निर्भर रहने के बजाय लगातार यह मापते हैं कि कोशिकाएं कैसा व्यवहार करती हैं, तो उन्हें ऐसी जानकारी मिल सकती है जिसे पहले देखना असंभव था।' उनका यह प्लेटफॉर्म जीवित कोशिकाओं से रियल-टाइम बायोकेमिकल जानकारी हासिल करने में सक्षम है।

पारंपरिक प्रयोगशाला तकनीकों में विश्लेषण से पहले कोशिकाओं को स्टेन करने, फिक्स करने या तोड़ने की ज़रूरत होती है, जबकि यह प्लेटफॉर्म जीवित बायोलॉजी की निरंतर निगरानी करता है। इससे वैज्ञानिक अलग-थलग एंड-पॉइंट माप पर निर्भर रहने के बजाय समय के साथ सेलुलर व्यवहार का अध्ययन कर सकते हैं।

कैंसर से परे भी व्यापक संभावनाएं

मिश्रा के अनुसार, इस तकनीक का प्रभाव केवल कैंसर तक सीमित नहीं है — इम्यूनोलॉजी, न्यूरोसाइंस, दुर्लभ बीमारियाँ और रीजेनरेटिव मेडिसिन भी इसके दायरे में आते हैं। गौरतलब है कि कैंसर की दवा का विकास फार्मास्युटिकल रिसर्च के सबसे कठिन क्षेत्रों में से एक माना जाता है, और उद्योग के अध्ययनों के अनुसार क्लिनिकल डेवलपमेंट में आने वाली अधिकांश ऑन्कोलॉजी दवाएं मरीज़ों तक पहुँचने से पहले ही विफल हो जाती हैं।

भारत में कैंसर का बढ़ता बोझ

इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) के आँकड़ों के अनुसार, 2022 में भारत में कैंसर के अनुमानित 14 लाख नए मामले सामने आए। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने अनुमान लगाया है कि आने वाले दशक में देश में कैंसर का बोझ और बढ़ता रहेगा। इस परिप्रेक्ष्य में रियल-टाइम सेल ऑब्जर्वेशन जैसी तकनीकों का महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है।

आगे की राह

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तकनीक प्री-क्लिनिकल रिसर्च में व्यापक रूप से अपनाई जाती है, तो दवा विकास की सफलता दर में सुधार की संभावना है। वैज्ञानिक समुदाय अब इस दिशा में आगे के परीक्षणों और सहयोग की ओर देख रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि ये दावे अभी प्री-क्लिनिकल स्तर पर हैं — क्लिनिकल परीक्षण और नियामक अनुमोदन की लंबी राह अभी बाकी है। भारत में कैंसर का बढ़ता बोझ नई तकनीकों की माँग तो बढ़ाता है, लेकिन असली प्रश्न यह है कि ये प्लेटफॉर्म भारतीय शोध संस्थानों और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली तक कब और कैसे पहुँचेंगे। अत्याधुनिक बायोटेक अक्सर निजी और विदेशी प्रयोगशालाओं तक सीमित रह जाती है, जबकि ICMR जैसी संस्थाओं को इसे व्यापक पहुँच देने के लिए ठोस साझेदारी की ज़रूरत होगी।
RashtraPress
8 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रियल-टाइम ऑब्जर्वेशन टेक्नोलॉजी कैंसर के इलाज में कैसे मदद करती है?
यह तकनीक जीवित कोशिकाओं की निरंतर निगरानी करती है, जिससे शोधकर्ता यह देख सकते हैं कि कोशिकाएं संभावित दवाओं पर समय के साथ कैसी प्रतिक्रिया देती हैं। डॉ. श्याम अग्रवाल के अनुसार, इससे प्री-क्लिनिकल रिसर्च में असरदार इलाज की बेहतर पहचान हो सकती है।
प्रिसिजेनेटिक्स का प्लेटफॉर्म पारंपरिक तकनीकों से कैसे अलग है?
पारंपरिक प्रयोगशाला तकनीकों में विश्लेषण से पहले कोशिकाओं को स्टेन, फिक्स या तोड़ना पड़ता है, जबकि प्रिसिजेनेटिक्स का प्लेटफॉर्म जीवित बायोलॉजी की लगातार निगरानी करता है। इससे वैज्ञानिक समय के साथ सेलुलर व्यवहार का अध्ययन कर सकते हैं, न कि केवल एकल एंड-पॉइंट पर।
भारत में कैंसर की स्थिति कितनी गंभीर है?
IARC के आँकड़ों के अनुसार 2022 में भारत में कैंसर के अनुमानित 14 लाख नए मामले सामने आए। ICMR का अनुमान है कि आने वाले दशक में यह बोझ और बढ़ता रहेगा।
CGP और MRD डिटेक्शन कैंसर उपचार में क्या भूमिका निभाते हैं?
कॉम्प्रिहेंसिव जीनोम प्रोफाइलिंग (CGP) और मिनिमल रेसिडुअल डिज़ीज़ डिटेक्शन (MRD) प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी के प्रमुख उपकरण हैं। डॉ. अग्रवाल के अनुसार, इनके माध्यम से डॉक्टर कैंसर मरीज़ों के लिए टारगेटेड और पर्सनलाइज़्ड उपचार बेहतर ढंग से तय कर सकते हैं।
क्या यह तकनीक केवल कैंसर तक सीमित है?
नहीं, परमिता मिश्रा के अनुसार इस तकनीक के प्रभाव इम्यूनोलॉजी, न्यूरोसाइंस, दुर्लभ बीमारियों और रीजेनरेटिव मेडिसिन तक भी फैले हुए हैं। हालाँकि अभी यह तकनीक मुख्यतः शोध स्तर पर है।
राष्ट्र प्रेस
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