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कुल्लू का शरण गांव बना हथकरघा का केंद्र, महिला कारीगरों को ₹10–15 हज़ार मासिक आमदनी

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कुल्लू का शरण गांव बना हथकरघा का केंद्र, महिला कारीगरों को ₹10–15 हज़ार मासिक आमदनी

सारांश

कुल्लू का शरण गांव सिर्फ एक पहाड़ी बस्ती नहीं रहा — यह अब हथकरघा सशक्तिकरण की मिसाल है। वस्त्र मंत्रालय के 'हथकरघा गांव' दर्जे और 45 दिनों की ट्रेनिंग ने यहाँ की महिलाओं को पीढ़ियों की कला को आजीविका में बदलने का मौका दिया है।

मुख्य बातें

वस्त्र मंत्रालय ने 2020 में कुल्लू के शरण गांव को आधिकारिक 'हथकरघा गांव' घोषित किया।
मंत्रालय के सर्वेक्षण में पाया गया कि गांव के 95% घर पारंपरिक काठ-कुणी शैली में बने हैं।
20–25 कारीगरों को 45 दिनों का विशेष प्रशिक्षण दिया गया।
महिला कारीगर अब शॉल, स्टोल, पट्टू, मफलर और क्रोशिया उत्पाद बिक्री के लिए तैयार करती हैं।
प्रशिक्षण और दुकान मिलने के बाद महिलाओं की मासिक आमदनी ₹10,000 से ₹15,000 तक पहुँची।
स्वयं सहायता समूह की भूमिका से हथकरघा उत्पाद पर्यटक बाज़ार से जुड़े।

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में नाग्गर क्षेत्र की रुम्सू पंचायत का शरण गांव आज पारंपरिक हथकरघा बुनाई का एक जीवंत केंद्र बन चुका है। वस्त्र मंत्रालय ने 2020 में इस गांव को आधिकारिक रूप से 'हथकरघा गांव' का दर्जा दिया था, जिसके बाद यहाँ की महिला कारीगरों के लिए रोज़गार और स्वावलंबन के नए द्वार खुले हैं। आज यहाँ की महिलाएँ प्रतिमाह ₹10,000 से ₹15,000 तक की आमदनी अर्जित कर रही हैं।

हथकरघा गांव का दर्जा कैसे मिला

वस्त्र मंत्रालय के एक सर्वेक्षण में सामने आया कि शरण गांव के लगभग 95 प्रतिशत घर पारंपरिक काठ-कुणी शैली में निर्मित हैं और यहाँ के अनेक परिवार पहले से ही हथकरघा बुनाई की परंपरा निभाते आए हैं। इसी आधार पर मंत्रालय ने इसे 2020 में 'हथकरघा गांव' घोषित किया। यह दर्जा न केवल एक सम्मान था, बल्कि सरकारी संसाधनों, प्रशिक्षण और बाज़ार से जुड़ाव का प्रवेश द्वार भी बना।

पीढ़ियों की कला, अब बाज़ार की ताकत

गांव की एक स्थानीय कारीगर ने बताया, 'हथकरघा बुनाई हमारे परिवार में पीढ़ियों से होती आई है। हम आमतौर पर 14–15 साल की उम्र में ही यह काम सीखना शुरू कर देते हैं।' पहले यहाँ बनने वाले पट्टू शॉल, टोपियाँ और ऊनी सामान केवल घरेलू उपयोग तक सीमित थे। अब ये उत्पाद बाज़ार में बिक रहे हैं और पर्यटकों के बीच खासे लोकप्रिय हो रहे हैं।

प्रशिक्षण और स्वयं सहायता समूह की भूमिका

2020 के आसपास 20 से 25 कारीगरों को 45 दिनों का विशेष प्रशिक्षण दिया गया। स्वयं सहायता समूह की सहायता से कारीगरों को हथकरघा भवन में एक दुकान का स्थान भी मिला। एक अन्य कारीगर ने कहा, 'पहले हम पट्टू सिर्फ अपने इस्तेमाल के लिए बनाते थे। हथकरघा भवन बनने और दुकान मिलने के बाद से अब हम इन्हें बिक्री के लिए भी बनाने लगे हैं। इससे हमारी आय का ज़रिया खुल गया है।'

