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जेपीएससी-जेएसएससी घोटाले का मास्टरमाइंड मिथिलेश सिंह फरार, ₹300 करोड़ की बेनामी संपत्ति का खुलासा

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जेपीएससी-जेएसएससी घोटाले का मास्टरमाइंड मिथिलेश सिंह फरार, ₹300 करोड़ की बेनामी संपत्ति का खुलासा

सारांश

जेपीएससी-जेएसएससी परीक्षा घोटाले का मुख्य मास्टरमाइंड मिथिलेश सिंह अब भी फरार है। सीआईडी जांच में ₹12-20 लाख प्रति अभ्यर्थी की वसूली, परीक्षा पोर्टल में डिजिटल हेरफेर और देशभर में ₹300 करोड़ से अधिक की बेनामी संपत्ति का खुलासा हुआ है। यह झारखंड की भर्ती प्रक्रिया पर सबसे बड़ा संकट है।

मुख्य बातें

मिथिलेश सिंह , ब्लैकलिस्टेड एजेंसियों वेबल और आईसीएन का निदेशक, जेपीएससी-जेएसएससी परीक्षा घोटाले का मुख्य मास्टरमाइंड बताया गया है।
उसने जेएसएससी सीजीएल सहित प्रमुख परीक्षाओं में अभ्यर्थियों को पास कराने के लिए प्रति परीक्षार्थी ₹12 लाख से ₹20 लाख तक वसूले।
गिरफ्तार आरोपी अभय तिवारी ने स्वीकार किया कि उसने अपने और परिवार के चयन के लिए मिथिलेश सिंह को कुल ₹36 लाख दिए।
जांच में देशभर में ₹300 करोड़ से अधिक की बेनामी संपत्ति — दिल्ली, मुंबई, पुणे, पटना, रांची सहित — का पता चला है।
मिथिलेश सिंह पर बिहार, पंजाब, राजस्थान और तेलंगाना में भी पेपर लीक मामलों में संलिप्तता का आरोप है और वह कथित तौर पर 4 बार जेल जा चुका है।
सीआईडी की विशेष टीम कई शहरों में उसकी तलाश में जुटी है।

झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) की भर्ती परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर धांधली के मामले में ब्लैकलिस्टेड एजेंसियों वेबल और आईसीएन के निदेशक मिथिलेश सिंह को इस पूरे सिंडिकेट का मुख्य मास्टरमाइंड पाया गया है। सीआईडी की विशेष जांच टीम उसके वित्तीय और डिजिटल नेटवर्क को खंगालने में जुटी है, जबकि वह अभी तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर है और उसकी तलाश में कई शहरों में टीमें रवाना की गई हैं।

मुख्य घटनाक्रम

जांच में गिरफ्तार अभियुक्तों से हुई पूछताछ के आधार पर यह सामने आया है कि मिथिलेश सिंह ने जेएसएससी सीजीएल और अन्य प्रमुख परीक्षाओं में अभ्यर्थियों को पास कराने के बदले प्रति परीक्षार्थी ₹12 लाख से ₹20 लाख तक की रकम वसूली थी। मामले के एक अन्य मुख्य आरोपी अभय तिवारी ने पूछताछ में स्वीकार किया कि उसने खुद, अपने भाई अक्षय तिवारी और पत्नी सुषमा कुमारी का चयन सुनिश्चित कराने के लिए मिथिलेश सिंह को कुल ₹36 लाख (प्रत्येक के लिए ₹12 लाख) दिए थे।

डिजिटल सेंधमारी और एजेंसियों की भूमिका

जांच में परीक्षा संचालन के दौरान अपनाए गए साठगांठ और डिजिटल हेरफेर के गंभीर तरीके सामने आए हैं। ब्लैकलिस्टेड एजेंसियों वेबल और आईसीएन को ओएमआर शीट की प्रोसेसिंग और प्रश्न-पत्र मुद्रण जैसे संवेदनशील कार्यों की जिम्मेदारी दी गई थी। दिल्ली से गिरफ्तार आईसीएन कर्मियों सुमांश प्रकाश और राहुल कुमार ने बताया कि वे निचले स्तर के निर्देशों पर काम करते थे, जबकि जेएसएससी अधिकारियों और आयोग के साथ सभी प्रमुख लेन-देन मिथिलेश सिंह स्वयं संभालता था। आरोप है कि उसने परीक्षा पोर्टल के बैक-एंड सॉफ्टवेयर में अनधिकृत बदलाव करवाकर अभ्यर्थियों के अंकों में हेरफेर किया।

₹300 करोड़ की बेनामी संपत्ति

जांच एजेंसियों के अनुसार, प्रश्न-पत्र लीक और धांधली से अर्जित काली कमाई के जरिए मिथिलेश सिंह ने देशभर में ₹300 करोड़ से अधिक की बेनामी संपत्ति खड़ी की है। सीआईडी की पड़ताल में दिल्ली, पटना, रांची, मुंबई, पुणे, राजस्थान और हरियाणा में उसके नाम पर बेनामी जमीन, आलीशान मकान, फ्लैट, होटल और व्यावसायिक संपत्तियों की जानकारी मिली है।

