विनेश फोगाट केस: दिल्ली हाईकोर्ट ने WFI से माँगा जवाब, 29 सितंबर को अगली सुनवाई
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली हाईकोर्ट ने 1 सितंबर 2026 को पहलवान विनेश फोगाट की याचिका पर भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) से जवाब तलब किया है। फोगाट ने अपने खिलाफ जारी 'शो-कॉज नोटिस' और अनुशासनात्मक कार्रवाई को अदालत में चुनौती दी है। मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को निर्धारित की गई है।
अदालत में क्या हुआ
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने स्पष्ट किया कि वह इस मामले में कोई औपचारिक नोटिस जारी नहीं कर रही हैं। अदालत ने WFI के वकील को 29 सितंबर तक अपने मुवक्किल से निर्देश प्राप्त कर जवाब दाखिल करने को कहा है।
विनेश के आरोप क्या हैं
फोगाट का कहना है कि उन्हें 9 मई और 17 जून को दो अलग-अलग नोटिस जारी किए गए। उनका आरोप है कि यह WFI की मनमानी और दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई का हिस्सा है, जिसके ज़रिए मातृत्व अवकाश के बाद प्रतिस्पर्धी कुश्ती में उनकी वापसी में जानबूझकर बाधा डाली गई।
दूसरी याचिका: महिला एथलीटों के लिए नीति की माँग
दिल्ली हाईकोर्ट ने फोगाट की एक दूसरी याचिका पर भी सुनवाई की। इसमें उन्होंने माँग की है कि WFI को निर्देश दिया जाए कि वह गर्भावस्था के बाद महिला एथलीटों की प्रतिस्पर्धी खेलों में वापसी को नियंत्रित करने के लिए निष्पक्ष, संरचित और पारदर्शी दिशानिर्देश लागू करे। यह याचिका केवल फोगाट की व्यक्तिगत शिकायत नहीं, बल्कि देशभर की महिला खिलाड़ियों की एक बड़ी नीतिगत माँग है।
विनेश फोगाट की पृष्ठभूमि
32 वर्षीय विनेश फोगाट ने पेरिस ओलंपिक 2024 के फाइनल में जगह बनाई थी, लेकिन वज़न अधिक पाए जाने पर उन्हें फाइनल मुकाबले से अयोग्य घोषित कर दिया गया था। इस घटना के बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कुश्ती से संन्यास की घोषणा कर दी थी।
हालाँकि, कुछ समय बाद उन्होंने ओलंपिक पदक जीतने के लक्ष्य के साथ कुश्ती में वापसी का ऐलान किया और अभ्यास भी शुरू किया। लेकिन वह एशियन गेम्स के लिए हुए ट्रायल में क्वालीफाई नहीं कर पाईं। उन्होंने इन ट्रायल में WFI पर पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने और उनकी राह में अड़चनें खड़ी करने का आरोप लगाया था। गौरतलब है कि विनेश एशियन गेम्स, एशियन चैंपियनशिप और कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं।
आगे क्या होगा
29 सितंबर को होने वाली अगली सुनवाई में WFI का पक्ष सामने आएगा। यह मामला न केवल विनेश फोगाट की व्यक्तिगत लड़ाई है, बल्कि यह भारतीय खेल प्रशासन में महिला एथलीटों के अधिकारों और मातृत्व नीति पर एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल बन सकता है।