केरल विधानसभा चुनाव: तीन प्रमुख मोर्चों में मुकाबला, स्थानीय निकाय चुनावों के रुझान का असर
सारांश
मुख्य बातें
तिरुवनंतपुरम, 15 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। केरल में 9 अप्रैल को विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं, और इस बार भी राजनीतिक मुकाबला तीन प्रमुख मोर्चों के बीच होने की संभावना है।
सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ), जिसकी अगुवाई सीपीआई (एम) कर रही है, विपक्षी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ), जिसका नेतृत्व कांग्रेस कर रही है, और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए), जिसकी कमान भाजपा के पास है।
केरल में कुल 140 विधानसभा सीटें हैं। 2021 के चुनाव में एलडीएफ ने 99 सीटें जीतीं, यूडीएफ को 41 सीटें मिलीं, और भाजपा ने कोई सीट नहीं जीती। 2016 में पार्टी ने पहली बार एक सीट पर विजय प्राप्त की थी।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राज्य में चुनाव का रुख अक्सर स्थानीय निकाय चुनावों के परिणामों से प्रभावित होता है, जो आमतौर पर कुछ महीने पहले आते हैं। यदि यह पैटर्न इस बार भी जारी रहता है, तो यूडीएफ को बढ़त मिल सकती है। उन्होंने हाल के स्थानीय निकाय चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया था, जिससे एलडीएफ दूसरी और भाजपा तीसरी स्थिति में रही।
पिछले दो दशकों में विधानसभा चुनाव में तीनों मोर्चों का प्रदर्शन हमेशा निकाय चुनावों के परिणामों से मेल खाता रहा है। जो मोर्चा स्थानीय चुनावों में बढ़त बनाता है, वह उसी प्रवृत्ति को विधानसभा चुनाव तक ले जाता है और सरकार बनाने की स्थिति में आ जाता है।
यह पैटर्न कई चुनाव चक्रों में देखा गया है। पंचायत, नगरपालिका और निगम स्तर पर जनमत अक्सर विधानसभा चुनाव से पहले के जनभावना का संकेत देता है।
एलडीएफ की अगुवाई मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन कर रहे हैं। एलडीएफ के लिए यह चुनाव तीसरी बार सत्ता बनाए रखने की चुनौती है, जो केरल के चुनावी इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। एलडीएफ ने 2021 में सत्ता में वापसी की थी और राज्य में लंबे समय से चल रही सरकार बदलने की परंपरा को तोड़ा था।
यूडीएफ का नेतृत्व विपक्ष के नेता वीडी सतीशन कर रहे हैं। यूडीएफ, एलडीएफ सरकार के खिलाफ एंटी-इंकम्बेंसी का फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस नेताओं का मानना है कि राज्य का राजनीतिक चक्र और स्थानीय चुनावों में दिखा जनमत सरकार बदलने के पक्ष में हो सकता है।
भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए के लिए यह चुनाव राज्य में अपनी राजनीतिक पहचान बढ़ाने का एक मौका है, क्योंकि अब तक उन्होंने वोट शेयर को विधानसभा सीटों में बदलने में सफलता नहीं पाई है।
गठबंधन इस बात की उम्मीद कर रहा है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में त्रिशूर में सुरेश गोपी की जीत से उनकी सक्रियता में वृद्धि होगी और यह उन्हें त्रिकोणीय मुकाबले में एक मजबूत खिलाड़ी बना सकता है।