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बोडो शांति समझौता 2020: एबीएसयू ने 6 साल बाद भी अधूरे प्रावधानों पर केंद्र और असम सरकार को दी चेतावनी

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बोडो शांति समझौता 2020: एबीएसयू ने 6 साल बाद भी अधूरे प्रावधानों पर केंद्र और असम सरकार को दी चेतावनी

सारांश

बोडो शांति समझौते पर हस्ताक्षर के 6 साल बाद भी 634 गाँवों का समावेशन और संविधान संशोधन विधेयक लंबित है। एबीएसयू ने केंद्र और असम सरकार को साफ चेतावनी दी है — देरी जारी रही तो अलग बोडोलैंड राज्य की माँग फिर उठेगी।

मुख्य बातें

अखिल बोडो छात्र संघ (एबीएसयू) ने 24 जून 2026 को केंद्र और असम सरकार से बोडो शांति समझौता 2020 के प्रावधान तत्काल लागू करने की माँग की।
समझौते पर 27 जनवरी 2020 को हस्ताक्षर हुए थे; 6 वर्ष से अधिक बाद भी कई प्रावधान अधूरे हैं।
बीटीआर सीमा विस्तार आयोग का कार्यकाल 31 मार्च 2025 को समाप्त; 634 गाँवों के समावेशन का मुद्दा लंबित।
एबीएसयू ने मानसून सत्र में संविधान (125वाँ संशोधन) विधेयक पारित करने और बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद में सदस्य संख्या 60 तक बढ़ाने की माँग की।
संयुक्त निगरानी समिति की बैठक चार बार स्थगित होकर 23 जून को हुई; एबीएसयू ने इसे सरकारी उदासीनता बताया।
एबीएसयू ने चेतावनी दी कि देरी जारी रही तो अनुच्छेद 2 और 3 के तहत अलग बोडोलैंड राज्य की माँग पुनः उठाई जाएगी।

अखिल बोडो छात्र संघ (एबीएसयू) ने 24 जून 2026 को नई दिल्ली में संयुक्त निगरानी समिति की बैठक के बाद केंद्र सरकार और असम सरकार से बोडो शांति समझौता 2020 के प्रमुख प्रावधानों को तत्काल लागू करने की माँग की। संगठन ने स्पष्ट किया कि 27 जनवरी 2020 को हस्ताक्षरित इस ऐतिहासिक समझौते को 6 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, फिर भी कई महत्वपूर्ण मुद्दे अनसुलझे हैं।

मुख्य घटनाक्रम

एबीएसयू के अनुसार, संयुक्त निगरानी समिति की यह बैठक मूलतः 1 जून को प्रस्तावित थी, किंतु चार बार स्थगित होने के बाद 23 जून को आयोजित हो सकी। संगठन ने इस बार-बार की देरी को सरकार की उदासीनता का संकेत बताते हुए कहा कि इससे बोडो समाज में असंतोष गहराता जा रहा है। एबीएसयू बोडो शांति समझौते का प्रमुख हस्ताक्षरकर्ता संगठन है और तीन दशकों से अधिक चले लोकतांत्रिक आंदोलन में इसकी केंद्रीय भूमिका रही है।

तीन समझौतों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

एबीएसयू ने बोडो आंदोलन के दौरान हुए तीन प्रमुख समझौतों का उल्लेख किया — बोडोलैंड स्वायत्त परिषद (बीएसी) समझौता 20 फरवरी 1993, बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद (बीटीसी) समझौता 10 फरवरी 2003, और बोडोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र (बीटीआर) समझौता 27 जनवरी 2020। संगठन का कहना है कि 5,000 से अधिक लोगों के बलिदान के बाद मिले इन समझौतों का सम्मान करना सरकार की जिम्मेदारी है। यह ऐसे समय में आया है जब बोडो समाज विकास और राजनीतिक सशक्तिकरण की उम्मीद लिए वर्षों से इंतजार कर रहा है।

अधूरे प्रावधान और लंबित मुद्दे

एबीएसयू ने बताया कि बीटीआर की सीमा विस्तार के लिए गठित आयोग का कार्यकाल 31 मार्च 2025 को समाप्त हो चुका है, लेकिन अब भी 634 गाँवों के समावेशन का मुद्दा लंबित है। इनमें राजस्व गाँव, उप-गाँव, वन गाँव और वनाधिकार से जुड़े गाँव शामिल हैं। संगठन के अनुसार, बीटीआर समझौते का मूल उद्देश्य क्षेत्र की सीमाओं का विस्तार, प्रशासनिक अधिकारों में वृद्धि और विकास की नई संभावनाओं को साकार करना था — जो अभी तक पूरी तरह हासिल नहीं हुआ है।

