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जिम्मी जॉर्ज: भारतीय वॉलीबॉल का 'गॉड' और उनकी प्रेरणादायक कहानी

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जिम्मी जॉर्ज: भारतीय वॉलीबॉल का 'गॉड' और उनकी प्रेरणादायक कहानी

सारांश

जिम्मी जॉर्ज, जिन्हें 'गॉड ऑफ भारतीय वॉलीबॉल' कहा जाता है, ने वॉलीबॉल को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाया। उनके योगदान और उपलब्धियां भारतीय वॉलीबॉल को एक नई ऊंचाई पर ले गईं। जानें उनकी प्रेरणादायक कहानी।

मुख्य बातें

जिम्मी जॉर्ज भारतीय वॉलीबॉल के सबसे बड़े प्रतीकों में से एक हैं।
उन्होंने अपने जीवन को वॉलीबॉल के लिए समर्पित किया।
उनकी ऊंचाई और खेल कौशल ने उन्हें अद्वितीय बनाया।
उनकी उपलब्धियों ने भारतीय वॉलीबॉल को नई पहचान दी।
जिम्मी जॉर्ज की प्रेरणा आज भी युवा खिलाड़ियों के लिए महत्वपूर्ण है।

नई दिल्ली, 7 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। भारत में वॉलीबॉल का खेल अन्य प्रमुख खेलों की तुलना में काफी कम लोकप्रिय है और अभी भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है। लेकिन एक ऐसा अद्वितीय खिलाड़ी हैं, जिन्होंने वॉलीबॉल को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाया और जिन्हें 'गॉड ऑफ भारतीय वॉलीबॉल' कहा जाता है। हम यहाँ जिम्मी जॉर्ज के बारे में चर्चा कर रहे हैं।

जिम्मी जॉर्ज का जन्म ८ मार्च १९५५ को केरल के कन्नूर जिले के पेरवूर में हुआ था। उनके पिता, जोसेफ जॉर्ज, एक वकील और पूर्व यूनिवर्सिटी स्तर के वॉलीबॉल खिलाड़ी थे। उनकी माता का नाम मैरी जॉर्ज था। जिम्मी के परिवार में खेल का वातावरण था, और उन्हें वॉलीबॉल का शौक अपने पिता से मिला। पढ़ाई में भी वे कुशाग्र थे और सरकारी कॉलेज में मेडिकल सीट हासिल की थी, लेकिन वॉलीबॉल के प्रति अपने प्रेम के कारण उन्होंने चिकित्सा को छोड़ दिया।

जिम्मी जॉर्ज ने १६ वर्ष१९७३ और १९७६ के बीच लगातार चार ऑल इंडिया इंटर-यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप खिताब दिलाने में योगदान दिया और १९७३ में टीम के कप्तान बने।

जिम्मी जॉर्ज १९७४ में तेहरान में आयोजित एशियन गेम्स में भारतीय राष्ट्रीय वॉलीबॉल टीम का हिस्सा रहे। हालांकि भारत उस संस्करण में ग्रुप स्टेज से आगे नहीं बढ़ सका, लेकिन १९ वर्षीय जिमी ने अपनी प्रतिभा से सभी को प्रभावित किया।

साल १९७६ में, जिम्मी ने वॉलीबॉल पर ध्यान केंद्रित करने के लिए मेडिकल कॉलेज छोड़ दिया और केरल पुलिस में शामिल हो गए।

जिम्मी जॉर्ज ने २१ वर्ष की आयु में अर्जुन पुरस्कार प्राप्त किया, जो उन्हें भारत के सर्वोच्च खेल पुरस्कारों में से एक पाने वाले सबसे युवा वॉलीबॉल खिलाड़ी बनाता है।

जिम्मी ने रूसी कोच सर्गेई इवानोविच गैवरिलोव की सलाह पर वॉलीबॉल को पेशेवर रूप से अपनाया और १९७९ में अबू धाबी स्पोर्ट्स क्लब के लिए खेलने के लिए विदेश गए। इस तरह वे इतिहास में पहले भारतीय पेशेवर वॉलीबॉल खिलाड़ी बने। अबू धाबी में तीन वर्षों के दौरान उन्हें फारस की खाड़ी क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ वॉलीबॉल खिलाड़ी का खिताब मिला।

जिम्मी जॉर्ज ने १९८२ में इटालियन क्लब पल्लावोलो ट्रेविसो के साथ करार किया और वहां दुनिया के बेहतरीन वॉलीबॉल खिलाड़ियों के साथ खेला। इटली में उन्होंने सात सीज़न में विभिन्न क्लबों में खेलते हुए एक बड़ा नाम बनाया।

जिम्मी की ऊंचाई ६ फीट २ इंच थी, जिसने उन्हें वॉलीबॉल में विशेष सफलता दिलाई। वे अपनी ऊंची छलांग और गेंद को उछालने एवं सर्व करने की क्षमता के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने १९८५ में सऊदी अरब में भारत की कप्तानी की और १९८६ में हैदराबाद में इंडिया गोल्ड कप इंटरनेशनल वॉलीबॉल टूर्नामेंट का नेतृत्व किया। उन्होंने सियोल १९८६ एशियाई खेलों में जापान को हराकर भारतीय टीम को कांस्य पदक दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस समय को भारतीय वॉलीबॉल का स्वर्णिम युग कहा जाता है।

जिम्मी जॉर्ज ने १९८७-८८ सीज़न के लिए इटली के शीर्ष डिवीजन क्लब यूरोस्टाइल-यूरोसिबा के साथ करार किया। ३० नवंबर १९८७ को ३२ वर्ष की आयु में उनकी इटली में एक कार दुर्घटना में मृत्यु हो गई।

जिम्मी जॉर्ज की लोकप्रियता भारत से अधिक इटली में है। केरल में उनके नाम पर एक स्टेडियम और कई वॉलीबॉल प्रतियोगिताओं का नाम रखा गया है। १९९३ में इटली के ब्रेशिया प्रांत में मोंटिचियारी में पलाजॉर्ज नामक एक इनडोर स्टेडियम उन्हें समर्पित किया गया था।

यदि जिम्मी जॉर्ज आज जीवित होते, तो निश्चित रूप से भारत में वॉलीबॉल की स्थिति आज से बेहतर होती।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक प्रेरणा की कहानी है। उनके योगदान ने भारतीय वॉलीबॉल को नई पहचान दी और उनकी उपलब्धियों ने युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी।
RashtraPress
11 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जिम्मी जॉर्ज कौन थे?
जिम्मी जॉर्ज भारतीय वॉलीबॉल के महान खिलाड़ियों में से एक थे, जिन्हें 'गॉड ऑफ भारतीय वॉलीबॉल' के नाम से जाना जाता है।
जिम्मी जॉर्ज ने कब अपना मेडिकल कॉलेज छोड़ा?
जिम्मी जॉर्ज ने १९७६ में वॉलीबॉल पर ध्यान केंद्रित करने के लिए मेडिकल कॉलेज छोड़ा।
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या थी?
जिम्मी जॉर्ज ने १९८६ एशियाई खेलों में भारतीय टीम को कांस्य पदक दिलाने में मदद की, जिसे भारतीय वॉलीबॉल का स्वर्ण युग माना जाता है।
जिम्मी जॉर्ज की मृत्यु कब हुई?
जिम्मी जॉर्ज की मृत्यु ३० नवंबर १९८७ को एक कार दुर्घटना में हुई।
क्या जिम्मी जॉर्ज को कोई पुरस्कार मिला था?
हाँ, उन्हें २१
राष्ट्र प्रेस
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