नवरात्रि विशेष: अद्भुत मरही माता का मंदिर, संतान सुख के लिए है चमत्कारिक
सारांश
Key Takeaways
- मरही माई मंदिर का महत्व निसंतान दंपत्तियों के लिए विशेष है।
- यह मंदिर चमत्कारिक घटनाओं के लिए प्रसिद्ध है।
- नवरात्रि में भक्तों की भारी भीड़ देखी जाती है।
- मंदिर का इतिहास 1901 का है।
- मां की प्रतिमा स्वयंभू है।
नई दिल्ली, २६ मार्च (राष्ट्र प्रेस)। पूरे देश में कई ऐसे मंदिर हैं, जो शक्तिपीठ या सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध नहीं हैं, लेकिन अपने चमत्कारों के कारण भक्तों में विशेष श्रद्धा का केंद्र बने हुए हैं।
ऐसे ही एक अद्भुत मंदिर का नाम है मरही माई मंदिर, जो छत्तीसगढ़ में स्थित है। यहां मां के दर्शन मात्र से निसंतान दंपत्तियों को संतान की प्राप्ति होती है और रोगी स्वास्थ्य लाभ कर घर लौटते हैं। यह मंदिर घने जंगलों के किनारे बसा है, और हर साल आस-पास के राज्यों के भक्त यहां मां के दर्शन के लिए आते हैं।
बिलासपुर शहर की न्यू रेलवे कॉलोनी के पास स्थित मरही माई का यह चमत्कारी मंदिर, मां को श्मशानवासिनी के नाम से भी जाना जाता है। यहां मां की आराधना तंत्र विद्या को सिद्ध करने के लिए भी की जाती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, मां के दर्शन से तंत्र का बड़े से बड़े बाधा का समाधान हो जाता है। मंदिर में स्थित प्राचीन पेड़ से मन्नत मांगने वाले निसंतान दंपत्तियों को संतान प्राप्ति होती है।
निसंतान दंपत्ति विशेष तरीके से मां की आराधना करते हैं और जब उनकी मन्नत पूरी होती है, तो अपनी इच्छा के अनुसार दान-दक्षिणा भी अर्पित करते हैं। मंदिर परिसर में एक प्राचीन पेड़ है, जिसे मन्नत का पेड़ कहा जाता है। भक्त अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए इस पेड़ पर लाल धागे बांधते हैं। कुछ स्थानीय मान्यताएं हैं कि मां की आराधना करने वाले भक्त निरोगी होकर मंदिर से लौटते हैं।
मंदिर परिसर में कई पत्थर की प्रतिमाएं हैं, जो मां के विभिन्न रूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं। यहां मां काली, दुर्गा और सरस्वती की प्रतिमाएं शिवलिंग के साथ स्थापित की गई हैं। मंदिर में चमत्कारी चरण पादुका भी हैं, जिन पर बड़े कांटे लगे हैं। मुख्य गर्भगृह में मां की प्रतिमा अस्त्र-शस्त्र के साथ विराजमान है। नवरात्रि के समय मां के दिव्य दर्शन के लिए भक्तों की एक बड़ी भीड़ उमड़ती है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, मंदिर का इतिहास १९०१ का है। मां की प्रतिमा स्वयंभू है, जो धरती में से निकली थी। कहा जाता है कि एक साधारण व्यक्ति ने मां की प्रतिमा को रेलवे स्टेशन के पास जमीन में आधी दबी हुई पाई थी। इसके बाद, रेलवे के सेवानिवृत्त कर्मचारी स्वर्गीय सदानंद आचारी ने इसकी स्थापना की और मां का मंदिर बनवाया।