भाजपा की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी 'सुविधा की व्यवस्था' — शिवसेना (यूबीटी) का 'सामना' में तीखा हमला
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) की नई घोषित राष्ट्रीय कार्यकारिणी को 'सुविधा की व्यवस्था' करार दिया है। पार्टी के मुखपत्र 'सामना' में बुधवार, 19 अगस्त को प्रकाशित संपादकीय में आरोप लगाया गया कि भाजपा की नई टीम न तो स्वतंत्र रूप से काम करने में सक्षम है और न ही उसमें कोई उल्लेखनीय राजनीतिक ऊर्जा दिखती है।
मुख्य आरोप: 'मोदी-शाह की पसंद लागू करने वाली टीम'
संपादकीय में शिवसेना (यूबीटी) ने आरोप लगाया कि यह नई नेतृत्व संरचना मुख्य रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की प्राथमिकताओं को लागू करने के लिए गठित की गई है। संपादकीय में तर्क दिया गया कि पार्टी की 'असली मशीनरी' अब सत्ता के बाहरी माध्यमों पर निर्भर हो चुकी है।
संपादकीय में तंज कसा गया — 'प्रधानमंत्री और गृह मंत्री जिस दिशा में चाहें, पार्टी की गाड़ी को चुपचाप उसी दिशा में चलाने वाले लोग ढूंढने में 7 महीने नहीं लगने चाहिए थे।' यह टिप्पणी इस तथ्य के संदर्भ में की गई कि नितिन नवीन के भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के करीब 7 महीने बाद नई कार्यकारिणी घोषित हुई।
बांकीपुर उपचुनाव हार का हवाला
शिवसेना (यूबीटी) ने बिहार का उदाहरण देते हुए कहा कि इस बीच नितिन नवीन ने बांकीपुर विधानसभा सीट छोड़ी, जिसके बाद हुए उपचुनाव में भाजपा वह सीट हार गई। संपादकीय के अनुसार, यह हार प्रशांत किशोर की रणनीतिक उपस्थिति के कारण हुई।
चुनावी तंत्र 'आउटसोर्स' होने का आरोप
संपादकीय में यह भी कहा गया कि भाजपा की नई टीम पर 'चुनाव जीतने का कोई असली बोझ' नहीं है। आरोप लगाया गया कि चुनावी रणनीति और जमीनी कार्य अब राज्य सरकार, पुलिस, धन और ईवीएम के माध्यम से आउटसोर्स कर दिया गया है।
संपादकीय में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, तुलसी गबार्ड और एलन मस्क के हवाले दिए गए, जिन्होंने ईवीएम की कमज़ोरियों और अमेरिका में पेपर बैलट पर भरोसे की बात कही थी। इसकी तुलना भारत से करते हुए संपादकीय में कहा गया कि यहाँ चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय बार-बार पेपर बैलट की माँग ठुकरा रहे हैं।
पीयूष गोयल की नियुक्ति पर नैतिक आपत्ति
केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल को भाजपा का राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बनाए जाने पर शिवसेना (यूबीटी) ने नैतिक आपत्ति जताई। संपादकीय में कहा गया कि भाजपा के खजाने में ₹7,000 करोड़ से अधिक की राशि है और देशभर में उसके बड़े कार्यालय हैं। ऐसे में गोयल को संगठन का पद स्वीकार करने से पहले सरकारी पद से इस्तीफा देना चाहिए था।
आगे क्या
शिवसेना (यूबीटी) ने निष्कर्ष निकाला कि यह पूरा फेरबदल महज 'सुविधा की व्यवस्था' है — औपचारिक पद तो बाँट दिए गए हैं, लेकिन भाजपा के चुनावी तंत्र की असली कमान केंद्रीय स्तर पर ही बनी हुई है। यह देखना होगा कि भाजपा इन आरोपों का जवाब किस प्रकार देती है और नई कार्यकारिणी आगामी चुनावों में अपनी भूमिका कैसे साबित करती है।