कुल्लू का शरण गांव बना हथकरघा का केंद्र, महिला कारीगरों को ₹10–15 हज़ार मासिक आमदनी
सारांश
मुख्य बातें
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में नाग्गर क्षेत्र की रुम्सू पंचायत का शरण गांव आज पारंपरिक हथकरघा बुनाई का एक जीवंत केंद्र बन चुका है। वस्त्र मंत्रालय ने 2020 में इस गांव को आधिकारिक रूप से 'हथकरघा गांव' का दर्जा दिया था, जिसके बाद यहाँ की महिला कारीगरों के लिए रोज़गार और स्वावलंबन के नए द्वार खुले हैं। आज यहाँ की महिलाएँ प्रतिमाह ₹10,000 से ₹15,000 तक की आमदनी अर्जित कर रही हैं।
हथकरघा गांव का दर्जा कैसे मिला
वस्त्र मंत्रालय के एक सर्वेक्षण में सामने आया कि शरण गांव के लगभग 95 प्रतिशत घर पारंपरिक काठ-कुणी शैली में निर्मित हैं और यहाँ के अनेक परिवार पहले से ही हथकरघा बुनाई की परंपरा निभाते आए हैं। इसी आधार पर मंत्रालय ने इसे 2020 में 'हथकरघा गांव' घोषित किया। यह दर्जा न केवल एक सम्मान था, बल्कि सरकारी संसाधनों, प्रशिक्षण और बाज़ार से जुड़ाव का प्रवेश द्वार भी बना।
पीढ़ियों की कला, अब बाज़ार की ताकत
गांव की एक स्थानीय कारीगर ने बताया, 'हथकरघा बुनाई हमारे परिवार में पीढ़ियों से होती आई है। हम आमतौर पर 14–15 साल की उम्र में ही यह काम सीखना शुरू कर देते हैं।' पहले यहाँ बनने वाले पट्टू शॉल, टोपियाँ और ऊनी सामान केवल घरेलू उपयोग तक सीमित थे। अब ये उत्पाद बाज़ार में बिक रहे हैं और पर्यटकों के बीच खासे लोकप्रिय हो रहे हैं।
प्रशिक्षण और स्वयं सहायता समूह की भूमिका
2020 के आसपास 20 से 25 कारीगरों को 45 दिनों का विशेष प्रशिक्षण दिया गया। स्वयं सहायता समूह की सहायता से कारीगरों को हथकरघा भवन में एक दुकान का स्थान भी मिला। एक अन्य कारीगर ने कहा, 'पहले हम पट्टू सिर्फ अपने इस्तेमाल के लिए बनाते थे। हथकरघा भवन बनने और दुकान मिलने के बाद से अब हम इन्हें बिक्री के लिए भी बनाने लगे हैं। इससे हमारी आय का ज़रिया खुल गया है।'
पर्यटन से जुड़ाव और उत्पाद विविधता
अब शरण गांव में शॉल, स्टोल, पट्टू, मफलर और क्रोशिया उत्पाद बड़े पैमाने पर तैयार किए जा रहे हैं। कारीगर पर्यटकों की पसंद को ध्यान में रखकर डिज़ाइन तय करते हैं। एक महिला कारीगर ने कहा, 'ट्रेनिंग और हथकरघा सहयोग मिलने के बाद हमने शॉल, स्टोल, मफलर और क्रोशिया का सामान बनाना शुरू किया। इससे हमें बहुत फायदा मिला है। पहले जो काम करते थे, वह हम खुद के लिए बनाते थे, लेकिन अब इससे हमें इनकम भी मिल रही है।'
महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर
सरकार की इस पहल से शरण गांव की पारंपरिक कला को नई पहचान और बाज़ार का सहारा मिला है। घरों में चलने वाला काम अब वाणिज्यिक धारा से जुड़ चुका है। इससे न केवल महिलाओं को आत्मनिर्भरता मिली है, बल्कि गांव की समग्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई ऊर्जा मिली है। यह मॉडल हिमाचल के अन्य पारंपरिक शिल्प गांवों के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बन सकता है।