पर्यटन से जुड़ाव और उत्पाद विविधता

अब शरण गांव में शॉल, स्टोल, पट्टू, मफलर और क्रोशिया उत्पाद बड़े पैमाने पर तैयार किए जा रहे हैं। कारीगर पर्यटकों की पसंद को ध्यान में रखकर डिज़ाइन तय करते हैं। एक महिला कारीगर ने कहा, 'ट्रेनिंग और हथकरघा सहयोग मिलने के बाद हमने शॉल, स्टोल, मफलर और क्रोशिया का सामान बनाना शुरू किया। इससे हमें बहुत फायदा मिला है। पहले जो काम करते थे, वह हम खुद के लिए बनाते थे, लेकिन अब इससे हमें इनकम भी मिल रही है।'

महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर

सरकार की इस पहल से शरण गांव की पारंपरिक कला को नई पहचान और बाज़ार का सहारा मिला है। घरों में चलने वाला काम अब वाणिज्यिक धारा से जुड़ चुका है। इससे न केवल महिलाओं को आत्मनिर्भरता मिली है, बल्कि गांव की समग्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई ऊर्जा मिली है। यह मॉडल हिमाचल के अन्य पारंपरिक शिल्प गांवों के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बन सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह एक गांव तक सीमित सफलता है — हिमाचल प्रदेश में ऐसे दर्जनों पारंपरिक शिल्प गांव हैं जो अभी भी सरकारी मान्यता और बाज़ार से जुड़ाव की प्रतीक्षा में हैं। ₹10,000–15,000 की मासिक आमदनी एक सकारात्मक शुरुआत है, पर यह अभी भी न्यूनतम मज़दूरी के करीब है। असली परीक्षा यह है कि क्या यह मॉडल टिकाऊ है — जब पर्यटन का मौसम खत्म होता है, तो क्या माँग बनी रहती है? सरकार को चाहिए कि 'हथकरघा गांव' दर्जे को ई-कॉमर्स लिंकेज और निर्यात प्रोत्साहन से जोड़े, ताकि ये कारीगर मौसमी पर्यटन पर निर्भर न रहें।
RashtraPress
7 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शरण गांव को 'हथकरघा गांव' का दर्जा कैसे मिला?
वस्त्र मंत्रालय के सर्वेक्षण में पाया गया कि शरण गांव के लगभग 95% घर पारंपरिक काठ-कुणी शैली में बने हैं और यहाँ के अनेक परिवार पहले से हथकरघा बुनाई करते हैं। इसी आधार पर 2020 में मंत्रालय ने इसे आधिकारिक 'हथकरघा गांव' घोषित किया।
शरण गांव की महिला कारीगर कितना कमा रही हैं?
प्रशिक्षण और हथकरघा भवन में दुकान मिलने के बाद शरण गांव की महिला कारीगर अब प्रतिमाह ₹10,000 से ₹15,000 तक कमा रही हैं। पहले यही काम केवल घरेलू उपयोग तक सीमित था।
शरण गांव में कारीगरों को क्या प्रशिक्षण दिया गया?
2020 के आसपास 20 से 25 कारीगरों को 45 दिनों का विशेष हथकरघा प्रशिक्षण दिया गया। स्वयं सहायता समूह की मदद से उन्हें हथकरघा भवन में बिक्री के लिए दुकान का स्थान भी उपलब्ध कराया गया।
शरण गांव में कौन-से हथकरघा उत्पाद बनाए जाते हैं?
यहाँ शॉल, स्टोल, पट्टू, मफलर और क्रोशिया उत्पाद तैयार किए जाते हैं। कारीगर पर्यटकों की पसंद को ध्यान में रखकर डिज़ाइन तय करते हैं, जिससे उत्पादों की माँग बढ़ी है।
शरण गांव हिमाचल प्रदेश में कहाँ स्थित है?
शरण गांव हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में नाग्गर क्षेत्र की रुम्सू पंचायत में स्थित है। यह गांव अपनी पारंपरिक काठ-कुणी स्थापत्य शैली और हथकरघा बुनाई परंपरा के लिए जाना जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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