संविधान संशोधन विधेयक की माँग

एबीएसयू ने आगामी मानसून सत्र में संविधान (125वाँ संशोधन) विधेयक पारित करने की माँग की है। संगठन के अनुसार इस विधेयक के माध्यम से — बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद में सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 60 की जा सकेगी; परिषद को अतिरिक्त शक्तियाँ और प्रशासनिक अधिकार मिलेंगे; दलबदल विरोधी प्रावधान लागू होंगे; परिषद चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग की निगरानी में कराए जाएँगे; और संविधान के अनुच्छेद 280 में संशोधन के जरिए वित्तीय सशक्तिकरण सुनिश्चित होगा।

चेतावनी और आगे की राह

एबीएसयू ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि बोडो शांति समझौते के प्रमुख प्रावधानों को लागू करने में और देरी हुई, तो संगठन को बोडो समाज की भावनाओं के अनुरूप आगे की रणनीति तय करनी पड़ सकती है। संगठन ने यह भी संकेत दिया कि आवश्यकता पड़ने पर संविधान के अनुच्छेद 2 और 3 के तहत अलग बोडोलैंड राज्य की माँग को फिर से प्रमुखता से उठाया जा सकता है। गौरतलब है कि यह माँग दशकों पुराने आंदोलन की मूल आकांक्षा रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन 6 साल बाद भी 634 गाँवों का लंबित समावेशन और बार-बार टलती निगरानी समिति की बैठकें यह सवाल उठाती हैं कि समझौते को लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति कितनी वास्तविक है। 5,000 से अधिक बलिदानों के बाद मिले इस समझौते की अनदेखी केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि उस विश्वास को भी तोड़ती है जिस पर शांति प्रक्रिया टिकी थी। 125वें संविधान संशोधन विधेयक का मानसून सत्र में पारित न होना इस असंतोष को और गहरा कर सकता है — और अलग राज्य की माँग का पुनः उभरना क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक गंभीर संकेत होगा।
RashtraPress
11 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बोडो शांति समझौता 2020 क्या है और इसमें क्या प्रावधान हैं?
बोडो शांति समझौता 27 जनवरी 2020 को केंद्र सरकार, असम सरकार और बोडो संगठनों के बीच हस्ताक्षरित हुआ था। इसका उद्देश्य बोडोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र की सीमाओं का विस्तार, प्रशासनिक अधिकारों में वृद्धि और बोडो समाज का राजनीतिक व आर्थिक सशक्तिकरण सुनिश्चित करना था।
एबीएसयू ने किन प्रावधानों को अधूरा बताया है?
एबीएसयू के अनुसार बीटीआर सीमा विस्तार के लिए गठित आयोग का कार्यकाल 31 मार्च 2025 को समाप्त हो चुका है, लेकिन 634 गाँवों का समावेशन अभी भी लंबित है। इसके अलावा संविधान (125वाँ संशोधन) विधेयक पारित न होने से परिषद को अतिरिक्त शक्तियाँ और वित्तीय सशक्तिकरण भी नहीं मिल पाया है।
संविधान (125वाँ संशोधन) विधेयक से बोडो समाज को क्या फायदा होगा?
इस विधेयक के पारित होने पर बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद में सदस्यों की संख्या बढ़कर 60 हो जाएगी। साथ ही दलबदल विरोधी प्रावधान लागू होंगे, परिषद चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग की निगरानी में होंगे और अनुच्छेद 280 में संशोधन से वित्तीय सशक्तिकरण सुनिश्चित होगा।
एबीएसयू ने अलग बोडोलैंड राज्य की माँग का उल्लेख क्यों किया?
एबीएसयू ने स्पष्ट किया कि यदि बोडो शांति समझौते के प्रावधान समयबद्ध तरीके से लागू नहीं हुए, तो संगठन संविधान के अनुच्छेद 2 और 3 के तहत अलग बोडोलैंड राज्य की माँग पुनः उठा सकता है। यह माँग दशकों पुराने आंदोलन की मूल आकांक्षा रही है, जिसे 2020 के समझौते के बाद स्थगित किया गया था।
संयुक्त निगरानी समिति की बैठक में क्यों हुई देरी?
एबीएसयू के अनुसार यह बैठक मूलतः 1 जून को प्रस्तावित थी, लेकिन चार बार स्थगित होने के बाद 23 जून को आयोजित हो सकी। संगठन ने इस बार-बार की देरी को सरकार की उदासीनता का संकेत बताया है और कहा है कि इससे बोडो समाज में असंतोष बढ़ रहा है।
राष्ट्र प्रेस
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