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दीपक प्रकाश के एमएलसी नामांकन पर सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से माँगी अधिसूचना

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दीपक प्रकाश के एमएलसी नामांकन पर सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से माँगी अधिसूचना

सारांश

बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को राज्यपाल कोटे से एमएलसी नामित किए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने नामांकन अधिसूचना माँगी है। अनुच्छेद 164(4) के तहत गैर-निर्वाचित व्यक्ति को बार-बार मंत्री बनाने की संवैधानिक वैधता पर सवाल अभी भी जीवित है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 7 अगस्त 2026 को बिहार सरकार से दीपक प्रकाश के बिहार विधान परिषद नामांकन की अधिसूचना रिकॉर्ड पर रखने को कहा।
दीपक प्रकाश को राज्यपाल कोटे से एमएलसी नामित किया गया; उन्होंने शपथ ग्रहण कर ली।
भाजपा एमएलसी देवेश कुमार के 31 जुलाई को इस्तीफे से सीट रिक्त हुई थी।
मामले की जड़ संविधान के अनुच्छेद 164(4) से जुड़ी है, जो गैर-निर्वाचित व्यक्ति को अधिकतम छह महीने तक मंत्री रहने की अनुमति देता है।
याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह ने प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठाते हुए मामला बंद करने का विरोध किया।
अगली सुनवाई 20 अगस्त को निर्धारित।

सर्वोच्च न्यायालय ने 7 अगस्त 2026 को बिहार सरकार को निर्देश दिया कि वह पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को बिहार विधान परिषद का सदस्य नियुक्त करने से संबंधित आधिकारिक अधिसूचना रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करे। राज्य सरकार ने शीर्ष अदालत को सूचित किया था कि प्रकाश को उच्च सदन के लिए नामित किया जा चुका है और वे शपथ भी ग्रहण कर चुके हैं।

सुनवाई का घटनाक्रम

भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने बिहार सरकार की सूचना को रिकॉर्ड पर लिया। बिहार सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि दीपक प्रकाश के एमएलसी के रूप में नामांकन के बाद अयोग्यता का मुद्दा स्वतः समाप्त हो गया है।

हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार से नियुक्ति की अधिसूचना पेश करने को कहा और सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह द्वारा दायर जनहित याचिका (पीआईएल) की सुनवाई स्थगित कर दी। अगली सुनवाई 20 अगस्त को होने की संभावना है।

विवाद की जड़

यह मामला दीपक प्रकाश के राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य न होने के बावजूद बिहार के पंचायती राज मंत्री बने रहने को लेकर शुरू हुआ था। याचिका के अनुसार, प्रकाश को 20 नवंबर 2025 को पहली बार बिहार कैबिनेट में शामिल किया गया था, जबकि वे किसी भी सदन के निर्वाचित सदस्य नहीं थे।

15 अप्रैल को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार के गठन के बाद, प्रकाश को 7 मई को फिर से पंचायती राज मंत्री नियुक्त किया गया। याचिकाकर्ता का तर्क था कि इस दोबारा नियुक्ति से संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत मिलने वाली छह महीने की सीमा को प्रभावी रूप से दरकिनार किया गया।

संवैधानिक सवाल

याचिका में एस.आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य (2001) के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया था कि अनुच्छेद 164(4) के तहत संवैधानिक अपवाद एक बार मिलने वाली सुविधा है — इसे इस्तीफे, कैबिनेट फेरबदल या दोबारा नियुक्ति के ज़रिए बार-बार इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि किसी गैर-निर्वाचित व्यक्ति को बार-बार मंत्री बनाने की अनुमति देना संसदीय लोकतंत्र और चुनावी जवाबदेही को कमज़ोर करता है।

गौरतलब है कि पिछले महीने हुए बिहार विधान परिषद चुनावों में एनडीए उम्मीदवारों की सूची में प्रकाश का नाम शामिल नहीं था, जिससे विवाद और गहरा हो गया था।

रास्ता कैसे बना

31 जुलाई को भाजपा एमएलसी देवेश कुमार ने बिहार विधान परिषद में अपनी सीट से इस्तीफा दे दिया, जिससे एक सीट रिक्त हो गई। इसके बाद दीपक प्रकाश को राज्यपाल कोटे से बिहार विधान परिषद के लिए नामित किया गया और उन्होंने एमएलसी के रूप में शपथ ग्रहण कर ली।

आगे क्या होगा

बिहार सरकार ने अदालत से आग्रह किया कि बाद के घटनाक्रम को देखते हुए मामला बंद किया जाए, लेकिन याचिकाकर्ता ने इसका विरोध करते हुए कहा कि कथित संवैधानिक उल्लंघन पहले ही हो चुका है और अपनाई गई प्रक्रिया की वैधता पर सवाल अभी भी बना हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय का 20 अगस्त को होने वाला अगला आदेश यह तय करेगा कि क्या यह संवैधानिक प्रश्न विचारणीय बना रहेगा या मामला बंद होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसे 2001 के एस.आर. चौधरी फैसले में सर्वोच्च न्यायालय पहले ही अस्वीकार कर चुका है। असली सवाल यह है कि क्या राज्यपाल कोटे का नामांकन उस संवैधानिक खामी को ढकने का माध्यम बन सकता है जो चुनावी जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई थी। यदि सर्वोच्च न्यायालय इस प्रक्रिया को वैध मानता है, तो यह भविष्य में अन्य राज्यों के लिए एक नज़ीर बन सकती है — और अनुच्छेद 164(4) की मूल भावना को कमज़ोर कर सकती है।
RashtraPress
7 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दीपक प्रकाश और सुप्रीम कोर्ट का यह मामला क्या है?
यह मामला बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश के राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य न होने के बावजूद मंत्री बने रहने को लेकर दायर जनहित याचिका से जुड़ा है। सर्वोच्च न्यायालय ने 7 अगस्त 2026 को बिहार सरकार से उनके एमएलसी नामांकन की अधिसूचना माँगी है।
संविधान का अनुच्छेद 164(4) क्या कहता है?
अनुच्छेद 164(4) किसी गैर-निर्वाचित व्यक्ति को अधिकतम छह महीने तक मंत्री पद पर रहने की अनुमति देता है, बशर्ते इस अवधि में वे विधानमंडल के किसी सदन के सदस्य बन जाएँ। सर्वोच्च न्यायालय के 2001 के फैसले के अनुसार यह एक बार मिलने वाली सुविधा है।
दीपक प्रकाश को एमएलसी कैसे नामित किया गया?
भाजपा एमएलसी देवेश कुमार के 31 जुलाई को इस्तीफे से बिहार विधान परिषद में एक सीट रिक्त हुई। इसके बाद दीपक प्रकाश को राज्यपाल कोटे से उस सीट पर नामित किया गया और उन्होंने एमएलसी के रूप में शपथ ग्रहण की।
याचिकाकर्ता ने मामला बंद करने का विरोध क्यों किया?
याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह का तर्क है कि कथित संवैधानिक उल्लंघन पहले ही हो चुका है और अपनाई गई प्रक्रिया की वैधता पर सवाल अभी भी बना हुआ है। उनके अनुसार, बाद की नियुक्ति से पूर्व की प्रक्रियागत खामियाँ समाप्त नहीं होतीं।
इस मामले की अगली सुनवाई कब होगी?
सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट पर उपलब्ध केस स्टेटस के अनुसार, इस मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त को होने की संभावना है, जिसमें बिहार सरकार को नामांकन अधिसूचना प्रस्तुत करनी होगी।
राष्ट्र प्रेस
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