सुप्रीम कोर्ट नोटिस पर बिहार मंत्री दीपक प्रकाश बोले — इस्तीफे का फैसला गठबंधन नेतृत्व करेगा
सारांश
मुख्य बातें
बिहार सरकार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद पटना में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। 16 जून को पत्रकारों से बातचीत में मंत्री ने स्पष्ट किया कि उन्हें अभी तक आधिकारिक नोटिस प्राप्त नहीं हुआ है और मंत्री पद से इस्तीफे का निर्णय वे स्वयं नहीं, बल्कि गठबंधन नेतृत्व करेगा। यह विवाद इस तथ्य से उपजा है कि दीपक प्रकाश बिना विधायक या विधान परिषद सदस्य बने दूसरी बार मंत्री पद पर नियुक्त किए गए हैं।
मुख्य घटनाक्रम
सर्वोच्च न्यायालय ने दीपक प्रकाश, बिहार सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर यह स्पष्टीकरण माँगा है कि बिना किसी सदन की सदस्यता के उन्हें मंत्री पद पर कैसे नियुक्त किया गया। यह पहली बार नहीं है — मंत्री स्वयं स्वीकार करते हैं कि वे पहले भी इसी स्थिति में मंत्री रह चुके हैं। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, संवैधानिक प्रावधानों के तहत किसी गैर-सदस्य को मंत्री बनाए जाने पर 6 महीने के भीतर सदन का सदस्य बनना अनिवार्य होता है।
मंत्री की प्रतिक्रिया
दीपक प्रकाश ने पत्रकारों से कहा, 'मुझे फिलहाल मीडिया के माध्यम से ही जानकारी मिली है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से नोटिस जारी किया गया है। जब तक आधिकारिक तौर पर नोटिस प्राप्त नहीं हो जाता तब तक इस विषय पर कोई विस्तृत टिप्पणी करना उचित नहीं होगा।' उन्होंने आगे कहा कि नोटिस मिलने के बाद कानूनी पहलुओं का अध्ययन कर उचित जवाब दिया जाएगा।
इस्तीफे के सवाल पर मंत्री ने सीधे इनकार नहीं किया। उन्होंने कहा, 'मैं पहले भी मंत्री था और वर्तमान में भी मंत्री हूँ। इस विषय में जो भी निर्णय लिया जाना होगा, वह गठबंधन का नेतृत्व करेगा। हम गठबंधन और पार्टी के निर्णयों का सम्मान करते हैं।'
कुशवाहा के निर्विरोध चुनाव पर बधाई
इसी बातचीत के दौरान दीपक प्रकाश ने राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के नेता उपेंद्र कुशवाहा को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्विरोध चुने जाने पर बधाई दी। उन्होंने कहा, 'उपेंद्र कुशवाहा एक अनुभवी और संघर्षशील नेता हैं, जिनके नेतृत्व में पार्टी और अधिक मजबूती के साथ आगे बढ़ेगी।' यह घोषणा ऐसे समय में आई जब पार्टी का गठबंधन के भीतर कद और प्रभाव को लेकर चर्चा जारी है।
संवैधानिक पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति जो विधायिका का सदस्य नहीं है, अधिकतम 6 महीने तक मंत्री पद पर बना रह सकता है, बशर्ते वह इस अवधि में किसी सदन का सदस्य बन जाए। दीपक प्रकाश के मामले में यह दूसरी बार है जब यह प्रश्न उठा है, जिससे कानूनी और संवैधानिक बहस और गहरी हो गई है।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय के नोटिस का जवाब मिलने के बाद यह स्पष्ट होगा कि बिहार सरकार और संबंधित पक्ष इस नियुक्ति को किस आधार पर उचित ठहराते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यदि गठबंधन नेतृत्व दबाव में आया, तो दीपक प्रकाश का मंत्री पद खतरे में पड़ सकता है। फिलहाल मंत्री ने सभी अटकलों को दरकिनार करते हुए आधिकारिक प्रक्रिया का इंतजार करने की बात कही है।