सीमा कालीरमन का एशियन गेम्स में बड़ा लक्ष्य: 'कांस्य से ऊपर उठना है, पदक का रंग बदलूंगी'
सारांश
मुख्य बातें
डिस्कस थ्रो एथलीट सीमा कालीरमन ने ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में 58.65 मीटर के थ्रो के साथ कांस्य पदक जीतने के बाद अपना अगला लक्ष्य तय कर लिया है — जापान में होने वाले एशियन गेम्स में पदक का रंग बदलना। आर्थराइटिस से उबरकर, पीएचडी करते हुए और चार साल के बेटे से दूर रहकर यह उपलब्धि हासिल करने वाली सीमा का सफर खेल जगत में प्रेरणा की एक अनूठी मिसाल बन चुका है।
कॉमनवेल्थ में मानसिक दृढ़ता की जीत
सीमा ने बताया कि ग्लासगो में उनका पहला थ्रो नेट से टकरा गया, लेकिन उन्होंने घबराने की बजाय खुद को यह याद दिलाया कि उनके पास अभी पाँच थ्रो बाकी हैं। उनका दूसरा थ्रो लगभग 57 मीटर तक गया, और तीसरे प्रयास में उन्होंने 58.65 मीटर का थ्रो फेंककर पदक पक्का किया। उन्होंने कहा, "अगर मैं मानसिक रूप से तैयार नहीं होती, तो मैं अपने दूसरे थ्रो भी अच्छे से नहीं कर पाती।"
पीएचडी और खेल: एक साथ दो मोर्चे
सीमा इस समय पीएचडी कर रही हैं और उनके शोध का विषय है — 'एथलीटों की परफॉर्मेंस पर इमेजिनरी और पॉजिटिव सेल्फ-टॉक ट्रेनिंग का असर'। उल्लेखनीय है कि वह यही तकनीक मैदान पर खुद भी आज़माती हैं। उन्होंने कहा, "मैं इसे खुद पर लागू कर रही हूं, और इससे मुझे अच्छे परिणाम मिले हैं, इसमें कॉमनवेल्थ भी शामिल है।" शनिवार-रविवार और अन्य आराम के दिनों का उपयोग वह अपनी पीएचडी के लिए करती हैं, ताकि खेल की तैयारी प्रभावित न हो।
आर्थराइटिस से वापसी: पति-कोच रविंदर का साथ
2022 में बेटे के जन्म के बाद सीमा को आर्थराइटिस ने जकड़ लिया। उनका वजन 80-85 किग्रा से घटकर 50-55 किग्रा हो गया। डॉक्टरों ने स्टेरॉयड लेने की सलाह दी, लेकिन उनके पति और कोच रविंदर ने उन्हें मसल्स ट्रेनिंग के ज़रिए ठीक होने का रास्ता दिखाया। सीमा ने बताया, "मेरे पति ने मुझसे कहा कि हम प्रैक्टिस और ट्रेनिंग करेंगे, जिससे मुझे मसल्स बनाने में मदद मिलेगी और इससे आर्थराइटिस का दर्द काफी कम हो सकता है।" आज आर्थराइटिस का दर्द स्थायी नहीं रहा, हालांकि वह कभी-कभी लौट आता है।
खान-पान और सतर्कता
हाल के सिल्वर कॉन्टिनेंटल टूर के दौरान सीमा के हाथों और पैरों में सूजन आ गई थी। कुछ दिनों की जाँच के बाद उन्हें कारण पता चला और उन्होंने उस खाद्य पदार्थ को छोड़ दिया। उन्होंने कहा, "मुझे इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि क्या खाना है और क्या नहीं।" यह सतर्कता उनके प्रदर्शन को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है।
माँ, शोधकर्ता और एथलीट: तीन भूमिकाओं का संतुलन
सीमा का चार साल का बेटा भिवानी में दादा-दादी के साथ रहता है और कभी-कभी उनसे मिलने पटियाला आता है, जहाँ वह 2-3 दिन रुककर वापस चला जाता है। सीमा ने स्वीकार किया कि ट्रेनिंग के कारण बेटे से दूर रहना भावनात्मक रूप से कठिन है, लेकिन परिवार के सहयोग ने यह संतुलन संभव बनाया है। एशियन गेम्स में बेहतर पदक की उनकी प्रतिबद्धता इस पूरे संघर्ष को और अर्थपूर्ण बना देती है।