दीपक प्रकाश के एमएलसी नामांकन पर सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से माँगी अधिसूचना
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 7 अगस्त 2026 को बिहार सरकार को निर्देश दिया कि वह पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को बिहार विधान परिषद का सदस्य नियुक्त करने से संबंधित आधिकारिक अधिसूचना रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करे। राज्य सरकार ने शीर्ष अदालत को सूचित किया था कि प्रकाश को उच्च सदन के लिए नामित किया जा चुका है और वे शपथ भी ग्रहण कर चुके हैं।
सुनवाई का घटनाक्रम
भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने बिहार सरकार की सूचना को रिकॉर्ड पर लिया। बिहार सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि दीपक प्रकाश के एमएलसी के रूप में नामांकन के बाद अयोग्यता का मुद्दा स्वतः समाप्त हो गया है।
हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार से नियुक्ति की अधिसूचना पेश करने को कहा और सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह द्वारा दायर जनहित याचिका (पीआईएल) की सुनवाई स्थगित कर दी। अगली सुनवाई 20 अगस्त को होने की संभावना है।
विवाद की जड़
यह मामला दीपक प्रकाश के राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य न होने के बावजूद बिहार के पंचायती राज मंत्री बने रहने को लेकर शुरू हुआ था। याचिका के अनुसार, प्रकाश को 20 नवंबर 2025 को पहली बार बिहार कैबिनेट में शामिल किया गया था, जबकि वे किसी भी सदन के निर्वाचित सदस्य नहीं थे।
15 अप्रैल को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार के गठन के बाद, प्रकाश को 7 मई को फिर से पंचायती राज मंत्री नियुक्त किया गया। याचिकाकर्ता का तर्क था कि इस दोबारा नियुक्ति से संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत मिलने वाली छह महीने की सीमा को प्रभावी रूप से दरकिनार किया गया।
संवैधानिक सवाल
याचिका में एस.आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य (2001) के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया था कि अनुच्छेद 164(4) के तहत संवैधानिक अपवाद एक बार मिलने वाली सुविधा है — इसे इस्तीफे, कैबिनेट फेरबदल या दोबारा नियुक्ति के ज़रिए बार-बार इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि किसी गैर-निर्वाचित व्यक्ति को बार-बार मंत्री बनाने की अनुमति देना संसदीय लोकतंत्र और चुनावी जवाबदेही को कमज़ोर करता है।
गौरतलब है कि पिछले महीने हुए बिहार विधान परिषद चुनावों में एनडीए उम्मीदवारों की सूची में प्रकाश का नाम शामिल नहीं था, जिससे विवाद और गहरा हो गया था।
रास्ता कैसे बना
31 जुलाई को भाजपा एमएलसी देवेश कुमार ने बिहार विधान परिषद में अपनी सीट से इस्तीफा दे दिया, जिससे एक सीट रिक्त हो गई। इसके बाद दीपक प्रकाश को राज्यपाल कोटे से बिहार विधान परिषद के लिए नामित किया गया और उन्होंने एमएलसी के रूप में शपथ ग्रहण कर ली।
आगे क्या होगा
बिहार सरकार ने अदालत से आग्रह किया कि बाद के घटनाक्रम को देखते हुए मामला बंद किया जाए, लेकिन याचिकाकर्ता ने इसका विरोध करते हुए कहा कि कथित संवैधानिक उल्लंघन पहले ही हो चुका है और अपनाई गई प्रक्रिया की वैधता पर सवाल अभी भी बना हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय का 20 अगस्त को होने वाला अगला आदेश यह तय करेगा कि क्या यह संवैधानिक प्रश्न विचारणीय बना रहेगा या मामला बंद होगा।