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पाकिस्तान का भूजल संकट: शासन विफलता और नीतिगत लापरवाही की कीमत चुका रहे करोड़ों लोग

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पाकिस्तान का भूजल संकट: शासन विफलता और नीतिगत लापरवाही की कीमत चुका रहे करोड़ों लोग

सारांश

पाकिस्तान का जल संकट भारत की नहीं, खुद की नीतिगत विफलताओं की देन है — यह रिपोर्ट का केंद्रीय निष्कर्ष है। 50 साल में एक भी बड़ा जलाशय नहीं, 15 लाख से ज़्यादा अनियंत्रित ट्यूबवेल और क्वेटा में छह महीने तक नल से पानी नहीं — शासन की असफलता का यह चेहरा बेहद गंभीर है।

मुख्य बातें

'यूरोपियन टाइम्स' की रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान का भूजल संकट प्राकृतिक कमी नहीं, बल्कि शासन विफलता और कुप्रबंधन का परिणाम है।
पाकिस्तान ने पिछले 50 वर्षों में पानी भंडारण के लिए एक भी बड़ा जलाशय नहीं बनाया।
देश में 15 लाख से अधिक ट्यूबवेल भूजल की अनियंत्रित निकासी कर रहे हैं।
पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि (IWT) स्थगित होने पर पाकिस्तानी सांसदों ने जल संकट के लिए भारत को दोषी ठहराया, जिसे रिपोर्ट ने ध्यान भटकाने की कोशिश बताया।
क्वेटा के कई इलाकों में लोगों को छह महीने तक नल का पानी नहीं मिला; महिलाओं और बच्चों को दूर से पानी लाना पड़ा।
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि किसी भी पाकिस्तानी सरकार ने संरचनात्मक सुधार लागू करने में गंभीरता नहीं दिखाई।

पाकिस्तान में गहराता भूजल संकट प्राकृतिक जल की कमी का नहीं, बल्कि दशकों की शासन विफलताओं, नीतिगत निष्क्रियता और संसाधनों के कुप्रबंधन का परिणाम है। 'यूरोपियन टाइम्स' की एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि सरकारी विभागों के बीच जिम्मेदारियों का अस्पष्ट बंटवारा, कमज़ोर नियमन और जवाबदेही की पूर्ण अनुपस्थिति ने पाकिस्तान के जल संकट को विकट रूप दे दिया है।

असली कारण क्या हैं

रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान लंबे समय से अपने जल संकट के लिए भारत, जलवायु परिवर्तन और बढ़ती जनसंख्या को दोषी ठहराता आया है। लेकिन रिपोर्ट इस तर्क को खारिज करती है और कहती है कि असली वजहें खराब नीतियाँ, प्रांतों के बीच पानी का असमान वितरण, जल चोरी और व्यापक भ्रष्टाचार हैं।

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि बड़ी नदियों और पर्याप्त भूजल संसाधनों के बावजूद असमान नहर वितरण, अक्षम सिंचाई व्यवस्था, भूजल का अनियंत्रित दोहन, निवेश की कमी और संस्थागत विफलताओं ने एक प्रबंधन समस्या को संकट में बदल दिया है।

सिंधु जल संधि और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि (IWT) को स्थगित कर दिया था। इसके बाद पाकिस्तान के कई सांसदों ने देश के जल संकट के लिए नई दिल्ली को जिम्मेदार ठहराना शुरू किया। हालाँकि रिपोर्ट इसे पाकिस्तान की अपनी नीतिगत विफलताओं से ध्यान हटाने की कोशिश बताती है।

रिपोर्ट के अनुसार इन विफलताओं के लिए भारत को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, और यह भावना पाकिस्तानी नीति-निर्माताओं के बीच आत्म-मंथन की कमी को उजागर करती है।

पाँच दशकों में एक भी बड़ा जलाशय नहीं

रिपोर्ट में एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है — पाकिस्तान ने पिछले 50 वर्षों में पानी के भंडारण के लिए एक भी बड़ा जलाशय नहीं बनाया। इसके साथ ही देश में 15 लाख से अधिक ट्यूबवेल भूजल की अनियंत्रित निकासी कर रहे हैं। सस्ती बिजली और बड़े पैमाने पर बिजली चोरी ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है।

रिपोर्ट के मुताबिक किसी भी सरकार ने इन समस्याओं के समाधान के लिए ठोस प्रयास नहीं किए, जिसका परिणाम कम कृषि जल उत्पादकता, जर्जर नहर प्रणाली, तेज़ी से घटता भूजल स्तर और कमज़ोर नियामक ढाँचे के रूप में सामने आया है।

