पुर्तगाल में सार्वजनिक स्थलों पर चेहरा ढकने पर प्रतिबंध, उल्लंघन पर ₹3.35 लाख तक जुर्माना
सारांश
मुख्य बातें
पुर्तगाल के राष्ट्रपति एंटोनियो जोस सेगुरो ने 21 अगस्त 2026 को सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढकने पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून को लागू कर दिया। इस कानून का उल्लंघन करने पर 150 यूरो से 3,000 यूरो (लगभग ₹17,000 से ₹3.35 लाख) तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। यह कदम फ्रांस के बाद यूरोप में इस तरह का प्रतिबंध लागू करने वाला एक और बड़ा उदाहरण बन गया है।
कानून में क्या है
यह कानून सार्वजनिक स्थलों पर चेहरा छिपाने या पहचान रोकने के उद्देश्य से पहने जाने वाले किसी भी कपड़े पर प्रतिबंध लगाता है। यह प्रतिबंध लिंग, धर्म, आयु या मूल — किसी भी कारण से चेहरा ढकने पर लागू होता है।
हालाँकि, कानून में कुछ अपवाद भी रखे गए हैं। स्वास्थ्य, पेशेवर, कलात्मक या मौसम संबंधी कारणों से चेहरा ढकने की अनुमति होगी। इसके अलावा धार्मिक स्थलों, राजनयिक मिशनों और विमानों में भी यह प्रतिबंध लागू नहीं होगा।
संसद में कैसे पास हुआ विधेयक
स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह विधेयक धुर-दक्षिणपंथी चेगा पार्टी द्वारा लाया गया था और जुलाई में पुर्तगाल की संसद ने इसे सत्तारूढ़ दक्षिणपंथी गठबंधन तथा धुर-दक्षिणपंथी दलों के समर्थन से मंजूरी दी। सेंटर-राइट की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (PSD) ने भी इसका समर्थन किया।
वहीं, वामपंथी दलों ने इसके विरुद्ध मतदान किया। राष्ट्रपति सेगुरो ने विधेयक पर हस्ताक्षर करते हुए मंगलवार देर रात एक बयान में कहा, 'चेहरे को मानव पहचान और संचार का एक केंद्रीय तत्व माना जाना चाहिए।'
विरोध और कानूनी आशंकाएँ
इस कानून को लेकर व्यापक विरोध भी सामने आया है। पुर्तगाली बार एसोसिएशन, पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ऑफिस की हाई काउंसिल और पुर्तगाली महिला वकीलों के एसोसिएशन ने इस पर नकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की है और इसके असंवैधानिक होने की आशंका जताई है।
सेंटर-लेफ्ट की सोशलिस्ट पार्टी (PS), ग्रीन-लेफ्ट की लिवरे और पुर्तगाली कम्युनिस्ट पार्टी (PCP) ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए चेतावनी दी कि इससे इस्लामोफोबिया को बढ़ावा मिल सकता है।
PS ने कहा कि 'विधेयक के व्याख्यात्मक ज्ञापन में इस्लामोफोबिक उद्देश्य स्पष्ट था, जिस कट्टरपंथी माहौल में हम रह रहे हैं और इससे सीधे तौर पर निशाना बनाए जा रहे समुदायों के लिए जो जोखिम पैदा हो रहे हैं, वह निंदनीय है।' PCP ने तर्क दिया कि इस प्रस्ताव का महिला अधिकारों या सुरक्षा से कोई संबंध नहीं, बल्कि इसका मकसद नस्लवादी और जेनोफोबिक सोच को बल देना है।
फ्रांस से तुलना
गौरतलब है कि फ्रांस ने 2010 में संसद से इसी तरह का कानून पास किया था, जो अप्रैल 2011 से पूरे देश में प्रभावी हुआ। पुर्तगाल का यह कदम यूरोप में इस प्रवृत्ति को और मजबूत करता है, जहाँ सार्वजनिक पहचान और धार्मिक परिधान के बीच तनाव एक बड़ी राजनीतिक बहस बन चुका है।
आलोचकों का कहना है कि इस तरह के कानून मुस्लिम महिलाओं को विशेष रूप से प्रभावित करते हैं, हालाँकि कानून का पाठ धर्म-तटस्थ भाषा में लिखा गया है। आने वाले दिनों में इस कानून को संवैधानिक न्यायालय में चुनौती दिए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।