भक्ति शर्मा ने पैरा शूटिंग वर्ल्ड चैंपियनशिप 2026 में जीते ब्रॉन्ज और सिल्वर, पिता बोले- 'नतीजे मिलते हैं तो कठिनाइयाँ भूल जाते हैं'
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय पैरा शूटर भक्ति शर्मा ने साउथ कोरिया के चांगवोन में आयोजित पैरा शूटिंग वर्ल्ड चैंपियनशिप 2026 में देश का परचम लहराया है। उन्होंने 10 मीटर एयर पिस्टल SH1 के व्यक्तिगत फाइनल में ब्रॉन्ज मेडल जीता, जबकि टीम स्पर्धा में सिल्वर मेडल हासिल किया। दिल्ली के विवेक विहार की रहने वाली भक्ति की यह उपलब्धि इसलिए और भी उल्लेखनीय है क्योंकि वे बहु-विकलांगता से पीड़ित हैं।
भक्ति की चुनौतियाँ और जज़्बा
भक्ति ठीक से बोल और सुन नहीं पाती हैं, और उन्हें चलने में भी कठिनाई होती है। इन तमाम शारीरिक बाधाओं के बावजूद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। उनके पिता योगेंद्र कुमार शर्मा ने बताया कि आम बच्चों की तरह सक्षम न होने के कारण भक्ति को जीवन में कई कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं, लेकिन जब नतीजे सामने आते हैं तो वे और उनकी बेटी ये सब भूल जाते हैं।
कोचिंग और प्रशिक्षण की राह
योगेंद्र कुमार शर्मा ने बताया, 'शुरुआत में हमने थोड़ी-बहुत कोचिंग ली। अभी पैरालंपिक कमेटी ऑफ इंडिया के चेयरमैन जेपी नौटियाल भक्ति को कोचिंग देते हैं।' उन्होंने आगे कहा कि नौटियाल ने भक्ति के साथ रहकर सांकेतिक भाषा (साइन) सीखी और समझी, और वे ही भक्ति को मैनेज करते हैं। यह जुड़ाव भक्ति की तैयारी में एक अहम मोड़ साबित हुआ है।
सरकार और स्पॉन्सरशिप का सहयोग
पिता ने बताया कि सरकार की ओर से भक्ति को पर्याप्त सहायता मिलती है। उन्होंने कहा, 'सरकार ही हमें देश से बाहर ले जाने और वापस लेकर आने के इंतजाम करती है।' इसके साथ ही OGQ (Olympic Gold Quest) भक्ति की स्पॉन्सर है, जिसका उन्होंने विशेष रूप से आभार जताया। उन्होंने अपनी पूरी टीम और कोचों का भी धन्यवाद किया।
एशियन पैरालंपिक गेम्स की तैयारी
योगेंद्र कुमार शर्मा ने बताया कि भक्ति आगे एशियन गेम्स पैरालंपिक में भी हिस्सा लेंगी। यह खुलासा इस बात का संकेत है कि चांगवोन की यह सफलता भक्ति के लिए एक बड़े सफर का हिस्सा मात्र है।
हार न मानने का संदेश
भक्ति के पिता ने शारीरिक चुनौतियों से जूझ रहे सभी बच्चों को एक प्रेरणादायक संदेश दिया। उन्होंने कहा, 'हारना कभी नहीं चाहिए। हमेशा कोशिश जारी रखनी चाहिए। कोशिश करते-करते कभी न कभी आप मुकाम हासिल कर लेंगे।' भक्ति की यह यात्रा उन तमाम परिवारों के लिए एक उम्मीद की किरण है जो विकलांगता को नियति नहीं, बल्कि एक चुनौती मानते हैं।