डॉ. प्रिया सेल्वराज ने 50 की उम्र में फतह किया माउंट एवरेस्ट, 6-7 महीनों में दो 8,000 मीटर चोटियाँ
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु की पर्वतारोही डॉ. प्रिया सेल्वराज ने 50 वर्ष की आयु पार करने के बाद माउंट एवरेस्ट और माउंट मानसलू — दुनिया की दो अत्यंत चुनौतीपूर्ण चोटियों — पर केवल छह से सात महीनों के अंतराल में सफलतापूर्वक चढ़ाई कर एक प्रेरणादायी मिसाल कायम की है। चेन्नई से ताल्लुक रखने वाली डॉ. सेल्वराज का यह अभियान उम्र और सीमाओं को चुनौती देने की असाधारण कहानी है।
पर्वतारोहण की शुरुआत और प्रेरणा
डॉ. प्रिया सेल्वराज ने बताया कि पर्वतारोहण की ओर उनका झुकाव जीवन के उस दौर में हुआ जब उन्हें समय, अवसर और सही मानसिकता एक साथ मिली। उन्होंने पहाड़ों को अपनी शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक सेहत के लिए एक आश्रय के रूप में देखा। यात्रा ट्रैकिंग से शुरू हुई, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने तकनीकी पर्वतारोहण की बारीकियाँ सीखीं और पेशेवर प्रशिक्षण लिया।
अपने कोच के मार्गदर्शन में उन्होंने शारीरिक और तकनीकी — दोनों तरह की तैयारी की। अब तक वह चार बड़े अभियानों के लिए प्रशिक्षण ले चुकी हैं।
माउंट मानसलू — आध्यात्मिकता का पर्वत
डॉ. सेल्वराज की पहली बड़ी पसंद माउंट मानसलू रही, जिसे 'माउंटेन ऑफ स्पिरिट' अर्थात आध्यात्मिकता का पर्वत कहा जाता है। उनके अनुसार, 8,000 मीटर से अधिक ऊँचाई वाली दुनिया की 14 सर्वोच्च चोटियों की ओर कदम बढ़ाने से पहले मानसलू पर चढ़ाई करना एक आदर्श शुरुआत मानी जाती है।
उन्होंने बताया कि यह यात्रा केवल एक पर्वतारोहण अभियान नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव था। तीन सप्ताह में चोटी फतह करने के बाद जब वह लौटीं, तो उन्होंने खुद को पहले से अधिक स्पष्ट सोच वाला, ऊर्जावान और बदला हुआ व्यक्ति महसूस किया।
माउंट एवरेस्ट — जीवन की सबसे कठिन परीक्षा
मानसलू के बाद विशेषज्ञों और परिचितों की सलाह पर डॉ. सेल्वराज ने माउंट एवरेस्ट की चुनौती स्वीकार की, हालाँकि एवरेस्ट शुरू में उनकी व्यक्तिगत प्राथमिकता नहीं था। चीन से अनुमति न मिलने के कारण उन्हें दक्षिणी मार्ग से चढ़ाई करनी पड़ी, जो एवरेस्ट का सर्वाधिक उपयोग किया जाने वाला रास्ता है।
डॉ. सेल्वराज ने कहा कि माउंट एवरेस्ट का अनुभव उनके जीवन का सबसे कठिन, चुनौतीपूर्ण और परिवर्तनकारी अनुभव रहा। मानसिक, शारीरिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक — हर स्तर पर एवरेस्ट ने उनकी परीक्षा ली। उन्होंने स्पष्ट कहा, 'अगर किसी एक पर्वत को सबसे ऊपर रखा जाए तो वह निश्चित रूप से एवरेस्ट होगा।'
डेथ जोन और जानलेवा हादसा
चढ़ाई के दौरान खराब मौसम के कारण उन्हें 'डेथ जोन' में एक अतिरिक्त रात बितानी पड़ी — जहाँ न भूख लगती है, न शरीर में ऊर्जा बचती है। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।
सबसे जानलेवा क्षण वापसी के दौरान खुम्बू आइसफॉल क्षेत्र में आया, जिसे दुनिया के सर्वाधिक जोखिम भरे पर्वतीय क्षेत्रों में गिना जाता है। यहाँ वह एक गहरी दरार (क्रेविस) में गिर गईं। उनके गाइड अनुप गुरु ने पहले ही सुरक्षा रस्सी लगाने का निर्देश दिया था — उसी रस्सी ने उनकी जान बचाई। डॉ. सेल्वराज ने कहा, 'यदि मैंने गाइड की बात न मानी होती, तो शायद आज जीवित नहीं होती।' उन्होंने कहा कि मौत के इतने करीब जाकर वापस लौटने पर जीवन देखने का नजरिया पूरी तरह बदल जाता है।
आगे की राह
भविष्य की योजनाओं पर डॉ. सेल्वराज ने कहा कि वह कभी बड़े लक्ष्य तय करके नहीं चलतीं, बल्कि परिस्थितियों और अवसरों के साथ आगे बढ़ती हैं। यह दृष्टिकोण ही उनकी असाधारण यात्रा का मूल मंत्र प्रतीत होता है — एक ऐसी महिला की कहानी जिसने साबित किया कि उम्र केवल एक संख्या है।