24 सितंबर 2026
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झारखंड हाईकोर्ट का सख्त रुख: थानों में CCTV न लगाने पर मुख्य सचिव, गृह सचिव और DGP को अवमानना नोटिस

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झारखंड हाईकोर्ट का सख्त रुख: थानों में CCTV न लगाने पर मुख्य सचिव, गृह सचिव और DGP को अवमानना नोटिस

सारांश

झारखंड के थानों में CCTV न लगने की लंबी कहानी अब अवमानना तक पहुँची — 2018 से 450 से अधिक हिरासत मौतें, चार बार टेंडर, और फिर भी शून्य नतीजा। हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव, गृह सचिव और DGP को नोटिस देकर साफ संदेश दिया: अब माफी नहीं, जवाब चाहिए।

मुख्य बातें

झारखंड हाईकोर्ट ने 24 सितंबर 2026 को थानों में CCTV न लगाने पर मुख्य सचिव, गृह सचिव और DGP को अवमानना नोटिस जारी किया।
चीफ जस्टिस एमएस सोनक की खंडपीठ ने कहा — सरकार हलफनामे में सच छिपा रही है, टालमटोल का रवैया अस्वीकार्य है।
2018 से अब तक झारखंड में पुलिस हिरासत में 450 से अधिक मौतें दर्ज; CCTV के लिए चार बार टेंडर निकले, कोई नतीजा नहीं।
मामला तरुण महतो की कथित हिरासत में मारपीट ( 19 नवंबर 2025 ) से शुरू हुआ; पत्नी के पत्र पर कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया।
तीनों अधिकारियों को 15 अक्टूबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश; संतोषजनक उत्तर न मिलने पर औपचारिक अवमानना कार्रवाई संभव।

झारखंड हाईकोर्ट ने 24 सितंबर 2026 को राज्य के पुलिस थानों में CCTV कैमरे न लगाए जाने को लेकर अत्यंत कड़ा रुख अपनाते हुए मुख्य सचिव, गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) को अवमानना कार्रवाई से पूर्व कारण बताओ नोटिस जारी किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार अपने हलफनामे में सही स्थिति छिपाकर टालमटोल का रवैया अपना रही है, जो न्यायालय के आदेश की अवमानना के दायरे में आता है।

मुख्य घटनाक्रम

चीफ जस्टिस एमएस सोनक की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि राज्य सरकार अदालत के आदेश का पालन करने में कोई रुचि नहीं दिखा रही। कोर्ट ने कहा कि थानों में कैमरे लगाने के लिए चार बार टेंडर निकाले गए, किंतु एक भी बार कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया। ऐसे में तीनों वरिष्ठ अधिकारियों के विरुद्ध अवमानना की कार्रवाई के अलावा अदालत के पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचता।

अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 15 अक्टूबर की तारीख तय की है और तब तक तीनों अधिकारियों को नोटिस का जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। पिछली सुनवाई में भी कोर्ट आदेश का पालन न होने पर DGP से जवाब माँग चुका था।

हिरासत में मौत और मारपीट की पृष्ठभूमि

कोर्ट ने रेखांकित किया कि 2018 के बाद से अब तक पुलिस हिरासत में मौत के 450 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं। इसके बावजूद थानों में निगरानी के लिए CCTV न लगाया जाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। अदालत ने स्पष्ट किया कि हिरासत में मारपीट और मौत जैसी घटनाओं पर नियंत्रण के लिए कैमरों की स्थापना अनिवार्य है।

गौरतलब है कि सुनवाई के दौरान DGP ने CCTV लगाने की जिम्मेदारी गृह विभाग पर डालने की कोशिश की, जिसे अदालत ने गैर-जिम्मेदाराना रवैया करार देते हुए खारिज कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि: तरुण महतो प्रकरण

यह पूरा मामला 2024 विधानसभा चुनाव में ईचागढ़ सीट से प्रत्याशी रहे तरुण महतो से जुड़ा है। कथित तौर पर 19 नवंबर 2025 की रात पुलिस उन्हें थाने ले गई, जहाँ हिरासत में उनके साथ गंभीर मारपीट की गई। इस कथित बर्बरता के बाद तरुण महतो की पत्नी ने हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिखा। अदालत ने उस पत्र पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू की, जो धीरे-धीरे राज्यभर में CCTV न लगाए जाने के व्यापक मुद्दे में बदल गई।

