एनएससीएन-जीपीआरएन का आरोप: नागा मुद्दे पर भारत सरकार का 'दोहरा रवैया', 2015 फ्रेमवर्क एग्रीमेंट अधूरा
सारांश
मुख्य बातें
एनएससीएन/जीपीआरएन के सूचना एवं जनसंपर्क मंत्रालय (एमआईपी) ने 14 सितंबर 2026 को कोहिमा से एक विस्तृत प्रेस बयान जारी कर भारत सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। संगठन का कहना है कि सरकार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शांति और संवाद की पैरोकारी करती है, जबकि नागा राजनीतिक मुद्दे के जमीनी समाधान में कथित तौर पर विफल रही है।
ब्रिक्स और नागा मुद्दे की तुलना
बयान में हाल ही में नई दिल्ली में संपन्न 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का हवाला दिया गया, जिसमें भारत ने नई दिल्ली घोषणा-पत्र 2026 के ज़रिए बहुपक्षीय सुधार, संप्रभु समानता और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान जैसे सिद्धांतों का समर्थन किया था। एनएससीएन/जीपीआरएन का आरोप है कि इन्हीं मूल्यों को भारत सरकार नागा प्रश्न पर लागू करने से बच रही है — जो उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि और घरेलू नीति के बीच विरोधाभास को उजागर करता है।
2015 फ्रेमवर्क एग्रीमेंट: वादे और अमल में खाई
संगठन ने दावा किया कि 3 अगस्त 2015 को भारत सरकार और नागा पक्ष के बीच हस्ताक्षरित फ्रेमवर्क एग्रीमेंट में नागा लोगों के विशिष्ट इतिहास और राजनीतिक पहचान को स्वीकार किया गया था। हालांकि, संगठन का आरोप है कि हस्ताक्षर के एक दशक से अधिक समय बाद भी इस समझौते का पूर्ण क्रियान्वयन नहीं हो सका। बयान में आरोप लगाया गया कि सरकार राजनीतिक समाधान के बजाय सुरक्षा-आधारित दृष्टिकोण को तरजीह दे रही है।
मणिपुर संकट पर एनएससीएन/जीपीआरएन के आरोप
संगठन ने मणिपुर की स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि क्षेत्र में जातीय तनाव और संघर्ष को रोकने में सरकार नाकाम रही है। एनएससीएन/जीपीआरएन ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ सशस्त्र समूहों को अप्रत्यक्ष समर्थन देकर क्षेत्रीय अस्थिरता को और गहरा किया जा रहा है। गौरतलब है कि इन आरोपों पर भारत सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया इस बयान में शामिल नहीं की गई है।
शांति वार्ता को लेकर चेतावनी
संगठन ने बताया कि नागा पक्ष 1997 से शांति वार्ताओं में सक्रिय रूप से भाग लेता आया है और उसने लंबे समय तक धैर्य का परिचय दिया है। बयान में स्पष्ट चेतावनी दी गई कि यदि राजनीतिक संवाद की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी और दमनात्मक नीतियाँ जारी रहीं, तो शांति वार्ता की पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
मांग और आह्वान
बयान के अंत में एनएससीएन/जीपीआरएन ने सभी प्रकार के उपनिवेशवाद को समाप्त करने की माँग दोहराई और भारत सरकार से नागा राजनीतिक मुद्दे के शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में ठोस एवं ईमानदार कदम उठाने का आह्वान किया। यह ऐसे समय में आया है जब पूर्वोत्तर भारत में शांति प्रक्रिया को लेकर केंद्र और विभिन्न समूहों के बीच संवाद की रफ़्तार सुस्त बनी हुई है — और नागा समाधान की दीर्घकालिक अनिश्चितता एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श में केंद्र में आ गई है।