सुप्रीम कोर्ट ने वारिस की फांसी की सजा बदली, 6 साल की सौतेली बेटी से रेप-हत्या में पूरी जिंदगी जेल का आदेश
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 24 सितंबर 2026 को अपनी छह साल की सौतेली बेटी का बार-बार यौन शोषण करने और गला दबाकर हत्या करने के दोषी वारिस की मौत की सजा को उसके शेष प्राकृतिक जीवन तक बिना किसी सजा माफी के उम्रकैद में बदल दिया। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि दोषसिद्धि पूरी तरह बरकरार है और यह मामला अत्यंत गंभीर प्रकृति का है।
मुख्य घटनाक्रम
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की तीन-सदस्यीय पीठ ने अभियोजन पक्ष के मामले को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302, 376(2)(एफ), 376(2)(एन), 376एबी और 201 के साथ-साथ पॉक्सो अधिनियम की धारा 5 और 6 के तहत संदेह से परे सिद्ध माना। पीठ ने कहा कि अपराध की गंभीरता निर्विवाद है, किंतु दोषी से जुड़ी परिस्थितियों और उसके सुधार की संभावना को ध्यान में रखते हुए मृत्युदंड को बनाए नहीं रखा जा सकता।
कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया, 'हमारा मानना है कि यह ऐसा मामला नहीं है, जिसमें मौत की सजा को बरकरार रखा जाना चाहिए।' IPC धारा 302 और धारा 376एबी के तहत दी गई मौत की सजा को शेष प्राकृतिक जीवन की बिना माफी वाली उम्रकैद में बदला गया, जबकि अन्य अपराधों के लिए दी गई सजाएँ और जुर्माना यथावत रखा गया। सभी मुख्य सजाओं को एक साथ चलाने का निर्देश भी दिया गया।
अपराध की प्रकृति और साक्ष्य
वारिस पर आरोप था कि उसने अपने ही घर के भीतर अपनी छह वर्षीया सौतेली बेटी का लगातार यौन शोषण किया और बाद में उस अपराध को छिपाने के लिए गला दबाकर उसकी हत्या कर दी। पीड़िता की माँ — दोषी की पत्नी — घर के भीतर हुई घटनाओं की एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पुष्टि हुई कि बच्ची की मृत्यु गला दबाने से दम घुटने के कारण हुई और शव पर यौन हमले के संकेत देने वाली चोटें भी पाई गईं।
सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट में पीड़िता की माँ से की गई जिरह के तरीके को लेकर भी सवाल उठाया गया था।
निचली अदालतों का फैसला
ट्रायल कोर्ट ने वारिस को दोषी ठहराते हुए IPC धारा 376एबी और धारा 302 के तहत मृत्युदंड सुनाया था। इसके बाद मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने दोषसिद्धि और मौत की सजा दोनों को बरकरार रखते हुए इस मामले को 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' यानी दुर्लभतम श्रेणी में रखा था। सर्वोच्च न्यायालय ने दोषसिद्धि की इस व्याख्या से असहमति नहीं जताई, किंतु सजा के निर्धारण में सुधार की संभावना के पहलू को भी जोड़ा।
सजा क्यों बदली — कोर्ट का तर्क
पीठ ने रेखांकित किया कि 14 साल बाद सजा में छूट की सामान्य संभावना वाली उम्रकैद इस मामले में न्याय के उद्देश्य को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होती, क्योंकि अपराध एक अभिभावक द्वारा किए गए दीर्घकालिक यौन शोषण और हत्या का था। इसीलिए कोर्ट ने बिना किसी माफी की संभावना के आजीवन कारावास का विकल्प चुना, जो सज़ा की कठोरता और दोषी की सुधार-संभावना — दोनों पहलुओं को संतुलित करता है।
यह ऐसे समय में आया है जब सर्वोच्च न्यायालय 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' सिद्धांत के अनुप्रयोग में सुधार की संभावना के मानक को अधिक स्पष्ट रूप से परिभाषित कर रहा है। गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में कोर्ट ने कई मामलों में इसी तर्ज पर मृत्युदंड को आजीवन कारावास में तब्दील किया है।
आगे की राह
अब वारिस को बिना किसी माफी के अपनी शेष आयु जेल में बिताना होगी। सभी सजाएँ एक साथ प्रभावी होंगी। यह मामला बाल यौन उत्पीड़न और पारिवारिक हिंसा के विरुद्ध न्यायिक दृष्टिकोण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण बनेगा।