13 सितंबर 2026
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अयोध्या के रामायण विश्वविद्यालय में ईरान-इजरायल संघर्ष पर देश की पहली राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

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अयोध्या के रामायण विश्वविद्यालय में ईरान-इजरायल संघर्ष पर देश की पहली राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

सारांश

अयोध्या के महर्षि महेश योगी रामायण विश्वविद्यालय ने ईरान-इजरायल संघर्ष पर देश की पहली राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित कर अकादमिक विमर्श में नई मिसाल कायम की। ICSSR अनुदान से आयोजित इस दो दिवसीय कार्यक्रम में 100 से अधिक शोधार्थियों ने भारत की कूटनीतिक दुविधा और ऊर्जा सुरक्षा पर विचार साझा किए।

मुख्य बातें

महर्षि महेश योगी रामायण विश्वविद्यालय, अयोध्या ने ईरान-इजरायल संघर्ष पर भारत की पहली राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की।
संगोष्ठी ICSSR के अनुदान से आयोजित हुई और इसमें 100 से अधिक पीएचडी शोधार्थियों तथा 30 से ज़्यादा छात्रों ने भाग लिया।
दो दिनों में चार सत्र आयोजित हुए; समापन सत्र की अध्यक्षता करुणाशंकर उपाध्याय और डॉ.
विशेषज्ञों ने रेखांकित किया कि भारत अपनी ज़रूरत का लगभग 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जो इस संघर्ष को भारत के लिए सीधी चुनौती बनाता है।
संगोष्ठी के निष्कर्षों को नीति-निर्माताओं तक पहुँचाने की योजना है।

महर्षि महेश योगी रामायण विश्वविद्यालय, अयोध्या ने 13 सितंबर 2026 को ईरान-इजरायल संघर्ष के भारत पर प्रभाव और देश की कूटनीतिक नीति पर केंद्रित देश की पहली राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन किया। भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) के सहयोग से आयोजित इस दो दिवसीय संगोष्ठी में 100 से अधिक पीएचडी शोधार्थियों और 30 से ज़्यादा छात्रों ने ऑनलाइन व ऑफलाइन माध्यम से अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए।

संगोष्ठी का उद्देश्य और पृष्ठभूमि

विश्वविद्यालय के कुलपति भानु प्रताप सिंह ने बताया कि इजरायल और ईरान के बीच जारी विवाद का भारत पर क्या असर पड़ेगा और इस स्थिति में भारत की नीति क्या होनी चाहिए — इन्हीं प्रश्नों के उत्तर तलाशने के लिए यह संगोष्ठी आयोजित की गई। उनके अनुसार, संगोष्ठी से प्राप्त निष्कर्षों को उचित माध्यम से आगे बढ़ाया जाएगा।

यह आयोजन इस दृष्टि से विशेष है कि उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे भारत में किसी विश्वविद्यालय द्वारा ईरान-इजरायल मुद्दे पर आयोजित यह पहली राष्ट्रीय संगोष्ठी मानी जा रही है। गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आई है जब वैश्विक स्तर पर इस संघर्ष के आर्थिक और कूटनीतिक प्रभाव को लेकर चिंताएँ गहरा रही हैं।

चार सत्रों में विशेषज्ञों का मंथन

दो दिनों में कुल चार सत्र आयोजित किए गए, जिनमें से प्रत्येक में एक विषय-विशेषज्ञ और एक अध्यक्ष उपस्थित रहे। समापन सत्र की अध्यक्षता करुणाशंकर उपाध्याय और डॉ. नीला तिवारी ने की। डॉ. गौरव ने जानकारी दी कि यह संगोष्ठी ICSSR से प्राप्त अनुदान के तहत आयोजित की गई और विश्वविद्यालय के संस्थापक महर्षि महेश योगी के शांति-केंद्रित दर्शन से प्रेरित है।

भारत की कूटनीतिक चुनौती: संतुलन की राह

डॉ. स्वाति सिंह ने संगोष्ठी में कहा कि भारत इस विवाद में संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। एक ओर ईरान के साथ भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध हैं, वहीं दूसरी ओर इजरायल के साथ कई रणनीतिक साझेदारियाँ हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि भारत अपनी ज़रूरत का करीब 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए यह संघर्ष एक भू-राजनीतिक संकट के रूप में भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सीधे प्रभावित करता है।

