झारखंड हाईकोर्ट का सख्त रुख: थानों में CCTV न लगाने पर मुख्य सचिव, गृह सचिव और DGP को अवमानना नोटिस
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड हाईकोर्ट ने 24 सितंबर 2026 को राज्य के पुलिस थानों में CCTV कैमरे न लगाए जाने को लेकर अत्यंत कड़ा रुख अपनाते हुए मुख्य सचिव, गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) को अवमानना कार्रवाई से पूर्व कारण बताओ नोटिस जारी किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार अपने हलफनामे में सही स्थिति छिपाकर टालमटोल का रवैया अपना रही है, जो न्यायालय के आदेश की अवमानना के दायरे में आता है।
मुख्य घटनाक्रम
चीफ जस्टिस एमएस सोनक की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि राज्य सरकार अदालत के आदेश का पालन करने में कोई रुचि नहीं दिखा रही। कोर्ट ने कहा कि थानों में कैमरे लगाने के लिए चार बार टेंडर निकाले गए, किंतु एक भी बार कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया। ऐसे में तीनों वरिष्ठ अधिकारियों के विरुद्ध अवमानना की कार्रवाई के अलावा अदालत के पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचता।
अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 15 अक्टूबर की तारीख तय की है और तब तक तीनों अधिकारियों को नोटिस का जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। पिछली सुनवाई में भी कोर्ट आदेश का पालन न होने पर DGP से जवाब माँग चुका था।
हिरासत में मौत और मारपीट की पृष्ठभूमि
कोर्ट ने रेखांकित किया कि 2018 के बाद से अब तक पुलिस हिरासत में मौत के 450 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं। इसके बावजूद थानों में निगरानी के लिए CCTV न लगाया जाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। अदालत ने स्पष्ट किया कि हिरासत में मारपीट और मौत जैसी घटनाओं पर नियंत्रण के लिए कैमरों की स्थापना अनिवार्य है।
गौरतलब है कि सुनवाई के दौरान DGP ने CCTV लगाने की जिम्मेदारी गृह विभाग पर डालने की कोशिश की, जिसे अदालत ने गैर-जिम्मेदाराना रवैया करार देते हुए खारिज कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि: तरुण महतो प्रकरण
यह पूरा मामला 2024 विधानसभा चुनाव में ईचागढ़ सीट से प्रत्याशी रहे तरुण महतो से जुड़ा है। कथित तौर पर 19 नवंबर 2025 की रात पुलिस उन्हें थाने ले गई, जहाँ हिरासत में उनके साथ गंभीर मारपीट की गई। इस कथित बर्बरता के बाद तरुण महतो की पत्नी ने हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिखा। अदालत ने उस पत्र पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू की, जो धीरे-धीरे राज्यभर में CCTV न लगाए जाने के व्यापक मुद्दे में बदल गई।
आम जनता और नागरिक अधिकारों पर असर
यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में पुलिस हिरासत में मौत के मामले बहस का केंद्र बने हुए हैं। सर्वोच्च न्यायालय भी कई अवसरों पर थानों में CCTV लगाने के निर्देश दे चुका है। झारखंड में अनुपालन न होने की यह स्थिति दर्शाती है कि न्यायिक आदेश और जमीनी हकीकत के बीच कितना बड़ा अंतर है।
नागरिक अधिकार संगठनों का कहना है कि CCTV की अनुपस्थिति हिरासत में अत्याचार के पीड़ितों के लिए साक्ष्य जुटाना लगभग असंभव बना देती है, जिससे जवाबदेही का पूरा तंत्र कमज़ोर पड़ता है।
क्या होगा आगे
15 अक्टूबर की सुनवाई में यदि तीनों अधिकारियों का जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया, तो अदालत औपचारिक अवमानना कार्रवाई शुरू कर सकती है, जिसमें दंड या जेल तक की नौबत आ सकती है। यह मामला झारखंड में पुलिस सुधारों और न्यायिक जवाबदेही की दिशा में एक अहम मोड़ साबित हो सकता है।