राम मंदिर चढ़ावा चोरी: सपा विधायक पल्लवी पटेल बोलीं — विरोध धर्म-अपमान नहीं, सरकार से जवाबदेही की माँग
सारांश
मुख्य बातें
समाजवादी पार्टी (सपा) की विधायक पल्लवी पटेल ने 1 अगस्त 2026 को स्पष्ट किया कि राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले को लेकर संसद परिसर में हुए विरोध प्रदर्शन का उद्देश्य सनातन धर्म का अपमान करना नहीं, बल्कि सरकार से पारदर्शी जवाब माँगना था। यह प्रतिक्रिया उस भाजपा के आरोप के बाद आई, जिसमें पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव पर धर्म के अपमान का इल्ज़ाम लगाया गया था।
सपा का रुख: जवाबदेही की माँग
पल्लवी पटेल ने कहा कि प्रदर्शनकारियों की भावनाएँ आहत हुई हैं और उनकी एकमात्र माँग यह है कि यदि राम मंदिर में चढ़ावे से जुड़ी कोई चोरी या गड़बड़ी हुई है, तो सरकार को सामने आकर स्पष्ट जवाब देना चाहिए। उन्होंने कहा, 'लोग अलग-अलग मंचों और तरीकों से अपनी आवाज़ सरकार तक पहुँचा रहे हैं और जानना चाहते हैं कि दोषियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाएगी।'
उन्होंने यह भी कहा कि जनता सिर्फ पारदर्शिता चाहती है — यदि जाँच चल रही है तो सरकार को उसकी स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए, ताकि अफवाहों और भ्रम की स्थिति न बने।
उत्तर प्रदेश चुनाव 2027 की तैयारी
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 पर बात करते हुए पल्लवी पटेल ने कहा कि आगामी चुनाव प्रदेश की राजनीति में नए समीकरण लेकर आएगा और कई पुराने राजनीतिक गठजोड़ बदल सकते हैं। उन्होंने बताया कि समाजवादी पार्टी अयोध्या में कार्यकर्ताओं के साथ संवाद कर संगठन की तैयारियों की समीक्षा कर रही है और जनता की समस्याओं को सरकार तक पहुँचाने की रणनीति पर चर्चा जारी है।
सपा विधायक कमाल अख्तर का भाजपा पर निशाना
सपा विधायक कमाल अख्तर ने भाजपा सरकार पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के करीब साढ़े नौ साल के कार्यकाल में समाज का हर वर्ग किसी न किसी समस्या से जूझ रहा है — बेरोज़गारी, महँगाई, किसानों की दुर्दशा और कानून-व्यवस्था जैसे अहम मुद्दे हैं, लेकिन सरकार इन पर चर्चा से बचती है।
अख्तर ने आरोप लगाया कि भाजपा ने चुनाव के दौरान जो वादे किए थे, वे पूरे नहीं हुए और अब जनता उन वादों का हिसाब माँगेगी। सनातन धर्म के अपमान के आरोपों पर उन्होंने कहा कि 'भाजपा किसी धर्म की ठेकेदार नहीं है — भारत में रहने वाला हर व्यक्ति अपने धर्म का सम्मान करना जानता है।'
आगे क्या होगा
राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में विपक्षी दलों का दबाव जारी है और सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। यह मामला 2027 के उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले एक राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दे के तौर पर उभरता दिख रहा है।