आम जनता और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर

डॉ. स्वाति सिंह ने आगाह किया कि यदि यह संघर्ष जारी रहा और शांति स्थापित नहीं हुई, तो कच्चे तेल के दाम बढ़ेंगे, महंगाई ऊपर जाएगी और वैश्विक व्यापार संतुलन बिगड़ेगा। उनका कहना था, 'किसी भी समस्या का समाधान युद्ध नहीं है — शांति से ही इसे खत्म किया जा सकता है।' यह टिप्पणी उस व्यापक भारतीय दृष्टिकोण को रेखांकित करती है जो संवाद और कूटनीति को प्राथमिकता देता है।

आगे की राह

संगोष्ठी के निष्कर्षों को नीति-निर्माताओं और उचित माध्यमों तक पहुँचाने की योजना है। विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार, इस प्रकार की अकादमिक पहल वैश्विक संघर्षों पर भारतीय परिप्रेक्ष्य को मज़बूत करने में सहायक हो सकती है। इस आयोजन ने यह भी रेखांकित किया कि भारत के विश्वविद्यालय अब केवल घरेलू नहीं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीतिक विमर्श में भी सक्रिय भागीदारी निभाने को तत्पर हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

असली प्रश्न यह है कि क्या इन शोध-पत्रों के निष्कर्ष वास्तव में नीति-निर्माण की प्रक्रिया को प्रभावित करेंगे, या यह केवल अकादमिक अभ्यास बनकर रह जाएगा। भारत की 80 प्रतिशत तेल आयात-निर्भरता और ईरान-इजरायल दोनों के साथ रणनीतिक साझेदारी के बीच जिस 'संतुलन' की बात विशेषज्ञों ने की, वह नीतिगत शब्दावली में सहज लगती है — लेकिन जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो वह संतुलन आम नागरिक की जेब पर सीधा असर डालता है।
RashtraPress
13 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महर्षि महेश योगी रामायण विश्वविद्यालय में ईरान-इजरायल पर किस संगोष्ठी का आयोजन हुआ?
अयोध्या के महर्षि महेश योगी रामायण विश्वविद्यालय ने 13 सितंबर 2026 को ICSSR के अनुदान से ईरान-इजरायल संघर्ष पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न की। यह देश की पहली ऐसी संगोष्ठी बताई जा रही है जो किसी विश्वविद्यालय द्वारा इस विशेष विषय पर आयोजित की गई।
इस संगोष्ठी में कितने प्रतिभागी शामिल हुए?
संगोष्ठी में 100 से अधिक पीएचडी शोधार्थियों और 30 से ज़्यादा छात्रों ने ऑनलाइन व ऑफलाइन माध्यम से अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। कुल चार सत्र आयोजित हुए, प्रत्येक में एक विषय-विशेषज्ञ और एक अध्यक्ष उपस्थित रहे।
ईरान-इजरायल संघर्ष का भारत पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत अपनी ज़रूरत का करीब 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए इस संघर्ष के लंबे खिंचने पर कच्चे तेल के दाम बढ़ सकते हैं, महंगाई बढ़ सकती है और वैश्विक व्यापार संतुलन प्रभावित हो सकता है। भारत को ईरान और इजरायल दोनों के साथ अपने रणनीतिक व ऐतिहासिक संबंधों को संतुलित रखने की कूटनीतिक चुनौती भी है।
संगोष्ठी के निष्कर्षों का आगे क्या होगा?
विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार, संगोष्ठी से प्राप्त निष्कर्षों को उचित माध्यम से नीति-निर्माताओं तक पहुँचाया जाएगा। यह संगोष्ठी ICSSR अनुदान के तहत आयोजित हुई, जो इसके अकादमिक महत्व को रेखांकित करती है।
रामायण विश्वविद्यालय ने यह संगोष्ठी क्यों आयोजित की?
विश्वविद्यालय के संस्थापक महर्षि महेश योगी के शांति-केंद्रित दर्शन से प्रेरित होकर यह पहल की गई। डॉ. स्वाति सिंह और डॉ. गौरव ने बताया कि विश्वविद्यालय का मूल उद्देश्य शांति का प्रचार-प्रसार है और ईरान-इजरायल संघर्ष का वैश्विक असर भारत को भी प्रभावित कर रहा है, इसलिए इस विषय पर अकादमिक विमर्श ज़रूरी था।
राष्ट्र प्रेस
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