पुराना अंतरराज्यीय खिलाड़ी

मूल रूप से बिहार के भोजपुर (आरा) जिले का रहने वाला मिथिलेश सिंह अंतरराज्यीय स्तर पर परीक्षा घोटालों का पुराना खिलाड़ी बताया जा रहा है। वह इससे पहले बिहार, पंजाब, राजस्थान और तेलंगाना में हुई परीक्षाओं में गड़बड़ियों और पेपर लीक मामलों में संलिप्त रहा है और कथित तौर पर करीब 4 बार जेल जा चुका है। जांचकर्ताओं के अनुसार, उसने झारखंड में भी अन्य राज्यों में आजमाए गए इसी संगठित सिंडिकेट मॉडल को लागू किया।

आगे की जांच

सीआईडी की विशेष टीम मिथिलेश सिंह के पूरे नेटवर्क — वित्तीय लेन-देन, डिजिटल फुटप्रिंट और सहयोगियों — की परत-दर-परत पड़ताल कर रही है। यह मामला झारखंड की सरकारी भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है और आने वाले दिनों में और बड़े खुलासों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस राष्ट्रव्यापी सिंडिकेट मॉडल की परिणति है जो बार-बार जेल जाने के बावजूद नए राज्यों में नए अनुबंध हासिल करता रहा। असली सवाल यह है कि ब्लैकलिस्टेड एजेंसियों को संवेदनशील ओएमआर और प्रश्न-पत्र मुद्रण का ठेका किसने और किस आधार पर दिया — जो कि सीधे प्रशासनिक मिलीभगत की ओर इशारा करता है। ₹300 करोड़ की बेनामी संपत्ति यह भी बताती है कि यह केवल परीक्षा धांधली नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित वित्तीय अपराध है। जब तक भर्ती एजेंसियों के चयन में पारदर्शिता और तृतीय-पक्ष ऑडिट अनिवार्य नहीं होता, ऐसे सिंडिकेट दूसरे राज्यों में फिर सक्रिय होंगे।
RashtraPress
1 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मिथिलेश सिंह कौन है और जेपीएससी-जेएसएससी घोटाले में उसकी क्या भूमिका है?
मिथिलेश सिंह ब्लैकलिस्टेड परीक्षा संचालन एजेंसियों वेबल और आईसीएन का निदेशक है, जिसे जेपीएससी-जेएसएससी भर्ती परीक्षा घोटाले का मुख्य मास्टरमाइंड बताया गया है। सीआईडी जांच के अनुसार उसने अभ्यर्थियों से प्रति परीक्षार्थी ₹12 लाख से ₹20 लाख वसूले और परीक्षा पोर्टल के बैक-एंड में अनधिकृत बदलाव करवाए।
अभय तिवारी ने पूछताछ में क्या स्वीकार किया?
गिरफ्तार आरोपी अभय तिवारी ने सीआईडी पूछताछ में स्वीकार किया कि उसने खुद, अपने भाई अक्षय तिवारी और पत्नी सुषमा कुमारी का चयन सुनिश्चित कराने के लिए मिथिलेश सिंह को प्रत्येक के लिए ₹12 लाख, यानी कुल ₹36 लाख दिए। यह खुलासा पूरे सिंडिकेट की कार्यप्रणाली को उजागर करता है।
मिथिलेश सिंह की बेनामी संपत्ति कहाँ-कहाँ मिली है?
सीआईडी जांच में दिल्ली, पटना, रांची, मुंबई, पुणे, राजस्थान और हरियाणा में मिथिलेश सिंह के नाम पर बेनामी जमीन, आलीशान मकान, फ्लैट, होटल और व्यावसायिक संपत्तियाँ मिली हैं। जांच एजेंसियों के अनुसार इन संपत्तियों की कुल कीमत ₹300 करोड़ से अधिक आंकी गई है।
क्या मिथिलेश सिंह पहले भी किसी परीक्षा घोटाले में शामिल रहा है?
जांचकर्ताओं के अनुसार मिथिलेश सिंह बिहार, पंजाब, राजस्थान और तेलंगाना में परीक्षा गड़बड़ियों और पेपर लीक मामलों में पहले भी संलिप्त रहा है और कथित तौर पर करीब 4 बार जेल जा चुका है। उसने झारखंड में भी उसी अंतरराज्यीय सिंडिकेट मॉडल को दोहराया।
वेबल और आईसीएन एजेंसियों को परीक्षा का ठेका कैसे मिला?
जांच में यह सामने आया है कि ब्लैकलिस्टेड एजेंसियों वेबल और आईसीएन को ओएमआर शीट प्रोसेसिंग और प्रश्न-पत्र मुद्रण जैसे संवेदनशील कार्यों की जिम्मेदारी दी गई थी। दिल्ली से गिरफ्तार आईसीएन कर्मियों के अनुसार जेएसएससी अधिकारियों से सभी प्रमुख डीलिंग मिथिलेश सिंह स्वयं करता था, जो प्रशासनिक स्तर पर मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
राष्ट्र प्रेस
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