24 जुलाई 2026
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सुप्रीम कोर्ट में PIL: बिहार मंत्री दीपक प्रकाश की पुनर्नियुक्ति अनुच्छेद 164(4) का उल्लंघन?

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सुप्रीम कोर्ट में PIL: बिहार मंत्री दीपक प्रकाश की पुनर्नियुक्ति अनुच्छेद 164(4) का उल्लंघन?

सारांश

बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की पुनर्नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिका में अनुच्छेद 164(4) की उस व्याख्या पर सवाल है जो गैर-विधायक को बार-बार मंत्री बनाने की राह खोलती है — और इसका जवाब पूरे देश के लिए नज़ीर बन सकता है।

मुख्य बातें

8 जून 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में PIL दायर कर बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की पुनर्नियुक्ति को चुनौती दी गई।
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत गैर-विधायक को बार-बार मंत्री बनाने को असंवैधानिक बताया गया।
अनुच्छेद 164(4) के अनुसार, गैर-विधायक मंत्री को छह माह के भीतर सदन की सदस्यता अनिवार्य रूप से लेनी होती है।
याचिकाकर्ता ने तत्काल सुनवाई और अंतरिम आदेश जारी करने की माँग की है।
यह मामला संसदीय लोकतंत्र , मंत्रिपरिषद की जवाबदेही और कार्यपालिका की संवैधानिक सीमाओं से जुड़े व्यापक प्रश्न उठाता है।

सर्वोच्च न्यायालय में 8 जून 2026 को एक जनहित याचिका (PIL) दायर कर बिहार सरकार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की पुनर्नियुक्ति को असंवैधानिक बताते हुए उसे रद्द करने की माँग की गई है। याचिका में केंद्रीय प्रश्न यह है कि क्या कोई व्यक्ति, जो बिहार विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य नहीं है, संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत निर्धारित छह माह की अवधि समाप्त हो जाने के बाद भी बार-बार मंत्री पद पर नियुक्त किया जा सकता है।

याचिका का मूल तर्क

याचिकाकर्ता का तर्क है कि अनुच्छेद 164(4) के अंतर्गत गैर-विधायक को मंत्री बनाने की संवैधानिक छूट केवल एक बार और अस्थायी रूप से उपलब्ध है। याचिका में स्पष्ट किया गया है कि इस प्रावधान का बार-बार उपयोग — चाहे इस्तीफे के माध्यम से हो, मंत्रिमंडल पुनर्गठन के ज़रिये हो या पुनर्नियुक्ति के रास्ते से — संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है।

याचिका में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा गया है कि यह प्रावधान लोकतांत्रिक जवाबदेही को दरकिनार करने का साधन नहीं बन सकता। याचिकाकर्ता का आरोप है कि दीपक प्रकाश इस प्रावधान का उल्लंघन करते हुए बिना सदन की सदस्यता प्राप्त किए लगातार मंत्री पद पर बने हुए हैं।

अनुच्छेद 164(4): संवैधानिक प्रावधान क्या कहता है

संविधान का अनुच्छेद 164(4) यह व्यवस्था देता है कि यदि कोई व्यक्ति विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं है, तो उसे मंत्री बनाए जाने के छह माह के भीतर संबंधित सदन की सदस्यता अनिवार्य रूप से प्राप्त करनी होगी। यदि वह ऐसा नहीं कर पाता, तो उसे मंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ता है। यह प्रावधान मूलतः उन विशेषज्ञों या तकनीकी व्यक्तियों को कार्यपालिका में लाने की अस्थायी व्यवस्था है जो उस समय निर्वाचित सदन के सदस्य नहीं होते।

व्यापक संवैधानिक प्रश्न

याचिका में यह भी रेखांकित किया गया है कि यह मामला केवल एक व्यक्ति की नियुक्ति तक सीमित नहीं है। इससे जुड़े व्यापक संवैधानिक प्रश्नों में संसदीय लोकतंत्र, मंत्रिपरिषद की जवाबदेही, कार्यपालिका की संवैधानिक सीमाएँ और संवैधानिक शासन जैसे मुद्दे शामिल हैं। याचिकाकर्ता ने अदालत से इस मामले में तत्काल सुनवाई और अंतरिम आदेश जारी करने की अपील की है।

यह ऐसे समय में आया है जब…

गौरतलब है कि अनुच्छेद 164(4) की व्याख्या को लेकर विभिन्न राज्यों में पहले भी विवाद उठते रहे हैं। यह याचिका ऐसे समय में दायर की गई है जब बिहार में आगामी राजनीतिक गतिविधियों को लेकर सरगर्मी बढ़ी हुई है। यदि सर्वोच्च न्यायालय इस याचिका पर सुनवाई स्वीकार करता है, तो इसका प्रभाव केवल बिहार तक नहीं, बल्कि अन्य राज्यों में भी गैर-विधायकों की मंत्री-नियुक्ति की परंपरा पर पड़ सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय का इस याचिका पर अगला रुख इस संवैधानिक बहस की दिशा तय करेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो यह केवल बिहार तक सीमित नहीं रहेगा; देशभर में गैर-विधायकों की मंत्री-नियुक्ति की परंपरा पर पुनर्विचार होगा। असली सवाल यह है कि क्या न्यायालय इस 'अस्थायी प्रावधान' के दीर्घकालिक दुरुपयोग पर अंकुश लगाने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश देगा — जो अब तक नहीं दिए गए।
RashtraPress
24 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दीपक प्रकाश की पुनर्नियुक्ति के खिलाफ PIL में क्या माँग की गई है?
याचिका में बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की पुनर्नियुक्ति को असंवैधानिक घोषित कर रद्द करने की माँग की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि अनुच्छेद 164(4) के तहत गैर-विधायक को मंत्री बनाने की छह माह की छूट का बार-बार उपयोग संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है।
संविधान का अनुच्छेद 164(4) क्या कहता है?
अनुच्छेद 164(4) के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं है और उसे मंत्री बनाया जाता है, तो उसे छह माह के भीतर संबंधित सदन की सदस्यता प्राप्त करनी होगी। यदि वह ऐसा नहीं कर पाता, तो उसे मंत्री पद छोड़ना पड़ता है।
इस PIL का व्यापक संवैधानिक महत्व क्या है?
यह मामला केवल एक मंत्री की नियुक्ति तक सीमित नहीं है — इसमें संसदीय लोकतंत्र, मंत्रिपरिषद की जवाबदेही और कार्यपालिका की संवैधानिक सीमाओं जैसे बड़े प्रश्न जुड़े हैं। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय देशभर में गैर-विधायकों की मंत्री-नियुक्ति की परंपरा के लिए नज़ीर बन सकता है।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से क्या अपील की है?
याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय से इस मामले में तत्काल सुनवाई और अंतरिम आदेश जारी करने की अपील की है। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला भी दिया गया है जो अनुच्छेद 164(4) की सीमित और अस्थायी प्रकृति को रेखांकित करते हैं।
क्या पहले भी अनुच्छेद 164(4) को लेकर विवाद हुए हैं?
हाँ, अनुच्छेद 164(4) की व्याख्या को लेकर अन्य राज्यों में भी पहले विवाद उठते रहे हैं। यह प्रावधान मूलतः विशेषज्ञों को कार्यपालिका में लाने की अस्थायी व्यवस्था है, लेकिन इसके बार-बार उपयोग पर कोई स्पष्ट न्यायिक दिशानिर्देश अब तक नहीं आया है।
राष्ट्र प्रेस
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