बंगाल में यूसीसी विधेयक: भाजपा ने साफ किया — अनुसूचित जनजातियाँ इसके दायरे से बाहर रहेंगी
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम बंगाल विधानसभा में 29 जून 2026 को समान नागरिक संहिता (यूसीसी) से जुड़ा विधेयक पेश किए जाने से ठीक पहले, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने 27 जून को स्पष्ट किया कि अनुसूचित जनजातियों (ST) को इस प्रस्तावित कानून के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा जाएगा। यह स्पष्टीकरण ऐसे समय में आया है जब विधेयक को लेकर राज्य में व्यापक बहस और आशंकाएँ उठ रही थीं।
संवैधानिक आधार क्या है
भट्टाचार्य ने सोशल मीडिया पर जारी बयान में कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (25) और अनुच्छेद 342 के तहत परिभाषित अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर यह संहिता लागू नहीं होगी। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि संविधान द्वारा आदिवासी समुदायों को दिए गए विशेष संरक्षण को पूरी तरह बरकरार रखा जाएगा।
भाजपा का रुख और चुनावी वादा
भट्टाचार्य ने कहा कि यूसीसी को लेकर BJP का रुख लंबे समय से स्पष्ट रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि यह हाल ही में संपन्न पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान पार्टी के घोषणापत्र और चुनावी वादों का भी हिस्सा था। उनके अनुसार, इसमें कुछ भी छिपाने या भ्रम पैदा करने जैसा नहीं है।
गौरतलब है कि उत्तराखंड पहला राज्य बन चुका है जिसने यूसीसी लागू किया है, और अब पश्चिम बंगाल में भाजपा इसी राह पर चलने की कोशिश कर रही है — हालाँकि राज्य में तृणमूल कांग्रेस (TMC) सत्ता में है और इस विधेयक के पारित होने की राह आसान नहीं है।
यूसीसी के प्रावधान और उद्देश्य
भट्टाचार्य ने बताया कि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे नागरिक मामलों में धर्म-आधारित अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के स्थान पर एक समान नागरिक व्यवस्था लागू करना इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य है। उनका कहना है कि इससे देश की एकता, न्याय और संवैधानिक समानता की भावना मज़बूत होगी।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यूसीसी लागू होने पर बहुविवाह जैसी व्यवस्थाओं को समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया जा सकेगा, जो कुछ व्यक्तिगत कानूनों के तहत अब भी अनुमत है। हालाँकि उन्होंने यह भी साफ किया कि परिवार में बच्चों की संख्या तय करना यूसीसी का उद्देश्य नहीं है और न ही इसमें ऐसा कोई प्रावधान है।
आम जनता और जनजातीय समुदायों पर असर
यदि यह विधेयक पारित होता है, तो अनुसूचित जनजातियों को छोड़कर शेष सभी नागरिकों पर समान नागरिक प्रावधान लागू होंगे। आलोचकों का कहना है कि इस कदम से अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान पर असर पड़ सकता है, जबकि भाजपा इसे संवैधानिक समानता का कदम बताती है।
आगे क्या होगा
विधेयक 29 जून 2026 को पश्चिम बंगाल विधानसभा में पेश किया जाना है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के रुख और विधानसभा में बहुमत के समीकरण को देखते हुए इसके पारित होने की संभावना अभी स्पष्ट नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह विधेयक भाजपा के लिए एक वैचारिक संदेश देने का माध्यम भी है।