आरपीएफ स्थापना दिवस 2026: 1882 से 2026 तक रेलवे सुरक्षा बल का ऐतिहासिक सफर
सारांश
मुख्य बातें
रेलवे सुरक्षा बल (RPF) हर वर्ष 20 सितंबर को अपना स्थापना दिवस मनाता है — एक ऐसे बल की यात्रा, जो 1882 में रेलवे संपत्ति की रक्षा के लिए खड़ा हुआ था और आज 2026 में करोड़ों रेल यात्रियों की सुरक्षा का भरोसेमंद स्तंभ बन चुका है। नई दिल्ली से लेकर देश के सुदूर कोनों तक फैले विशाल रेल नेटवर्क की सुरक्षा का यह इतिहास उतना ही पुराना है, जितना भारत में रेलवे का इतिहास।
शुरुआत: 1854 से 1882 तक की पृष्ठभूमि
भारत में रेलवे सुरक्षा की चुनौतियों का पता 1854 तक लगाया जा सकता है, जब पूर्वी भारतीय रेलवे ने पुलिस अधिनियम-1861 लागू किया। उस दौर में निजी रेलवे कंपनियाँ अपने कुछ कर्मचारियों को 'पुलिस' के रूप में नियुक्त करती थीं, जो संपत्ति की निगरानी का काम करते थे।
रेलवे पुलिस समिति-1872 की सिफारिशों पर रेलवे पुलिस को 'सरकारी' स्वरूप दिया गया। 1882 तक आते-आते रेलवे में तैनात पुलिस बल का औपचारिक विभाजन हो गया — एक ओर 'सरकारी पुलिस' और दूसरी ओर 'निजी (कंपनी) पुलिस'। इसी वर्ष को रेलवे सुरक्षा बल के इतिहास का आरंभिक बिंदु माना जाता है, जब विभिन्न रेलवे कंपनियों ने अपनी संपत्तियों की सुरक्षा के लिए स्वतंत्र सुरक्षा दस्ते गठित किए।
मुख्य घटनाक्रम: 1940 से 1985 तक का संघर्ष और सुधार
1940 के दशक के मध्य तक रेलवे कंपनियों के अधीन कार्यरत 'वॉच एंड वार्ड' कर्मचारी संपत्ति और माल की चोरी रोकने में पर्याप्त रूप से सक्षम नहीं रहे। यह व्यवस्था 1954 तक जारी रही।
1954 में तत्कालीन खुफिया ब्यूरो के निदेशक की अध्यक्षता में गठित एक समिति ने 'वॉच एंड वार्ड' को एक वैधानिक निकाय के रूप में पुनर्गठित करने की सिफारिश की। इस सिफारिश के परिणामस्वरूप आरपीएफ अधिनियम-1957 अस्तित्व में आया, जिसने बल को पहली बार कानूनी आधार प्रदान किया।
स्वतंत्रता के बाद निजी रेलवे के पुनर्गठन से नौ क्षेत्रीय रेलवे ज़ोन बने। बढ़ती सुरक्षा जरूरतों को देखते हुए रेलवे संपत्ति (अवैध कब्जा) अधिनियम 1966 में पारित किया गया, जिसने रेलवे परिसर में अतिक्रमण और संपत्ति के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ऐतिहासिक बदलाव: 20 सितंबर 1985
यह ऐसे समय में आया जब रेल नेटवर्क पर यात्रियों और माल की आवाजाही तेज़ी से बढ़ रही थी और सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ जटिल होती जा रही थीं। संसद के माध्यम से आरपीएफ अधिनियम में संशोधन करके 20 सितंबर 1985 को रेलवे सुरक्षा बल को 'संघ के एक सशस्त्र बल' का दर्जा दिया गया।
इस ऐतिहासिक निर्णय से आरपीएफ के कामकाज में आमूलचूल परिवर्तन आया। बल को अब अन्य सुरक्षा एजेंसियों के साथ समन्वय में काम करने का अवसर मिला। राज्य पुलिस बलों की सहायता के लिए नियमित तैनाती ने इस बल को और परिपक्व किया। गौरतलब है कि यही 20 सितंबर की तारीख आरपीएफ के वार्षिक स्थापना दिवस के रूप में मनाई जाती है।
आम यात्रियों पर असर: संपत्ति से सुरक्षा तक का विस्तार
आरपीएफ की भूमिका का विस्तार केवल रेलवे संपत्ति की रखवाली तक सीमित नहीं रहा। वर्तमान में यह बल रेल यात्रियों — विशेषकर महिलाओं, बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों — की सुरक्षा सुनिश्चित करने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। मानव तस्करी रोकने, लावारिस सामान की पहचान करने और आपात स्थितियों में यात्रियों की सहायता करने जैसे कार्यों में बल का विश्वसनीय प्रदर्शन रहा है।
भारतीय रेलवे के विशाल नेटवर्क — जो दुनिया के सबसे बड़े रेल तंत्रों में से एक है — पर प्रतिदिन लाखों यात्री सफर करते हैं। ऐसे में आरपीएफ की उपस्थिति न केवल अपराध नियंत्रण बल्कि जन-विश्वास के निर्माण की दृष्टि से भी अपरिहार्य हो गई है।
क्या होगा आगे
20 सितंबर 2026 को आरपीएफ अपना 41वाँ स्थापना दिवस (1985 से गणना करने पर सशस्त्र बल के रूप में) मना रहा है। इस अवसर पर बल के सदस्य और उनके परिवार देशभर में विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लेंगे। रेलवे सुरक्षा की उभरती चुनौतियों — साइबर अपराध, स्टेशन परिसरों में सुरक्षा और तकनीकी निगरानी — के मद्देनज़र बल के आधुनिकीकरण की दिशा में निरंतर प्रयास जारी हैं।