क्वेटा: एक शहर जो प्यासा है

बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में जुलाई में भूजल स्तर खतरनाक रूप से नीचे चला गया। पाकिस्तानी अखबार 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' के अनुसार वाटर एंड सैनिटेशन एजेंसी (WASA) की जलापूर्ति कई इलाकों में पूरी तरह बंद या बेहद सीमित हो गई।

सरीआब, सिर्की रोड, समुंगली रोड, जिन्ना टाउन, कंबरानी रोड, सैटेलाइट टाउन, सब्जल रोड और खयाबान-ए-आगा जैसे इलाकों के निवासियों को पानी की भीषण किल्लत का सामना करना पड़ा। कई परिवारों को छह महीने तक नल का पानी नहीं मिला और महिलाओं, बुज़ुर्गों व बच्चों को दूर-दूर तक पैदल चलकर पानी लाना पड़ा।

स्थानीय निवासियों का आरोप है कि नियमित बिल भरने के बावजूद उन्हें पानी नहीं मिल रहा, और शिकायतों पर अधिकारियों की ओर से केवल आश्वासन ही मिलता रहा। यह स्थिति दर्शाती है कि शासन की विफलता का सबसे बड़ा बोझ आम नागरिक ही उठा रहे हैं।

आगे की राह

रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान की सरकार समय-समय पर जल प्रबंधन सुधारों की आवश्यकता स्वीकार करती रही है, परंतु आवश्यक सुधार लागू करने में बार-बार विफल रही है। जब तक जवाबदेही तय नहीं होती और संरचनात्मक सुधार नहीं किए जाते, भूजल संकट और गहराता जाएगा — और इसकी कीमत सबसे अधिक आम जनता को चुकानी होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

या यह संकट भी चुनावी नारों में सिमटकर रह जाएगा। क्वेटा जैसे शहरों में छह महीने तक पानी न मिलना बताता है कि नीतिगत जड़ता की कीमत सबसे पहले हाशिये पर खड़ा नागरिक चुकाता है।
RashtraPress
18 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पाकिस्तान का भूजल संकट इतना गहरा क्यों हो गया है?
'यूरोपियन टाइम्स' की रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान का भूजल संकट प्राकृतिक जल की कमी नहीं, बल्कि 50 वर्षों की नीतिगत निष्क्रियता, अनियंत्रित ट्यूबवेल दोहन, जर्जर नहर व्यवस्था और संस्थागत भ्रष्टाचार का नतीजा है। किसी भी सरकार ने संरचनात्मक सुधार लागू करने में गंभीर प्रयास नहीं किए।
क्या पाकिस्तान का जल संकट भारत की वजह से है?
रिपोर्ट इस दावे को खारिज करती है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा सिंधु जल संधि स्थगित किए जाने पर पाकिस्तानी सांसदों ने भारत को दोषी ठहराया, लेकिन रिपोर्ट कहती है कि यह पाकिस्तान की अपनी नीतिगत विफलताओं से ध्यान हटाने की कोशिश है और इन विफलताओं के लिए भारत को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
क्वेटा में जल संकट की स्थिति कितनी गंभीर है?
बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में जुलाई में भूजल स्तर खतरनाक रूप से नीचे चला गया, जिससे वाटर एंड सैनिटेशन एजेंसी (WASA) की आपूर्ति कई इलाकों में बंद हो गई। कई परिवारों को छह महीने तक नल का पानी नहीं मिला और महिलाओं व बच्चों को पैदल चलकर दूर से पानी लाना पड़ा।
पाकिस्तान में भूजल दोहन की समस्या कितनी बड़ी है?
रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में 15 लाख से अधिक ट्यूबवेल भूजल की अनियंत्रित निकासी कर रहे हैं। सस्ती बिजली और बिजली चोरी ने इस समस्या को और बढ़ाया है, जबकि पिछले 50 वर्षों में एक भी बड़ा जलाशय नहीं बनाया गया।
पाकिस्तान के जल संकट के समाधान के लिए क्या किया जाना चाहिए?
रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान की सरकार जल प्रबंधन सुधारों की ज़रूरत स्वीकार तो करती रही है, लेकिन उन्हें लागू करने में विफल रही। जल भंडारण क्षमता बढ़ाना, ट्यूबवेलों का नियमन, नहर व्यवस्था का आधुनिकीकरण और जवाबदेही का तंत्र बनाना ज़रूरी बताया गया है।
राष्ट्र प्रेस
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