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दीपा कर्माकर: प्रोडुनोवा वॉल्ट पर महारत रखने वाली भारत की पहली ओलंपिक जिम्नास्ट

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दीपा कर्माकर: प्रोडुनोवा वॉल्ट पर महारत रखने वाली भारत की पहली ओलंपिक जिम्नास्ट

सारांश

चपटे पैरों से ओलंपिक फाइनल तक — दीपा कर्माकर की कहानी सिर्फ एक एथलीट की नहीं, बल्कि उस देश की है जिसने जिम्नास्टिक में 52 साल बाद ओलंपिक मंच पर वापसी की। प्रोडुनोवा वॉल्ट की दुनिया की पाँच महारथियों में शामिल यह त्रिपुरा की बेटी भारतीय खेल इतिहास में अमर हो गई है।

मुख्य बातें

दीपा कर्माकर का जन्म 9 अगस्त 1993 को अगरतला, त्रिपुरा में हुआ; उन्होंने 6 वर्ष की उम्र में जिम्नास्टिक शुरू किया।
वह दुनिया की केवल पाँच महिलाओं में से एक हैं जिन्होंने प्रोडुनोवा वॉल्ट में महारत हासिल की है।
ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2014 में कांस्य पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला जिम्नास्ट बनीं।
रियो ओलंपिक 2016 के फाइनल में पहुँचीं; 0.15 अंकों से पदक चूककर चौथे स्थान पर रहीं।
जुलाई 2018 में मर्सिन, तुर्की में FIG वर्ल्ड चैलेंज कप में स्वर्ण पदक जीता — किसी अंतरराष्ट्रीय इवेंट में स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय जिम्नास्ट।
सरकार ने अर्जुन पुरस्कार (2015) , खेल रत्न (2016) और पद्मश्री (2017) से सम्मानित किया; 2024 में संन्यास लिया।

भारतीय खेल इतिहास में दीपा कर्माकर वह नाम हैं जिन्होंने जिम्नास्टिक जैसे अत्यंत कठिन खेल में देश को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। दीपा दुनिया की उन केवल पाँच महिला जिम्नास्टों में शामिल हैं जिन्होंने जानलेवा माने जाने वाले प्रोडुनोवा वॉल्ट में महारत हासिल की है। 2016 रियो ओलंपिक के फाइनल तक पहुँचने वाली वह स्वतंत्र भारत की पहली महिला जिम्नास्ट हैं।

संघर्ष से शुरू हुई यात्रा

9 अगस्त 1993 को अगरतला, त्रिपुरा में जन्मी दीपा ने मात्र 6 वर्ष की आयु में जिम्नास्टिक का अभ्यास शुरू किया। उनके कोच बिश्वेश्वर नंदी और सोमा नंदी ने उनकी प्रतिभा को तराशा। शुरुआत में दीपा के पैर चपटे थे — जिम्नास्टिक में यह एक बड़ी बाधा मानी जाती है क्योंकि इससे संतुलन और प्रदर्शन प्रभावित होता है। परंतु वर्षों की कठोर ट्रेनिंग से उन्होंने अपने पैरों में प्राकृतिक आर्च विकसित किया — यह अपने आप में उनके अदम्य संकल्प की मिसाल है।

2008 में जलपाईगुड़ी में आयोजित जूनियर नेशनल चैंपियनशिप जीतकर उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। यह जीत उनके करियर की नींव बनी।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर उभरीं

ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2014 में दीपा ने कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा — वह कॉमनवेल्थ खेलों में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला जिम्नास्ट बनीं। इसके बाद उन्होंने एशियन चैंपियनशिप में भी कांस्य पदक हासिल किया। 2015 वर्ल्ड चैंपियनशिप में उन्होंने पाँचवाँ स्थान प्राप्त किया, जो किसी भारतीय जिम्नास्ट का विश्व स्तर पर अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था।

