कर्नाटक पार्क संरक्षण संशोधन बिल वापस, विरोध के बाद सरकार का बड़ा फैसला
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक सरकार ने 3 सितंबर 2026 को कैबिनेट बैठक में कर्नाटक पार्क संरक्षण (संशोधन) विधेयक को वापस लेने का निर्णय लिया। यह कदम जनता, पर्यावरणविदों और विपक्षी दलों के व्यापक विरोध के बाद उठाया गया, जिन्होंने आशंका जताई थी कि यह संशोधन बेंगलुरु के हरे-भरे इलाकों को नुकसान पहुँचाएगा।
सरकार का रुख और घोषणा
उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने कैबिनेट बैठक के बाद कहा, 'सरकारी पार्कों की सुरक्षा के लिए एक कानून लाया गया था। विपक्षी दल इस मुद्दे पर चर्चा के लिए आगे नहीं आए। इसके बजाय उन्होंने जनता के बीच गलत संदेश भेजा। हमने बिल वापस ले लिया है और इस फैसले के बारे में राज्यपाल को सूचित करेंगे।' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बिल को अगले विधानसभा सत्र में चर्चा के लिए फिर से लाया जाएगा।
विधेयक में क्या था विवादास्पद
यह संशोधन विधेयक राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों से भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जनता दल (सेक्युलर) — JD(S) के कड़े विरोध के बावजूद पारित हुआ था। इसके बाद कांग्रेस सरकार ने इसे राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजा था। आलोचकों ने उस प्रावधान पर आपत्ति जताई थी जो सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए पार्क की पाँच प्रतिशत तक भूमि के उपयोग की अनुमति देता था।
सरकार की सफाई
मुख्यमंत्री के कानूनी सलाहकार और कांग्रेस विधायक ए.एस. पोन्नान्ना ने कहा कि इस प्रावधान को गलत तरीके से पेश किया गया। उनके अनुसार, संशोधन का वास्तविक उद्देश्य यह था कि जब भी किसी सार्वजनिक परियोजना के लिए पार्क भूमि की आवश्यकता हो, तो हर बार अलग से विधायी संशोधन की जरूरत न पड़े। पोन्नान्ना ने कहा, 'यह कहना गलत है कि पार्क की पाँच प्रतिशत जमीन का इस्तेमाल किया जाएगा। इसे तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है और प्रचार किया जा रहा है कि पार्कों को बेचा जा रहा है।'
पोन्नान्ना ने यह भी स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने संशोधन को लेकर जताई गई चिंताओं पर ध्यान दिया है और सरकार संविधान के अनुसार जिम्मेदारी से काम कर रही है।
पर्यावरणीय चिंताएँ
बेंगलुरु के पार्कों को शहर के 'फेफड़े' माना जाता है। पर्यावरणविदों और नागरिक संगठनों ने आशंका जताई थी कि पार्क भूमि के किसी भी हिस्से के वैकल्पिक उपयोग की अनुमति देने से शहर का हरित आवरण धीरे-धीरे सिकुड़ सकता है। यह ऐसे समय में आया है जब बेंगलुरु पहले से ही तेज़ शहरीकरण और घटते हरित क्षेत्रों की समस्या से जूझ रहा है।
आगे की राह
सरकार ने संकेत दिया है कि विधेयक को अगले विधानसभा सत्र में व्यापक चर्चा के साथ फिर से प्रस्तुत किया जाएगा। गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब किसी राज्य सरकार को सार्वजनिक दबाव के कारण पारित विधेयक वापस लेना पड़ा हो — यह लोकतांत्रिक जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।