जल जीवन मिशन घोटाला: महेश जोशी की गिरफ्तारी पर याचिका खारिज, राजस्थान हाईकोर्ट ने ACB की प्रक्रियागत खामियाँ उजागर कीं
सारांश
मुख्य बातें
राजस्थान हाईकोर्ट ने 18 जून 2026 को पूर्व मंत्री महेश जोशी की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी, साथ ही राजस्थान एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) और संबंधित विशेष न्यायाधीश की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रक्रियागत आपत्तियाँ दर्ज कीं। यह याचिका जोशी के पुत्र रोहित जोशी ने दायर की थी, जिसमें जल जीवन मिशन से जुड़े करोड़ों रुपये के कथित घोटाले में हुई गिरफ्तारी को असंवैधानिक बताया गया था।
मुख्य घटनाक्रम
मुख्य न्यायाधीश उमाशंकर व्यास और जस्टिस अशोक कुमार जैन की खंडपीठ ने अपने विस्तृत आदेश में स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में बताना संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत एक संवैधानिक अनिवार्यता है। अदालत ने पाया कि ACB इस मामले में ऐसा कोई दस्तावेज़ रिकॉर्ड पर प्रस्तुत नहीं कर सकी जो यह सिद्ध करे कि महेश जोशी को गिरफ्तारी के वास्तविक आधार लिखित रूप में दिए गए थे।
अदालत ने रेखांकित किया कि केवल कानूनी प्रावधानों का उल्लेख करना पर्याप्त नहीं है — 'गिरफ्तारी के आधार' और 'गिरफ्तारी के कारण' दो अलग-अलग कानूनी अवधारणाएँ हैं, और दोनों का अनुपालन अनिवार्य है।
ACB के जवाबों में विरोधाभास
हाईकोर्ट ने ACB के हलफनामों में स्पष्ट विरोधाभास नोट किया। एजेंसी ने पहले दावा किया कि गिरफ्तारी के आधार महेश जोशी को बताए गए थे, परंतु बाद में यह कहा गया कि यह जानकारी उनके परिवार को दी गई थी। अदालत ने टिप्पणी की कि बाद में प्रस्तुत किए गए अतिरिक्त तथ्य प्रथमदृष्टया 'मनगढ़ंत' प्रतीत होते हैं — यह एक असाधारण रूप से कड़ी न्यायिक भाषा है।
विशेष न्यायाधीश की कार्यवाही पर आपत्ति
हाईकोर्ट ने विशेष न्यायाधीश की कार्यप्रणाली पर भी कड़ी आपत्ति जताई। अदालत के अनुसार, 7 मई को रिमांड कार्यवाही के दौरान ही गिरफ्तारी की वैधता को लेकर आपत्ति दर्ज कराई गई थी, लेकिन विशेष न्यायाधीश ने उस आवेदन को तत्काल निपटाने के बजाय लगभग 31 दिनों तक लंबित रखा। अदालत ने इसे 'गंभीर लापरवाही' करार दिया।
याचिका खारिज होने का आधार
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूँकि महेश जोशी वर्तमान में न्यायिक हिरासत में हैं, इसलिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के माध्यम से उनकी प्रारंभिक पुलिस गिरफ्तारी की वैधता की जाँच नहीं की जा सकती। यही तकनीकी आधार याचिका खारिज करने का कारण बना — अदालत ने प्रक्रियागत खामियाँ स्वीकार करने के बावजूद राहत देने से मना कर दिया।
प्रशिक्षण और अनुपालन के निर्देश
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों और अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी से जुड़े अधिकारों पर उचित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। आदेश की प्रति मुख्य न्यायाधीश और गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को भेजने का निर्देश दिया गया, ताकि आवश्यक अनुपालन सुनिश्चित हो सके। यह मामला राजस्थान में भ्रष्टाचार-रोधी जाँच प्रक्रियाओं की संवैधानिक जवाबदेही को लेकर एक महत्त्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।