7 जुलाई 2026
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एआईयूडीएफ प्रमुख बदरुद्दीन अजमल ने संदिग्ध अवैध बांग्लादेशियों की 'पुशबैक' को बताया असंवैधानिक

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एआईयूडीएफ प्रमुख बदरुद्दीन अजमल ने संदिग्ध अवैध बांग्लादेशियों की 'पुशबैक' को बताया असंवैधानिक

सारांश

एआईयूडीएफ प्रमुख बदरुद्दीन अजमल ने असम में संदिग्ध अवैध बांग्लादेशियों की 'पुशबैक' को गैरकानूनी और अत्याचार बताया। यह बयान तब आया जब राज्य सरकार निर्वासन अभियान तेज कर रही है — और दशकों पुराना यह मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक केंद्र में है।

मुख्य बातें

बदरुद्दीन अजमल ने 7 जुलाई को गुवाहाटी में संदिग्ध अवैध बांग्लादेशियों की 'पुशबैक' को 'पूरी तरह गैरकानूनी और अत्याचार' बताया।
अजमल ने कहा कि निर्वासन प्रक्रिया केवल कानून और संविधान के दायरे में ही होनी चाहिए।
उन्होंने आरोप लगाया कि बिना संवैधानिक प्रक्रिया के कार्रवाई करने वाले संविधान का सम्मान नहीं करते ।
असम सरकार फिलहाल अवैध विदेशी नागरिकों की पहचान और निर्वासन अभियान तेज कर रही है।
अजमल ने संदिग्ध प्रवासियों की संख्या पर अपने पूर्व आँकड़ों को सरकारी रिकॉर्ड पर आधारित बताया, सटीक संख्या बाद में देने का वादा किया।

अखिल भारतीय संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (एआईयूडीएफ) के अध्यक्ष और बिन्नाकंडी से विधायक बदरुद्दीन अजमल ने 7 जुलाई को गुवाहाटी में पत्रकारों से बातचीत के दौरान संदिग्ध अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान, निर्वासन और कथित 'पुशबैक' की प्रक्रिया को गैरकानूनी और असंवैधानिक करार दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसी किसी भी कार्रवाई को कानून और संविधान के दायरे में ही अंजाम दिया जाना चाहिए।

अजमल के मुख्य आरोप

अजमल ने 'वापसी' यानी पुशबैक की प्रथा को 'पूरी तरह गैरकानूनी, अवैध और गलत' बताया। उन्होंने इसे 'अत्याचार' की संज्ञा दी और कहा कि यह स्थापित कानूनी एवं संवैधानिक सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है। उनके अनुसार, जो लोग संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी कर ऐसे कदम उठाते हैं, वे वास्तव में संविधान का सम्मान नहीं करते।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि संदिग्ध अवैध प्रवासियों से जुड़े संवेदनशील मामलों में संवैधानिक सुरक्षा उपायों और उचित कानूनी प्रक्रियाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

आँकड़ों पर अजमल का स्पष्टीकरण

संदिग्ध अवैध प्रवासियों की संख्या को लेकर अपनी पूर्व टिप्पणियों के संदर्भ में अजमल ने कहा कि उनके द्वारा उद्धृत आँकड़े सरकारी रिकॉर्ड पर आधारित थे। हालाँकि, उन्होंने स्वीकार किया कि सटीक संख्याएँ वे बाद में उपलब्ध कराएँगे। यह स्पष्टीकरण ऐसे समय में आया जब विपक्षी दलों और सत्तारूढ़ पक्ष के बीच प्रवासी आँकड़ों को लेकर विवाद जारी है।

असम में अवैध प्रवासन का राजनीतिक संदर्भ

यह ऐसे समय में आया है जब असम सरकार राज्य में अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों की पहचान और निर्वासन अभियान को तेज़ कर रही है। बांग्लादेश से अवैध अप्रवासन का मुद्दा दशकों से असम की राजनीति में केंद्रीय स्थान रखता है। गौरतलब है कि लगातार सरकारों ने जनसांख्यिकीय बदलावों, सीमा सुरक्षा और विदेशी नागरिक न्यायाधिकरणों (Foreigners Tribunals) के माध्यम से कानूनी निर्वासन प्रक्रिया को लेकर चिंताएँ जताई हैं।

