बोडो शांति समझौता 2020: एबीएसयू ने 6 साल बाद भी अधूरे प्रावधानों पर केंद्र और असम सरकार को दी चेतावनी
सारांश
मुख्य बातें
अखिल बोडो छात्र संघ (एबीएसयू) ने 24 जून 2026 को नई दिल्ली में संयुक्त निगरानी समिति की बैठक के बाद केंद्र सरकार और असम सरकार से बोडो शांति समझौता 2020 के प्रमुख प्रावधानों को तत्काल लागू करने की माँग की। संगठन ने स्पष्ट किया कि 27 जनवरी 2020 को हस्ताक्षरित इस ऐतिहासिक समझौते को 6 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, फिर भी कई महत्वपूर्ण मुद्दे अनसुलझे हैं।
मुख्य घटनाक्रम
एबीएसयू के अनुसार, संयुक्त निगरानी समिति की यह बैठक मूलतः 1 जून को प्रस्तावित थी, किंतु चार बार स्थगित होने के बाद 23 जून को आयोजित हो सकी। संगठन ने इस बार-बार की देरी को सरकार की उदासीनता का संकेत बताते हुए कहा कि इससे बोडो समाज में असंतोष गहराता जा रहा है। एबीएसयू बोडो शांति समझौते का प्रमुख हस्ताक्षरकर्ता संगठन है और तीन दशकों से अधिक चले लोकतांत्रिक आंदोलन में इसकी केंद्रीय भूमिका रही है।
तीन समझौतों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
एबीएसयू ने बोडो आंदोलन के दौरान हुए तीन प्रमुख समझौतों का उल्लेख किया — बोडोलैंड स्वायत्त परिषद (बीएसी) समझौता 20 फरवरी 1993, बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद (बीटीसी) समझौता 10 फरवरी 2003, और बोडोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र (बीटीआर) समझौता 27 जनवरी 2020। संगठन का कहना है कि 5,000 से अधिक लोगों के बलिदान के बाद मिले इन समझौतों का सम्मान करना सरकार की जिम्मेदारी है। यह ऐसे समय में आया है जब बोडो समाज विकास और राजनीतिक सशक्तिकरण की उम्मीद लिए वर्षों से इंतजार कर रहा है।
अधूरे प्रावधान और लंबित मुद्दे
एबीएसयू ने बताया कि बीटीआर की सीमा विस्तार के लिए गठित आयोग का कार्यकाल 31 मार्च 2025 को समाप्त हो चुका है, लेकिन अब भी 634 गाँवों के समावेशन का मुद्दा लंबित है। इनमें राजस्व गाँव, उप-गाँव, वन गाँव और वनाधिकार से जुड़े गाँव शामिल हैं। संगठन के अनुसार, बीटीआर समझौते का मूल उद्देश्य क्षेत्र की सीमाओं का विस्तार, प्रशासनिक अधिकारों में वृद्धि और विकास की नई संभावनाओं को साकार करना था — जो अभी तक पूरी तरह हासिल नहीं हुआ है।
संविधान संशोधन विधेयक की माँग
एबीएसयू ने आगामी मानसून सत्र में संविधान (125वाँ संशोधन) विधेयक पारित करने की माँग की है। संगठन के अनुसार इस विधेयक के माध्यम से — बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद में सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 60 की जा सकेगी; परिषद को अतिरिक्त शक्तियाँ और प्रशासनिक अधिकार मिलेंगे; दलबदल विरोधी प्रावधान लागू होंगे; परिषद चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग की निगरानी में कराए जाएँगे; और संविधान के अनुच्छेद 280 में संशोधन के जरिए वित्तीय सशक्तिकरण सुनिश्चित होगा।
चेतावनी और आगे की राह
एबीएसयू ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि बोडो शांति समझौते के प्रमुख प्रावधानों को लागू करने में और देरी हुई, तो संगठन को बोडो समाज की भावनाओं के अनुरूप आगे की रणनीति तय करनी पड़ सकती है। संगठन ने यह भी संकेत दिया कि आवश्यकता पड़ने पर संविधान के अनुच्छेद 2 और 3 के तहत अलग बोडोलैंड राज्य की माँग को फिर से प्रमुखता से उठाया जा सकता है। गौरतलब है कि यह माँग दशकों पुराने आंदोलन की मूल आकांक्षा रही है।