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समस्तीपुर में 'हर घर तिरंगा' अभियान: 1,600 जीविका दीदियाँ बना रही हैं 80,000 से अधिक तिरंगे

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समस्तीपुर में 'हर घर तिरंगा' अभियान: 1,600 जीविका दीदियाँ बना रही हैं 80,000 से अधिक तिरंगे

सारांश

'हर घर तिरंगा' अभियान समस्तीपुर की 1,600 से अधिक जीविका दीदियों के लिए महज़ देशभक्ति नहीं — यह एक ठोस आजीविका का अवसर बन गया है। 80,000 से अधिक तिरंगों के ऑर्डर के साथ, ग्रामीण महिलाएँ राष्ट्रीय ध्वज सिलते हुए अपने परिवार की आर्थिक नींव मज़बूत कर रही हैं।

मुख्य बातें

समस्तीपुर में 'हर घर तिरंगा' अभियान के तहत जीविका दीदियों को 80,000 से अधिक तिरंगे तैयार करने के ऑर्डर मिले हैं।
1,600 से अधिक जीविका दीदियाँ जिले के सिलाई केंद्रों और घरों से दिन-रात काम कर रही हैं।
प्रत्येक तिरंगे की कीमत ₹25 निर्धारित; प्रत्येक प्रखंड को करीब 4,000 झंडों का लक्ष्य।
अब तक 10,000 से अधिक तिरंगे जिला कार्यालय और प्रखंडों में भेजे जा चुके हैं।
महिलाओं को तिरंगा निर्माण का विशेष प्रशिक्षण दिया गया; वंदे मातरम गीत के 150 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर यह अभियान चलाया जा रहा है।

बिहार के समस्तीपुर जिले में 'हर घर तिरंगा' अभियान ने ग्रामीण महिलाओं के लिए रोज़गार का एक बड़ा द्वार खोल दिया है। वंदे मातरम गीत के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में देशभर में चल रहे इस अभियान के तहत समस्तीपुर में सरकारी विभागों, औद्योगिक संस्थानों, सामुदायिक संगठनों और आम नागरिकों की ओर से जीविका दीदियों को 80,000 से अधिक राष्ट्रीय ध्वज तैयार करने के ऑर्डर प्राप्त हुए हैं। जिले के सभी प्रखंडों में संचालित सिलाई केंद्रों और घरों से मिलाकर 1,600 से अधिक जीविका दीदियाँ दिन-रात इस काम में जुटी हैं।

मुख्य घटनाक्रम

प्रत्येक तिरंगे की कीमत ₹25 निर्धारित की गई है, ताकि आम नागरिक आसानी से इसे खरीद सकें। जिले के प्रत्येक प्रखंड को करीब चार-चार हजार तिरंगे तैयार करने का लक्ष्य दिया गया है। अब तक 10,000 से अधिक तिरंगे जिला कार्यालय और विभिन्न प्रखंडों में भेजे जा चुके हैं, जबकि हजारों झंडे तैयार अवस्था में हैं।

समस्तीपुर के जीविका परियोजना प्रबंधक धनंजय कुमार ने बताया कि भारत सरकार के निर्देश पर जिला पदाधिकारी की देखरेख में प्रत्येक प्रखंड को राष्ट्रीय ध्वज उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। उन्होंने कहा कि एक केंद्र पर करीब चार हजार तिरंगे तैयार हैं, जिन्हें उजियारपुर प्रखंड के लिए भेजा जाएगा, और आवश्यकतानुसार अन्य प्रखंडों को भी आपूर्ति की जाएगी।

जीविका दीदियों पर असर

जीविका महिला संकुल संघ की इंचार्ज नीतू कुमारी ने बताया कि उनके केंद्र पर करीब 50 दीदियाँ तिरंगा निर्माण में लगी हैं। ब्लॉक स्तर से करीब ₹20,000 से ₹25,000 के ऑर्डर प्राप्त हुए हैं, जिनमें से लगभग ₹10,000 तक का काम पूरा किया जा चुका है। जिन दीदियों के पास अपनी सिलाई मशीन है, वे घर से काम कर रही हैं और तैयार तिरंगे बाद में केंद्र पर जमा किए जाते हैं।