आलोचकों का कहना है कि बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के की गई पुशबैक कार्रवाइयाँ न केवल भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार) का उल्लंघन करती हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के भी विरुद्ध हो सकती हैं।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में किसी भी व्यक्ति को — चाहे वह विदेशी नागरिक ही क्यों न हो — निर्वासित करने से पहले विदेशी अधिनियम, 1946 और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 के तहत उचित न्यायिक या अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। बिना इस प्रक्रिया के की गई कार्रवाई न्यायालय में चुनौती के योग्य हो सकती है।

आगे की राह

अजमल की यह टिप्पणी असम विधानसभा के अगले सत्र से पहले राजनीतिक तापमान को और बढ़ा सकती है। एआईयूडीएफ ने संकेत दिया है कि वह इस मुद्दे को विधानसभा में उठाएगी और यदि जरूरत पड़ी तो न्यायिक हस्तक्षेप की माँग भी की जा सकती है। राज्य सरकार की ओर से अभी तक अजमल के आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

संपादकीय दृष्टिकोण

न विपक्ष विकल्प सुझाता है — बहस तथ्यों से ज़्यादा आरोपों पर टिकी है। जब तक विदेशी न्यायाधिकरणों की क्षमता और पारदर्शिता नहीं बढ़ती, यह मुद्दा हर चुनाव से पहले भड़कता रहेगा।
RashtraPress
7 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बदरुद्दीन अजमल ने 'पुशबैक' को गैरकानूनी क्यों बताया?
अजमल का कहना है कि संदिग्ध अवैध बांग्लादेशियों को बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के वापस भेजना भारतीय संविधान और विदेशी अधिनियम का उल्लंघन है। उनके अनुसार, हर निर्वासन कार्रवाई न्यायिक या अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होनी चाहिए।
एआईयूडीएफ क्या है और असम की राजनीति में इसकी क्या भूमिका है?
अखिल भारतीय संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (एआईयूडीएफ) असम का एक प्रमुख अल्पसंख्यक-समर्थित राजनीतिक दल है, जिसकी स्थापना बदरुद्दीन अजमल ने की थी। यह दल मुख्यतः बंगाली-भाषी मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है और अवैध प्रवासन से जुड़े मुद्दों पर प्रायः सत्तारूढ़ दल से असहमति जताता है।
असम में अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की पहचान कैसे होती है?
असम में विदेशी न्यायाधिकरणों (Foreigners Tribunals) के माध्यम से संदिग्ध अवैध प्रवासियों की पहचान की जाती है। इसके अलावा राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) प्रक्रिया भी इसी उद्देश्य से लागू की गई थी, हालाँकि उसके परिणाम अभी भी विवादास्पद हैं।
क्या भारत में पुशबैक कानूनी है?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में किसी को भी बिना न्यायिक प्रक्रिया के निर्वासित करना विदेशी अधिनियम, 1946 के तहत चुनौती के योग्य हो सकता है। भारत ने 1951 की शरणार्थी संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, फिर भी संविधान का अनुच्छेद 21 सभी व्यक्तियों को — नागरिक हो या न हो — उचित प्रक्रिया की गारंटी देता है।
असम में बांग्लादेशी प्रवासन का मुद्दा इतना संवेदनशील क्यों है?
यह मुद्दा दशकों से असम की जनसांख्यिकी, सांस्कृतिक पहचान और राजनीति को प्रभावित करता आया है। 1983 के नेली नरसंहार से लेकर 1985 के असम समझौते और 2019 की NRC प्रक्रिया तक — हर बड़े राजनीतिक मोड़ पर यह मुद्दा केंद्र में रहा है और चुनावी ध्रुवीकरण का प्रमुख कारक बना है।
राष्ट्र प्रेस
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