गोमूत्र खरीद से ग्रामीण आय का नया द्वार: बुलंदशहर में ₹10/लीटर पर पायलट, 15 गांव जुड़े
सारांश
मुख्य बातें
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले की स्याना तहसील के नरसैना गांव में किसान उत्पादक संगठन (FPO) के माध्यम से गोमूत्र की व्यावसायिक खरीद का एक अभिनव पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है, जिसमें पशुपालकों से ₹10 प्रति लीटर की दर से गोमूत्र खरीदा जा रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गो संरक्षण विजन के अनुरूप यह पहल गो संरक्षण, ग्रामीण रोज़गार, महिला सशक्तीकरण और जैविक खेती को एकसाथ जोड़ने का प्रयास है। 10 अगस्त 2026 को प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस मॉडल की सफलता के बाद इसे प्रदेश के अन्य हिस्सों तक विस्तार देने की योजना है।
मुख्य घटनाक्रम
डॉ. प्रवीण के नेतृत्व में संचालित इस FPO से आसपास के 15 गांव जोड़े गए हैं। प्रत्येक गांव में गोमूत्र संग्रह के लिए 200 लीटर क्षमता के टैंक स्थापित किए गए हैं, ताकि पशुपालकों को बिक्री के लिए दूर न जाना पड़े। वर्तमान में इन केंद्रों के माध्यम से प्रतिदिन लगभग 500 लीटर गोमूत्र एकत्र किया जा रहा है। आगे चलकर खरीद दर को बढ़ाकर ₹20 प्रति लीटर करने की भी योजना है।
महिला सशक्तीकरण की भूमिका
इस पूरे मॉडल में ग्रामीण महिलाओं की केंद्रीय भूमिका है। गोमूत्र संग्रह में सहयोग करने वाली महिलाओं को ₹2 प्रति लीटर कमीशन दिया जा रहा है, जिससे उन्हें घर और गांव में रहते हुए नियमित अतिरिक्त आमदनी का ज़रिया मिल रहा है। डॉ. प्रवीण के अनुसार, लगभग 300 महिलाओं के सहयोग से यह काम शुरू हुआ है और इन सभी महिलाओं को FPO में शेयरहोल्डर बनाया गया है — यानी वे केवल श्रमिक नहीं, बल्कि इस आर्थिक मॉडल की साझेदार हैं।
जैविक खेती से जुड़ाव
एकत्र गोमूत्र का उपयोग रासायनिक कृषि उत्पादों के विकल्प के रूप में किया जा रहा है। गोमूत्र में विभिन्न जड़ी-बूटियाँ मिलाकर खेतों में इस्तेमाल होने वाली दवाएँ तैयार की जाती हैं, जिन्हें बाद में समितियों के माध्यम से किसानों तक पहुँचाया जाता है। गो सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता ने बताया कि यह मॉडल पूरी तरह केमिकल मुक्त है और फसलों की वृद्धि में सहायक है। इस प्रकार एकत्र गोमूत्र से स्थानीय स्तर पर एक छोटी आपूर्ति श्रृंखला विकसित हो रही है।
आम जनता पर असर
यह ऐसे समय में आया है जब ग्रामीण क्षेत्रों में गोपालन से होने वाली आय मुख्यतः दूध और दुग्ध उत्पादों तक सीमित रही है। गोमूत्र को आर्थिक संसाधन के रूप में विकसित करने से गोवंश पालने वाले परिवारों को एक अतिरिक्त आय स्रोत मिल सकता है। गौरतलब है कि यदि खरीद दर ₹20 प्रति लीटर तक पहुँचती है, तो पशुपालकों की मासिक आय में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। गो संरक्षण को आर्थिक आधार मिलने से पशुओं की देखभाल के लिए प्रोत्साहन भी बढ़ेगा।
क्या होगा आगे
पायलट प्रोजेक्ट के अनुभवों के आधार पर इस मॉडल को उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में विस्तार देने की योजना है। गांवों में गोमूत्र संग्रह केंद्रों का व्यापक नेटवर्क विकसित होने पर अधिक संख्या में ग्रामीण महिलाओं और पशुपालकों को इससे जोड़ने की संभावना है। श्याम बिहारी गुप्ता के अनुसार, यह मॉडल गो संरक्षण को दीर्घकालिक रूप से आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।