रियो ओलंपिक 2016 — ऐतिहासिक पल

दीपा के करियर का सबसे यादगार अध्याय 2016 रियो ओलंपिक में लिखा गया। वह ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने वाली देश की पहली महिला जिम्नास्ट बनीं और फाइनल में भी जगह बनाई। गौरतलब है कि 1964 टोक्यो ओलंपिक के बाद यह पहला मौका था जब किसी भारतीय जिम्नास्ट ने ओलंपिक में भाग लिया — यानी 52 वर्षों का लंबा इंतजार। दीपा केवल 0.15 अंकों से पदक से चूक गईं और चौथे स्थान पर रहीं। यह मामूली अंतर भारतीय खेल प्रेमियों के लिए आज भी एक भावुक स्मृति है।

विश्व चैलेंज कप में स्वर्णिम सफलता

जुलाई 2018 में मर्सिन, तुर्की में आयोजित FIG आर्टिस्टिक जिम्नास्टिक्स वर्ल्ड चैलेंज कप के वॉल्ट इवेंट में दीपा ने स्वर्ण पदक जीता। किसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में शीर्ष स्थान पाने वाली वह पहली भारतीय जिम्नास्ट बनीं। यह उपलब्धि उनके संघर्षपूर्ण सफर की सबसे चमकीली कड़ी है।

सम्मान और विरासत

भारत सरकार ने दीपा की उपलब्धियों को मान्यता देते हुए उन्हें 2015 में अर्जुन पुरस्कार, 2016 में मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार, और 2017 में पद्मश्री से सम्मानित किया। 2024 में उन्होंने जिम्नास्टिक से संन्यास लिया। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों की जिम्नास्टों को प्रेरणा देती रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है — बेहतर सुविधाएँ और समय पर समर्थन शायद वह अंतर पाट सकता था। यह भी विचारणीय है कि 1964 से 2016 तक के 52 वर्षों में भारत एक भी जिम्नास्ट ओलंपिक तक नहीं पहुँचा सका — दीपा की उपलब्धि इस शून्य को तोड़ती है, पर यह शून्य क्यों बना रहा, यह सवाल अनुत्तरित है।
RashtraPress
8 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दीपा कर्माकर कौन हैं और वह क्यों प्रसिद्ध हैं?
दीपा कर्माकर त्रिपुरा की अगरतला से ताल्लुक रखने वाली भारतीय जिम्नास्ट हैं, जो 2016 रियो ओलंपिक के फाइनल में पहुँचने वाली देश की पहली महिला जिम्नास्ट बनीं। वह दुनिया की केवल पाँच महिलाओं में से एक हैं जिन्होंने अत्यंत कठिन प्रोडुनोवा वॉल्ट में महारत हासिल की है।
प्रोडुनोवा वॉल्ट क्या है और यह इतना कठिन क्यों है?
प्रोडुनोवा वॉल्ट जिम्नास्टिक का सबसे खतरनाक वॉल्ट माना जाता है, जिसमें हवा में दोहरी आगे की सोमरसॉल्ट शामिल होती है। इसे करने में गंभीर चोट का जोखिम होता है, इसीलिए दुनियाभर में केवल पाँच महिला जिम्नास्टों ने ही इसे अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सफलतापूर्वक किया है।
दीपा कर्माकर रियो ओलंपिक 2016 में पदक क्यों नहीं जीत पाईं?
दीपा कर्माकर रियो ओलंपिक 2016 के वॉल्ट फाइनल में चौथे स्थान पर रहीं और केवल 0.15 अंकों के अंतर से कांस्य पदक से चूक गईं। यह भारतीय जिम्नास्टिक इतिहास का सबसे करीबी और भावुक पल माना जाता है।
दीपा कर्माकर को कौन-कौन से राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं?
भारत सरकार ने दीपा कर्माकर को 2015 में अर्जुन पुरस्कार, 2016 में मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार और 2017 में पद्मश्री से सम्मानित किया। ये तीनों पुरस्कार भारतीय खेल जगत के सर्वोच्च सम्मानों में गिने जाते हैं।
दीपा कर्माकर ने जिम्नास्टिक से संन्यास कब लिया?
दीपा कर्माकर ने 2024 में जिम्नास्टिक से संन्यास लिया। अपने करियर में उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स कांस्य, FIG वर्ल्ड चैलेंज कप स्वर्ण और ओलंपिक फाइनल जैसी उपलब्धियाँ हासिल कीं, जो भारतीय जिम्नास्टिक में अब तक अद्वितीय हैं।
राष्ट्र प्रेस
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