कानपुर देहात: 96 स्वयं सहायता समूहों की 360 महिलाएं बना रही हैं 3 लाख तिरंगे, 'हर घर तिरंगा' को मिली नई ताकत
सारांश
मुख्य बातें
कानपुर देहात में इस स्वतंत्रता दिवस पर 'हर घर तिरंगा' अभियान को एक अनोखी मानवीय शक्ति मिल रही है — राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) से जुड़े 96 स्वयं सहायता समूहों की 360 महिलाएं दिन-रात मेहनत कर करीब 3 लाख तिरंगे तैयार कर रही हैं। यह पहल देशभक्ति के प्रतीक को हाथ से बुनने का काम ही नहीं कर रही, बल्कि गाँव की गरीब, विधवा, दिव्यांग और कम शिक्षित महिलाओं के लिए रोज़गार और आत्मनिर्भरता का एक सशक्त माध्यम भी बन गई है।
मुख्य घटनाक्रम
जिले को NRLM की ओर से 3 लाख तिरंगे तैयार करने का लक्ष्य सौंपा गया था। हर तिरंगा 30 इंच लंबा और 20 इंच चौड़ा बनाया जा रहा है, जिसकी सरकार द्वारा निर्धारित कीमत ₹20 प्रति झंडा रखी गई है। तैयार होने वाले ये तिरंगे जिले के स्कूलों, सरकारी कार्यालयों और अन्य सरकारी भवनों पर लगाए जाएंगे। उत्पादन की लागत स्वयं सहायता समूह की महिलाएं स्वयं वहन करेंगी और जो भी मुनाफा होगा, वह सीधे समूह की सदस्यों को प्राप्त होगा।
महिलाओं की आर्थिक भागीदारी
यह पहल उन महिलाओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जो कभी घर की चारदीवारी तक सीमित थीं। स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर वे अब हर महीने एक स्थिर आय अर्जित कर रही हैं और परिवार की जिम्मेदारियाँ भी संभाल रही हैं। उमंग स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष प्रतिमा सिंह ने कहा, 'विभाग का मकसद ज़्यादा से ज़्यादा महिलाओं को रोज़गार देना और उन्हें आर्थिक रूप से मज़बूत करना है, ताकि आत्मनिर्भर भारत के साथ आत्मनिर्भर महिलाएं भी तैयार हो सकें।'
पिछले वर्ष का अनुभव
गौरतलब है कि इन महिला समूहों ने पिछले वर्ष भी अपना हुनर साबित किया था, जब उन्होंने 200 मीटर लंबा तिरंगा तैयार किया था। अधिकारियों के अनुसार, पिछले साल बनाए गए झंडों पर प्रति झंडा करीब ₹6 का मुनाफा हुआ था। इस वर्ष भी समूह की महिलाएं उसी उत्साह के साथ तय समय सीमा में लक्ष्य पूरा करने में जुटी हैं।
अधिकारियों की प्रतिक्रिया
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के उपायुक्त अशोक कुमार ने कहा, ''हर घर तिरंगा' के ज़रिए कानपुर देहात की महिलाएं केवल झंडा ही नहीं बना रही हैं — वे आत्मनिर्भरता, सम्मान और सशक्तीकरण की नई कहानी भी लिख रही हैं।' महिलाओं का कहना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की इस पहल ने उन्हें सम्मान के साथ काम दिया है, जिससे उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा है।
आगे की राह
यह पहल ग्रामीण महिला सशक्तीकरण और राष्ट्रीय अभियानों के बीच एक सफल तालमेल का उदाहरण बनती जा रही है। यदि इस वर्ष का लक्ष्य समय पर पूरा होता है, तो यह मॉडल अन्य जिलों के लिए भी अनुकरणीय बन सकता है।