दीपक प्रकाश मंत्री पद विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस, अनुच्छेद 164(4) पर उठे सवाल
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस उस याचिका पर आया है जिसमें तर्क दिया गया है कि दीपक प्रकाश न तो विधानसभा के सदस्य हैं और न ही विधान परिषद के, इसलिए संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत वे मंत्री पद पर नहीं बने रह सकते। कोर्ट ने बिहार सरकार और चुनाव आयोग को भी नोटिस जारी करते हुए मंत्री के रूप में उनके द्वारा लिए गए फैसलों पर रोक लगाने का आदेश दिया है।
मुख्य घटनाक्रम
याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह की ओर से पेश वकील सुदीप चंद्रा ने बताया कि दीपक प्रकाश को पहली बार 20 नवंबर 2025 को मंत्री बनाया गया था। संविधान के अनुच्छेद 164(4) के अनुसार, कोई भी गैर-विधायक व्यक्ति अधिकतम छह महीने तक मंत्री रह सकता है, बशर्ते इस दौरान वह विधानमंडल की सदस्यता हासिल कर ले। दीपक प्रकाश का यह छह महीने का कार्यकाल 15 अप्रैल 2026 को समाप्त हो गया — यानी वे केवल चार महीने 26 दिन ही मंत्री रह सके।
इसके बाद बिहार में सत्ता परिवर्तन हुआ और सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने। नई सरकार ने दीपक प्रकाश को दोबारा पंचायती राज विभाग का मंत्री नियुक्त कर दिया — जबकि वे अभी भी किसी भी विधायी सदन के सदस्य नहीं हैं।
संवैधानिक प्रश्न क्या है
वकील सुदीप चंद्रा के अनुसार, अनुच्छेद 164(4) की छूट एकमुश्त अवसर है — यह सरकार बदलने पर दोबारा नहीं मिलती। उन्होंने कहा, 'विधायी सदन के सदस्य नहीं तो मंत्री नहीं रह सकते। यह संविधान की स्पष्ट व्यवस्था है।' हाल ही में एमएलसी चुनाव हुए, जिनमें दावा था कि दीपक प्रकाश नामांकन दाखिल करेंगे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया — जिससे उनकी संवैधानिक स्थिति और कमज़ोर हो गई।
पंजाब की मिसाल
वकील ने बताया कि इसी प्रकार का मामला पहले पंजाब में भी सामने आ चुका है, जहाँ यह स्थापित हुआ कि अनुच्छेद 164(4) की छह महीने की छूट का उपयोग केवल एक बार किया जा सकता है। उस उदाहरण के आधार पर याचिकाकर्ता का तर्क है कि सरकार बदलने के बाद दीपक प्रकाश को फिर से मंत्री नियुक्त करना असंवैधानिक है।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सर्वोच्च न्यायालय ने इस याचिका पर संज्ञान लेते हुए दीपक प्रकाश, बिहार सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। इसके साथ ही कोर्ट ने मंत्री के रूप में दीपक प्रकाश द्वारा लिए गए फैसलों पर अंतरिम रोक लगा दी है। याचिकाकर्ता की मुख्य माँग है कि उन्हें मंत्री पद से तत्काल हटाया जाए।
आगे क्या होगा
अब सर्वोच्च न्यायालय में सभी पक्षों के जवाब आने के बाद अगली सुनवाई होगी। यह मामला न केवल बिहार बल्कि उन सभी राज्यों के लिए एक संवैधानिक मिसाल बन सकता है जहाँ गैर-विधायकों को मंत्री पद दिया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला अनुच्छेद 164(4) की व्याख्या को और स्पष्ट करेगा।