झारखंड हाईकोर्ट का अल्टीमेटम: 2018 से लापता गुमला बच्ची मामले में CBI जांच की चेतावनी

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झारखंड हाईकोर्ट का अल्टीमेटम: 2018 से लापता गुमला बच्ची मामले में CBI जांच की चेतावनी

सारांश

सात साल, कोई सुराग नहीं — और अब झारखंड हाईकोर्ट का अल्टीमेटम। 2018 से गुमला की एक बच्ची लापता है, SIT के बावजूद जांच ठप है। अदालत ने साफ कहा: अगली सुनवाई तक ठोस लीड नहीं तो CBI संभालेगी मामला। यह सिर्फ एक केस नहीं, झारखंड के बाल सुरक्षा तंत्र पर सवाल है।

मुख्य बातें

झारखंड हाईकोर्ट ने 5 मई 2026 को गुमला की 2018 से लापता बच्ची के मामले में पुलिस जांच पर कड़ी नाराजगी जताई।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने CBI जांच की चेतावनी दी।
SIT विभिन्न राज्यों में छानबीन कर रही है, लेकिन दक्षिण पूर्व रेलवे से माँगी गई ट्रैवल हिस्ट्री अब तक नहीं मिली।
20 अप्रैल की सुनवाई में भी हाईकोर्ट ने दो सप्ताह का अल्टीमेटम दिया था; DGP तदाशा मिश्र वर्चुअल पेश हुई थीं।
हाईकोर्ट लापता बच्चों के मामलों में आधार डेटा और SOP के प्रभावी उपयोग पर पहले भी जोर दे चुका है।

झारखंड हाईकोर्ट ने गुमला जिले से वर्ष 2018 में लापता हुई एक बच्ची के मामले में पुलिस जांच की धीमी रफ्तार पर 5 मई 2026 को एक बार फिर कड़ी नाराजगी जताई और स्पष्ट चेतावनी दी कि अगली सुनवाई तक कोई ठोस लीड न मिलने पर जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दी जाएगी। बच्ची की माँ द्वारा दायर हैबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने सात साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद किसी भी सुराग का न मिलना अत्यंत चिंताजनक करार दिया।

मुख्य घटनाक्रम

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने मंगलवार को हुई सुनवाई में राज्य सरकार और गुमला के पुलिस अधीक्षक से जांच की वर्तमान स्थिति पर जवाब तलब किया। गुमला के पुलिस अधीक्षक स्वयं अदालत में उपस्थित रहे और जांच की प्रगति से अवगत कराया, किंतु अदालत उनके जवाब से संतुष्ट नहीं दिखी। कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी की कि जब पुलिस इतने लंबे अरसे में बच्ची का पता नहीं लगा सकी, तो आगे की प्रगति को लेकर भी गंभीर संदेह उत्पन्न होता है।

सरकार का पक्ष और जांच की स्थिति

राज्य सरकार की ओर से दाखिल जवाब में बताया गया कि मामले की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (SIT) विभिन्न राज्यों में छानबीन कर रहा है। सरकार ने यह भी जानकारी दी कि वर्ष 2018 के दौरान बच्ची के संभावित यात्रा संबंधी विवरण जुटाने के लिए दक्षिण पूर्व रेलवे से संबंधित आयु वर्ग के यात्रियों की ट्रैवल हिस्ट्री माँगी गई थी, जो अब तक उपलब्ध नहीं कराई गई है। सरकार ने दावा किया कि पुलिस सभी संभावित पहलुओं पर काम कर रही है, लेकिन अदालत ने इस स्पष्टीकरण को अपर्याप्त पाया।

पूर्व सुनवाई में भी जताई थी नाराजगी

गौरतलब है कि इससे पूर्व 20 अप्रैल को हुई सुनवाई में भी हाईकोर्ट ने मामले में ढिलाई पर सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार को दो सप्ताह का समय दिया था और चेतावनी दी थी कि सार्थक प्रगति न होने पर मामला CBI को स्थानांतरित किया जा सकता है। उस सुनवाई के दौरान राज्य की पुलिस महानिदेशक तदाशा मिश्र वर्चुअल माध्यम से पेश हुई थीं। यह ऐसे समय में आया है जब झारखंड में लापता बच्चों के मामलों की संख्या को लेकर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं।

