एआईयूडीएफ प्रमुख बदरुद्दीन अजमल ने संदिग्ध अवैध बांग्लादेशियों की 'पुशबैक' को बताया असंवैधानिक
सारांश
मुख्य बातें
अखिल भारतीय संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (एआईयूडीएफ) के अध्यक्ष और बिन्नाकंडी से विधायक बदरुद्दीन अजमल ने 7 जुलाई को गुवाहाटी में पत्रकारों से बातचीत के दौरान संदिग्ध अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान, निर्वासन और कथित 'पुशबैक' की प्रक्रिया को गैरकानूनी और असंवैधानिक करार दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसी किसी भी कार्रवाई को कानून और संविधान के दायरे में ही अंजाम दिया जाना चाहिए।
अजमल के मुख्य आरोप
अजमल ने 'वापसी' यानी पुशबैक की प्रथा को 'पूरी तरह गैरकानूनी, अवैध और गलत' बताया। उन्होंने इसे 'अत्याचार' की संज्ञा दी और कहा कि यह स्थापित कानूनी एवं संवैधानिक सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है। उनके अनुसार, जो लोग संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी कर ऐसे कदम उठाते हैं, वे वास्तव में संविधान का सम्मान नहीं करते।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि संदिग्ध अवैध प्रवासियों से जुड़े संवेदनशील मामलों में संवैधानिक सुरक्षा उपायों और उचित कानूनी प्रक्रियाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
आँकड़ों पर अजमल का स्पष्टीकरण
संदिग्ध अवैध प्रवासियों की संख्या को लेकर अपनी पूर्व टिप्पणियों के संदर्भ में अजमल ने कहा कि उनके द्वारा उद्धृत आँकड़े सरकारी रिकॉर्ड पर आधारित थे। हालाँकि, उन्होंने स्वीकार किया कि सटीक संख्याएँ वे बाद में उपलब्ध कराएँगे। यह स्पष्टीकरण ऐसे समय में आया जब विपक्षी दलों और सत्तारूढ़ पक्ष के बीच प्रवासी आँकड़ों को लेकर विवाद जारी है।
असम में अवैध प्रवासन का राजनीतिक संदर्भ
यह ऐसे समय में आया है जब असम सरकार राज्य में अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों की पहचान और निर्वासन अभियान को तेज़ कर रही है। बांग्लादेश से अवैध अप्रवासन का मुद्दा दशकों से असम की राजनीति में केंद्रीय स्थान रखता है। गौरतलब है कि लगातार सरकारों ने जनसांख्यिकीय बदलावों, सीमा सुरक्षा और विदेशी नागरिक न्यायाधिकरणों (Foreigners Tribunals) के माध्यम से कानूनी निर्वासन प्रक्रिया को लेकर चिंताएँ जताई हैं।
आलोचकों का कहना है कि बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के की गई पुशबैक कार्रवाइयाँ न केवल भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार) का उल्लंघन करती हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के भी विरुद्ध हो सकती हैं।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में किसी भी व्यक्ति को — चाहे वह विदेशी नागरिक ही क्यों न हो — निर्वासित करने से पहले विदेशी अधिनियम, 1946 और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 के तहत उचित न्यायिक या अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। बिना इस प्रक्रिया के की गई कार्रवाई न्यायालय में चुनौती के योग्य हो सकती है।
आगे की राह
अजमल की यह टिप्पणी असम विधानसभा के अगले सत्र से पहले राजनीतिक तापमान को और बढ़ा सकती है। एआईयूडीएफ ने संकेत दिया है कि वह इस मुद्दे को विधानसभा में उठाएगी और यदि जरूरत पड़ी तो न्यायिक हस्तक्षेप की माँग भी की जा सकती है। राज्य सरकार की ओर से अभी तक अजमल के आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।