आम जनता और नागरिक अधिकारों पर असर

यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में पुलिस हिरासत में मौत के मामले बहस का केंद्र बने हुए हैं। सर्वोच्च न्यायालय भी कई अवसरों पर थानों में CCTV लगाने के निर्देश दे चुका है। झारखंड में अनुपालन न होने की यह स्थिति दर्शाती है कि न्यायिक आदेश और जमीनी हकीकत के बीच कितना बड़ा अंतर है।

नागरिक अधिकार संगठनों का कहना है कि CCTV की अनुपस्थिति हिरासत में अत्याचार के पीड़ितों के लिए साक्ष्य जुटाना लगभग असंभव बना देती है, जिससे जवाबदेही का पूरा तंत्र कमज़ोर पड़ता है।

क्या होगा आगे

15 अक्टूबर की सुनवाई में यदि तीनों अधिकारियों का जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया, तो अदालत औपचारिक अवमानना कार्रवाई शुरू कर सकती है, जिसमें दंड या जेल तक की नौबत आ सकती है। यह मामला झारखंड में पुलिस सुधारों और न्यायिक जवाबदेही की दिशा में एक अहम मोड़ साबित हो सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि जवाबदेही के प्रति संस्थागत उदासीनता का प्रमाण है। सर्वोच्च न्यायालय CCTV के निर्देश वर्षों पहले दे चुका है, फिर भी राज्य सरकार हलफनामों में सच छिपाती रही — यह न्यायपालिका के साथ खुला छल है। असली सवाल यह है कि क्या अवमानना नोटिस से आगे भी कोई ठोस परिणाम निकलेगा, या यह भी पिछली चेतावनियों की तरह कागज़ी कार्रवाई बनकर रह जाएगा। पुलिस सुधारों पर राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना न्यायिक दबाव की भी सीमाएँ हैं।
RashtraPress
24 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

झारखंड हाईकोर्ट ने CCTV मामले में किसे नोटिस दिया है?
झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव, गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। ये नोटिस थानों में CCTV कैमरे न लगाने पर अवमानना कार्रवाई से पहले के कदम के रूप में जारी किए गए हैं।
झारखंड के थानों में CCTV क्यों नहीं लगे?
अदालत के अनुसार, CCTV लगाने के लिए चार बार टेंडर निकाले गए किंतु कोई ठोस परिणाम नहीं निकला। राज्य सरकार ने हलफनामों में सही स्थिति छिपाई और DGP ने जिम्मेदारी गृह विभाग पर डालने की कोशिश की, जिसे अदालत ने गैर-जिम्मेदाराना बताया।
यह मामला पहली बार कैसे सामने आया?
यह मामला ईचागढ़ से 2024 विधानसभा प्रत्याशी रहे तरुण महतो की कथित हिरासत में मारपीट (19 नवंबर 2025) से जुड़ा है। उनकी पत्नी ने चीफ जस्टिस को पत्र लिखा, जिस पर हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई शुरू की।
2018 के बाद से झारखंड में हिरासत में कितनी मौतें हुई हैं?
झारखंड हाईकोर्ट ने सुनवाई में बताया कि 2018 से अब तक राज्य में पुलिस हिरासत में मौत के 450 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं। अदालत ने इसी गंभीरता को आधार बनाते हुए CCTV की स्थापना को अनिवार्य बताया।
इस मामले में अगली सुनवाई कब होगी और क्या हो सकता है?
अगली सुनवाई 15 अक्टूबर 2026 को निर्धारित है, जब तक तीनों अधिकारियों को नोटिस का जवाब दाखिल करना होगा। यदि जवाब संतोषजनक नहीं रहा तो अदालत औपचारिक अवमानना कार्रवाई शुरू कर सकती है, जिसमें दंड या जेल की नौबत भी आ सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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