हाईकोर्ट का व्यापक निर्देश

उल्लेखनीय है कि झारखंड हाईकोर्ट पहले भी लापता बच्चों के मामलों में जांच की गति तेज करने, तकनीक के बेहतर उपयोग और आधार डेटा के प्रभावी इस्तेमाल के लिए मानक कार्यप्रणाली (SOP) तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दे चुका है। इसके बावजूद इस विशेष मामले में अब तक कोई ठोस सफलता नहीं मिल पाई है, जो न्यायपालिका की चिंता को और गहरा करता है।

आगे क्या होगा

अदालत की अगली सुनवाई में यदि पुलिस कोई ठोस प्रगति प्रस्तुत नहीं कर पाती, तो CBI जांच लगभग तय मानी जा रही है। यह मामला झारखंड में बाल सुरक्षा तंत्र और पुलिस जवाबदेही दोनों की कसौटी बन गया है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि झारखंड के पुलिस तंत्र की संरचनात्मक कमज़ोरी का आईना है। SIT गठन, रेलवे से डेटा अनुरोध जैसे कदम प्रक्रियागत तो लगते हैं, लेकिन जब दक्षिण पूर्व रेलवे वर्षों बाद भी ट्रैवल हिस्ट्री नहीं दे पाती, तो यह अंतर-विभागीय समन्वय की घोर विफलता है। हाईकोर्ट की CBI चेतावनी एक न्यायिक हस्तक्षेप से अधिक है — यह उस व्यवस्था पर अविश्वास की मुहर है जो बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में बार-बार चूकती है।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

झारखंड हाईकोर्ट ने गुमला लापता बच्ची मामले में क्या चेतावनी दी है?
झारखंड हाईकोर्ट ने 5 मई 2026 को स्पष्ट किया कि यदि अगली सुनवाई तक पुलिस कोई ठोस लीड प्रस्तुत नहीं कर पाती, तो जांच CBI को सौंप दी जाएगी। यह चेतावनी 2018 से लापता गुमला की एक बच्ची के मामले में बच्ची की माँ द्वारा दायर हैबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई के दौरान दी गई।
यह बच्ची कब और कहाँ से लापता हुई थी?
बच्ची झारखंड के गुमला जिले से वर्ष 2018 में लापता हुई थी। तब से सात साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद उसका कोई सुराग नहीं मिल पाया है।
मामले में SIT की जांच कहाँ तक पहुँची है?
राज्य सरकार के अनुसार गठित SIT विभिन्न राज्यों में छानबीन कर रही है। दक्षिण पूर्व रेलवे से 2018 के दौरान संबंधित आयु वर्ग के यात्रियों की ट्रैवल हिस्ट्री माँगी गई थी, जो अब तक उपलब्ध नहीं कराई गई है।
हाईकोर्ट ने इससे पहले इस मामले में क्या कदम उठाए थे?
20 अप्रैल की सुनवाई में भी हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को दो सप्ताह का समय देते हुए CBI ट्रांसफर की चेतावनी दी थी। उस सुनवाई में राज्य की पुलिस महानिदेशक तदाशा मिश्र वर्चुअल माध्यम से उपस्थित हुई थीं।
इस मामले का झारखंड में लापता बच्चों की समस्या से क्या संबंध है?
झारखंड हाईकोर्ट पहले भी लापता बच्चों के मामलों में आधार डेटा के प्रभावी उपयोग और SOP तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दे चुका है। यह मामला राज्य में बाल सुरक्षा तंत्र और पुलिस जवाबदेही दोनों की व्यापक चुनौती को उजागर करता है।
राष्ट्र प्रेस
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