तिरंगा बनाने में जुटीं जीविका दीदी बबीता कुमारी ने बताया कि उनके केंद्र पर आमतौर पर नाइटी, आंगनबाड़ी ड्रेस, मास्क, पेटीकोट और सूट-सलवार तैयार किए जाते हैं। फिलहाल तिरंगा बनाना प्राथमिकता है। उन्होंने याद दिलाया कि कोरोना काल में भी जीविका दीदियों ने मास्क तैयार कर सामाजिक जरूरत पूरी की थी। केंद्र पर करीब 20 महिलाएँ नियमित रूप से काम करती हैं।

प्रशिक्षण और तैयारी

धनंजय कुमार ने स्पष्ट किया कि बिहार ग्रामीण जीविकोपार्जन प्रोत्साहन समिति (जीविका) का मूल उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को आजीविका के अवसर उपलब्ध कराना है। इसी लक्ष्य के तहत महिलाओं को तिरंगा निर्माण का विशेष प्रशिक्षण दिया गया, जिसके बाद उन्हें ऑर्डर सौंपे गए। यह ऐसे समय में आया है जब ग्रामीण महिला रोज़गार को लेकर नीतिगत बहस तेज़ है।

आगे की राह

जैसे-जैसे 15 अगस्त नज़दीक आ रहा है, ऑर्डरों की संख्या और बढ़ने की संभावना है। जीविका दीदियाँ शेष ऑर्डर समय पर पूरे करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह अभियान न केवल राष्ट्रीय भावना को मजबूत कर रहा है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक स्वावलंबिता की दिशा में एक ठोस कदम भी साबित हो रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो राष्ट्रीय प्रतीकवाद और ज़मीनी आर्थिक सशक्तीकरण एक साथ चलते हैं — यह नीति-निर्माण का एक सकारात्मक उदाहरण है। हालाँकि, ₹25 प्रति झंडे की दर पर 80,000 झंडों से कुल आय लगभग ₹20 लाख बनती है, जो 1,600 महिलाओं के बीच बँटने पर प्रति दीदी बेहद सीमित है — इसलिए यह टिकाऊ आजीविका नहीं, बल्कि अल्पकालिक अवसर है। असली परीक्षा यह है कि क्या जीविका इस मौसमी माँग को साल भर चलने वाले सिलाई ऑर्डरों में बदल पाती है। कोरोना काल के मास्क उत्पादन की तरह, यह एक बार फिर साबित करता है कि संकट या अभियान के समय ये महिलाएँ तत्पर रहती हैं — लेकिन नियमित और मूल्य-वर्धित काम की ज़रूरत बनी रहती है।
RashtraPress
12 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'हर घर तिरंगा' अभियान में समस्तीपुर की जीविका दीदियों की क्या भूमिका है?
समस्तीपुर की 1,600 से अधिक जीविका दीदियाँ सरकारी विभागों, संस्थानों और आम नागरिकों से मिले 80,000 से अधिक तिरंगों के ऑर्डर पूरे कर रही हैं। वे जिले के सिलाई केंद्रों और अपने घरों से यह काम कर रही हैं।
समस्तीपुर में तिरंगे की कीमत क्या रखी गई है?
प्रत्येक तिरंगे की कीमत ₹25 निर्धारित की गई है, ताकि आम नागरिक सुलभता से राष्ट्रीय ध्वज खरीद सकें।
जीविका दीदियों को तिरंगा बनाने के लिए कैसे तैयार किया गया?
महिलाओं को तिरंगा निर्माण का विशेष प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद ही उन्हें ऑर्डर सौंपे गए, ताकि गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके।
अब तक कितने तिरंगे तैयार होकर भेजे जा चुके हैं?
जीविका परियोजना प्रबंधक धनंजय कुमार के अनुसार, अब तक 10,000 से अधिक तिरंगे जिला कार्यालय और विभिन्न प्रखंडों में भेजे जा चुके हैं, जबकि हजारों झंडे तैयार अवस्था में हैं।
यह अभियान किस अवसर पर चलाया जा रहा है?
यह अभियान 'वंदे मातरम' गीत के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में और स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) की पूर्व संध्या पर देशभर में चलाया जा रहा है। इसका उद्देश्य अधिक से अधिक घरों तक राष्ट्रीय ध्वज पहुँचाना है।
राष्ट्र प्रेस
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