संघर्षों से जूझकर पाना देवी बनीं महिलाओं की प्रेरणा, सफलता की नई कहानी लिखी
सारांश
मुख्य बातें
चूरू, ८ मार्च (राष्ट्र प्रेस)। कम उम्र में विवाह, जल्दी मां बनने की जिम्मेदारी, आर्थिक समस्याएं और दिव्यांगता जैसी चुनौतियों का सामना करते हुए अगर कोई महिला हार नहीं मानती, तो वह न केवल अपनी बल्कि कई अन्य लोगों की जिंदगी बदल देती है। चूरू जिले के आसपालसर गांव की पाना देवी ने अपने संघर्ष और मेहनत से ऐसा ही कर दिखाया है। आज वह न केवल खुद ग्रेजुएशन कर चुकी हैं, बल्कि क्षेत्र की अनेक महिलाओं को रोजगार देकर उन्हें आत्मनिर्भर बना रही हैं।
पाना देवी ने साझा किया कि उन्होंने अपने बचपन में केवल पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई की थी। उनकी शादी महज १२ साल की उम्र में हो गई थी। शादी के दो साल बाद वे ससुराल आ गईं और १५ साल की उम्र में उनके घर पहला बेटा हुआ। इसके तुरंत बाद दूसरा बेटा भी हुआ। कम उम्र में ही परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी उन पर आ गई थी।
घर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उन्हें नरेगा में काम पर जाना पड़ता था। दिव्यांग होने के बावजूद वे मिट्टी डालने और भारी काम करती थीं। उस समय उन्हें अक्सर लगता था कि अगर वे पढ़ी-लिखी होतीं, तो कागजी काम कर सकती थीं और इतनी कठिन मेहनत नहीं करनी पड़ती।
पढ़ाई की इच्छा ने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। शादी के बाद उनके पिता ने उन्हें आठवीं कक्षा तक पढ़ाया ताकि वे आंगनबाड़ी में काम कर सकें। हालांकि, आठवीं पास करने के बावजूद उनका चयन नहीं हो पाया।
वर्ष २०१६ में उनके जीवन में एक नई आशा लेकर राजीविका संस्था आई। आंध्र प्रदेश से आई टीम ने उन्हें इस संस्था से जोड़ा और वे समूह सखी बन गईं। यहां उन्हें २२५० रुपये का मानदेय मिलने लगा। इसके बाद उन्होंने एक लोन लेकर सिलाई मशीन खरीदी और सिलाई सीखना शुरू किया।
इसी दौरान उन्होंने ओपन बोर्ड से दसवीं कक्षा का फॉर्म भरा। पहली बार में वे सफल नहीं हो पाईं, लेकिन हार नहीं मानी। दूसरी बार में उन्होंने दसवीं कक्षा पास कर ली। इसके बाद उन्होंने १२वीं कक्षा भी पास की और आज ग्रेजुएशन पूरा कर लिया है।
राजीविका के माध्यम से उन्हें एक और बड़ा अवसर मिला, जब पांचवीं पास महिलाओं को नरेगा में मेठ बनने का मौका मिला। पहले जहां वे मजदूरी करती थीं, वहीं बाद में तीन साल तक मेठ के पद पर काम किया। इससे उनका आत्मविश्वास काफी बढ़ गया और उन्होंने तय किया कि अब वे गांव की अन्य महिलाओं को भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेंगी।
राजीविका से छोटे-छोटे लोन लेकर उन्होंने सेनेटरी नैपकिन बनाने का काम शुरू किया। शुरुआत में छोटी मशीन से काम होता था, जिसमें महिलाओं को घंटों मेहनत करनी पड़ती थी। इस समस्या को देखते हुए राजस्थान ग्रामीण विकास की अधिकारी दुर्गा ढाका ने तत्कालीन जिला कलेक्टर से अनुरोध किया। इसके बाद कलेक्टर ने अपने बजट से पाना देवी को बड़ी मशीन उपलब्ध करवाई। आज इस यूनिट में करीब २० महिलाएं मिलकर काम कर रही हैं।
पाना देवी ने गांव की महिलाओं को पढ़ाई के लिए भी प्रेरित किया। अब तक वे करीब ४० महिलाओं को पढ़ाई के लिए प्रेरित कर चुकी हैं। इनमें से १३ महिलाओं के ओपन बोर्ड के फॉर्म भी उन्होंने खुद स्कूल जाकर भरवाए।
पाना देवी ने कहा कि संघर्ष उनके जीवन का हिस्सा रहा है, लेकिन अब उन्हें संघर्ष से डर नहीं लगता। वे चाहती हैं कि गांव की हर महिला पढ़े, आगे बढ़े और आत्मनिर्भर बने। राजस्थान ग्रामीण विकास से जुड़ी अधिकारी प्रियंका चौधरी का कहना है कि पाना देवी की कहानी यह सिखाती है कि संघर्ष कितना भी बड़ा क्यों न हो, अगर हौसला और मेहनत साथ हो, तो सफलता जरूर मिलती है।