गोटमार मेला 11 सितंबर को पांढुर्ना में: 18 मौतों के बावजूद जारी परंपरा, प्रशासन ने सख्त नियम लागू किए
सारांश
मुख्य बातें
पांढुर्ना (मध्य प्रदेश) में जाम नदी के किनारे 11 सितंबर को एक बार फिर सदियों पुराना गोटमार मेला आयोजित होगा, जिसमें पांढुर्ना और सावरगांव के ग्रामीण एक-दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस परंपरा के दुखद इतिहास में अब तक 18 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और हर साल लगभग 50 लोग घायल होते हैं।
मेले की पृष्ठभूमि और लोककथा
स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, इस परंपरा की जड़ें एक दुखद प्रेम कहानी में हैं। कथित तौर पर, वर्षों पूर्व पांढुर्ना का एक युवक सावरगांव की एक युवती के साथ भाग गया था। जब दोनों जाम नदी के पास पहुँचे, तो दोनों परिवारों ने उन पर पत्थरों से हमला कर दिया और नदी में ही दोनों की मृत्यु हो गई। तब से यह मेला उस घटना की स्मृति में प्रतिवर्ष आयोजित होता है।
इस रस्म की शुरुआत देवी चंडी की पूजा से होती है। सावरगांव के ग्रामीण नदी के बीच पलाश का पेड़ स्थापित करते हैं और उस पर झंडा बाँधते हैं — इस पेड़ को वे अपनी बेटी का प्रतीक मानते हैं। इसके बाद दोनों पक्ष नदी के दोनों किनारों से एक-दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं। जो पक्ष पलाश के पेड़ पर कब्ज़ा कर लेता है, उसे विजेता घोषित किया जाता है और वह पेड़ को देवी चंडी के मंदिर ले जाता है।
मुख्य घटनाक्रम और प्रशासनिक तैयारी
कलेक्टर नीरज कुमार वशिष्ठ ने लक्ष्मी स्मृति भवन में शांति समिति की बैठक बुलाकर स्पष्ट किया कि मेला पारंपरिक तरीके से आयोजित होगा, परंतु कड़े नियमों के साथ। 'गोफन' (गुलेल) का उपयोग करने वालों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाएगी।
मेले के दौरान एक डॉक्टर और एम्बुलेंस मौके पर तैनात रहेगी। भीड़ प्रबंधन के लिए साप्ताहिक बाज़ार को 8 सितंबर तक के लिए स्थगित कर दिया गया है। सुरक्षा और यातायात प्रबंधन के लिए भी व्यापक इंतज़ाम किए गए हैं।
कलेक्टर की अपील
कलेक्टर वशिष्ठ ने दोनों गाँवों के निवासियों से अपील की कि परंपरा को बनाए रखते हुए जानें जोखिम में न डाली जाएँ। उन्होंने कहा, 'लोगों की ज़िंदगी उनके परिवार के लिए बहुत कीमती है। सुरक्षित रहें और जिम्मेदारी से त्योहार मनाएं।' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पत्थरबाज़ी का सिलसिला तब समाप्त होना चाहिए जब सूर्यास्त से पूर्व नदी में लगा झंडा टूट जाए।
आम जनता पर असर और विवाद
स्थानीय लोगों के अनुसार, एक बार तो घायलों की संख्या 100 से भी अधिक हो गई थी। कई गैर-सरकारी और सामाजिक संगठन इस परंपरा को समाप्त करने की माँग करते रहे हैं, क्योंकि अतीत में अनेक जानें जा चुकी हैं। इसके बावजूद, गोटमार मेला स्थानीय पहचान और सांस्कृतिक स्मृति का एक सशक्त प्रतीक बना हुआ है।
क्या होगा आगे
इस वर्ष अधिकारियों को उम्मीद है कि परंपरा और सुरक्षा के कड़े इंतज़ामों के समन्वय से यह आयोजन बिना किसी जान-माल के नुकसान के सम्पन्न हो सकेगा। यह मेला इस बात की परीक्षा भी है कि क्या प्रशासनिक निगरानी सदियों पुरानी परंपराओं के साथ तालमेल बिठा सकती है।