मैसूरु में PM मोदी ने किया विवेका स्मारक का उद्घाटन, CM शिवकुमार ने शॉल-गुलदस्ते से किया स्वागत
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार, 1 अगस्त 2026 को ऐतिहासिक नगरी मैसूरु पहुँचे, जहाँ उन्होंने रामकृष्ण आश्रम में स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक युवा केंद्र (विवेका स्मारक) का उद्घाटन किया। हेलीपैड पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने शॉल और गुलदस्ता भेंट कर प्रधानमंत्री का औपचारिक स्वागत किया।
उद्घाटन समारोह का महत्व
यह स्मारक स्वामी विवेकानंद की 1892 में मैसूरु यात्रा की स्मृति में निर्मित किया गया है — वह यात्रा जो 1893 में शिकागो की विश्व धर्म संसद में उनके ऐतिहासिक संबोधन से पूर्व की आध्यात्मिक परिक्रमा का अभिन्न अंग थी। रामकृष्ण विद्याशाला परिसर में स्थित यह केंद्र युवाओं को विवेकानंद के दर्शन और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने के उद्देश्य से स्थापित किया गया है।
कार्यक्रम में कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत भी उपस्थित रहे। उद्घाटन के पश्चात प्रधानमंत्री ने रामकृष्ण आश्रम स्कूल का भी दौरा किया।
अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था
प्रधानमंत्री के दौरे को देखते हुए मैसूरु को व्यावहारिक रूप से पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया। दक्षिण क्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक (आईजीपी) एम.बी. बोरलिंगैया की निगरानी में 1,000 से अधिक सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए।
सुरक्षा दल में 1 पुलिस कमिश्नर, 1 एसपी, 4 अतिरिक्त एसपी, 18 पुलिस इंस्पेक्टर, 40 सब-इंस्पेक्टर, 550 पुरुष पुलिसकर्मी, 350 महिला पुलिसकर्मी और 250 होमगार्ड शामिल थे। रामकृष्ण आश्रम, ओवल ग्राउंड, मैसूरु हवाई अड्डे और काफिले के समूचे मार्ग पर कड़ा पहरा लगाया गया।
वीवीआईपी आवागमन के लिए शहर की 12 प्रमुख सड़कों पर यातायात प्रतिबंधित रहा और कई मार्ग पूरी तरह बंद किए गए।
कार्यक्रम का क्रम
प्रधानमंत्री ने मैसूरु हेलीपैड पर उतरने के बाद सीधे रामकृष्ण आश्रम का रुख किया, जहाँ विवेका स्मारक और स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक युवा केंद्र का विधिवत उद्घाटन संपन्न हुआ। इसके बाद उन्होंने रामकृष्ण आश्रम स्कूल का भ्रमण किया और विशेष विमान से मैसूरु हवाई अड्डे से नई दिल्ली के लिए प्रस्थान किया।
विवेकानंद से मैसूरु का ऐतिहासिक नाता
गौरतलब है कि स्वामी विवेकानंद ने अपनी 1892 की भारत-परिक्रमा के दौरान मैसूरु में समय बिताया था। यह यात्रा उनके जीवन का वह निर्णायक दौर था जब उन्होंने पश्चिम में भारतीय अध्यात्म का प्रतिनिधित्व करने का संकल्प लिया — और अगले वर्ष 1893 में शिकागो की विश्व धर्म संसद में दिए गए उनके भाषण ने इतिहास रच दिया। इस दृष्टि से यह स्मारक केवल एक भवन नहीं, बल्कि उस आध्यात्मिक यात्रा का जीवंत स्मरण है।