PMEGP से उद्यमी बने सत्यम सुंदरम: ₹10 लाख के लोन से बांस कारोबार, 40 परिवारों को मिला रोज़गार
सारांश
मुख्य बातें
पूर्णिया के युवा उद्यमी सत्यम सुंदरम ने प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) के तहत बैंक से मिले ₹10 लाख के ऋण से बांस उत्पादों का कारोबार खड़ा किया, जिससे आज 40 परिवारों की आजीविका जुड़ी है। कोविड-19 महामारी के दौरान नौकरी छिनने और माता-पिता की गंभीर बीमारी में पारिवारिक जमा-पूंजी स्वाहा होने के बावजूद सत्यम ने हार नहीं मानी और अपनी MBA की पढ़ाई के दौरान उपजे पर्यावरण-अनुकूल व्यवसाय के विचार को ज़मीन पर उतारा।
संकट से उद्यमिता तक का सफर
बीसीए और MBA की डिग्री हासिल करने के बाद सत्यम को एक कंपनी में प्री-प्लेसमेंट ऑफर मिला था और नौकरी भी लग गई थी। लेकिन वर्ष 2020 में महामारी ने सब कुछ पलट दिया — माता-पिता दोनों गंभीर रूप से बीमार पड़ गए और उन्हें नौकरी छोड़कर पूर्णिया लौटना पड़ा। इलाज में परिवार की पूरी बचत खर्च हो गई और नौकरी भी जाती रही।
इसी मुश्किल दौर में एक समाचार पत्र के ज़रिये सत्यम को प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम की जानकारी मिली। उन्होंने असम और मणिपुर जाकर बांस उत्पादों के निर्माण और बाज़ार की संभावनाओं का गहन अध्ययन किया।
तीन हज़ार से शुरू, करोड़ों की संभावना
सत्यम ने शुरुआत में केवल ₹3,000 के बांस उत्पाद खरीदकर पूर्णिया में सड़क किनारे स्टॉल लगाया। करीब तीन महीने तक उन्होंने बाज़ार की नब्ज़ टटोली — और पाया कि पर्यावरण-अनुकूल बांस उत्पादों की माँग वास्तविक है। इसके बाद PMEGP के तहत बैंक से ₹10 लाख का ऋण मिला और उन्होंने अपनी कंपनी मणिपुरी बैंबू आर्किटेक्चर के नाम से उत्पादन केंद्र स्थापित किया।
आज उनके उत्पाद पूर्णिया, कटिहार, दानापुर और हाजीपुर सहित कई रेलवे स्टेशनों के स्टॉल के ज़रिये देशभर में पहुँच रहे हैं। सत्यम के अनुसार उनके उत्पाद अब विदेशों में भी भेजे जाने लगे हैं।
40 परिवारों की आजीविका का आधार
फिलहाल फैक्ट्री में 10 कारीगर — महिलाएं और पुरुष दोनों — काम करते हैं। इसके अलावा, कंपनी से उत्पाद लेकर अलग-अलग जगहों पर स्टॉल लगाने वाले लोगों को मिलाकर कुल 40 परिवारों की आजीविका इस कारोबार से जुड़ी बताई गई है।
कारीगर लवली ने बताया कि पहले वह मधुबनी पेंटिंग और कपड़े से जुड़े छोटे काम करती थीं, लेकिन परिवार का गुज़ारा मुश्किल था। फैक्ट्री से जुड़ने के बाद आर्थिक स्थिति सुधरी और अब वह अपने बच्चे को निजी स्कूल में पढ़ा पा रही हैं। वहीं चार साल से काम कर रहे कारीगर मुन्ना उरांव पहले टेंट हाउस में मिस्त्री का काम करते थे; अब बांस उत्पाद निर्माण में दक्षता हासिल कर चुके हैं और उनके बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं।
माँ का भरोसा और समाज की बदलती नज़र
सत्यम की माँ आशा अनुरागिनि ने बताया कि शुरुआत में परिवार और समाज में कुछ लोगों ने सवाल उठाए — 'एमबीए कराने के बाद बेटे से बांस का काम?' पिता, जो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं, भी शुरू में आशंकित थे। लेकिन आशा को बेटे के विचार पर भरोसा था। उन्होंने PMEGP के तहत मिले ऋण का उल्लेख करते हुए कहा कि इसी ने बेटे को आगे बढ़ने का अवसर दिया। आज वह गर्व से पुत्र की सफलता बताती हैं।
PMEGP की भूमिका और आगे की राह
सत्यम ने स्पष्ट कहा कि यदि प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत ऋण नहीं मिलता, तो उस कठिन दौर से निकलकर व्यवसाय शुरू करना बहुत मुश्किल होता। उन्होंने कहा कि बैंक ऋण ने न केवल आर्थिक सहायता दी, बल्कि मुश्किल समय में आत्मविश्वास भी दिया।
सत्यम का मॉडल अब उन लोगों के लिए भी अवसर बन रहा है जो कम पूंजी में अपना छोटा व्यवसाय शुरू करना चाहते हैं — वे उनसे उत्पाद खरीदकर स्टॉल लगाते हैं और आमदनी करते हैं। यह सफलता यह भी दर्शाती है कि सरकारी ऋण योजनाएं सही लाभार्थी तक पहुँचें तो ज़मीनी स्तर पर उद्यमिता की नई कहानियाँ लिखी जा सकती हैं।