नारायण साईं को सुप्रीम कोर्ट से झटका, दुष्कर्म मामले में सजा पर रोक से इनकार बरकरार
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार, 7 अगस्त 2026 को दुष्कर्म मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे नारायण साईं — स्वयंभू संत आसाराम के पुत्र — को बड़ा झटका दिया। न्यायालय ने गुजरात उच्च न्यायालय के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से स्पष्ट रूप से मना कर दिया, जिसमें साईं की सजा पर रोक लगाने की माँग को खारिज किया गया था। हालाँकि, न्यायालय ने गुजरात उच्च न्यायालय से अनुरोध किया कि वह साईं की लंबित आपराधिक अपील पर तीन महीने के भीतर निर्णय करने का प्रयास करे।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने साईं की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) का निपटारा करते हुए गुजरात उच्च न्यायालय से अनुरोध किया कि वह लंबित अपील पर शीघ्र, और यदि संभव हो तो तीन माह के भीतर, सुनवाई पूर्ण कर निर्णय सुनाए। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
साईं ने इस एसएलपी में 4 मई 2026 को गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें सजा पर रोक और जमानत की उनकी लगातार पाँचवीं अर्जी को खारिज किया गया था।
गुजरात उच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ
जस्टिस इलेश जे. वोरा और जस्टिस आर.टी. वछानी की खंडपीठ ने अपने 4 मई के आदेश में स्पष्ट कहा था कि 'हमारे लिए यह मानना मुश्किल है कि दोषी के बरी होने की अच्छी संभावना है।' न्यायालय ने यह भी कहा था कि गंभीर अपराध में दोषसिद्धि के बाद 'निर्दोष होने की धारणा समाप्त हो जाती है।'
उच्च न्यायालय ने साईं की उस दलील को भी खारिज किया जिसमें उन्होंने लंबे समय से जेल में बंद रहने का हवाला दिया था। न्यायालय ने कहा कि अपील के निपटारे में हुई देरी के लिए साईं स्वयं जिम्मेदार हैं, क्योंकि उन्होंने अंतिम सुनवाई पर जोर देने के बजाय बार-बार जमानत अर्जियाँ दाखिल कीं। खंडपीठ के अनुसार, 'रिकॉर्ड में है कि आरोपी अपील की सुनवाई के लिए कभी तैयार नहीं होता। दोषी ने खुद ही अपनी लंबी जेल की स्थिति पैदा की है।'
मामले की पृष्ठभूमि
सूरत की ट्रायल कोर्ट ने 30 अप्रैल 2019 को नारायण साईं को एक महिला भक्त के साथ बार-बार यौन उत्पीड़न करने का दोषी ठहराया था। उन्हें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376(2)(सी) (बलात्कार) और धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध) सहित विभिन्न धाराओं के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई गई। सभी सजाएँ एक साथ चलेंगी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता 2001 में सूरत आश्रम में आयोजित धार्मिक प्रवचनों के दौरान नारायण साईं के संपर्क में आई थी। उसने आरोप लगाया कि 2001 से 2004 के बीच बिहार, सूरत और गंभोई के विभिन्न आश्रमों में साईं ने उसका यौन उत्पीड़न किया। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, साईं के पिता आसाराम की गिरफ्तारी के बाद हिम्मत जुटाकर पीड़िता ने अक्टूबर 2013 में एफआईआर दर्ज कराई थी।
गुजरात उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट के इस निष्कर्ष को स्वीकार किया कि पीड़िता का बयान भरोसेमंद था और एफआईआर दर्ज करने में हुई देरी का कारण — साईं और उनके पिता का अनुयायियों पर गहरा प्रभाव — संतोषजनक रूप से स्पष्ट किया गया था।
गिरफ्तारी और न्यायिक प्रक्रिया
फरार रहने के बाद दिसंबर 2013 में दिल्ली पुलिस ने नारायण साईं को पंजाब-हरियाणा सीमा के निकट से गिरफ्तार किया था। तब से वे न्यायिक हिरासत में हैं। यह मामला ऐसे समय में उच्च न्यायिक ध्यान आकर्षित कर रहा है जब धार्मिक संस्थाओं में जवाबदेही को लेकर देशभर में बहस जारी है।
आगे की राह
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद अब गुजरात उच्च न्यायालय से अपेक्षा है कि वह साईं की आपराधिक अपील पर तीन महीने के भीतर सुनवाई पूर्ण करे। जब तक उच्च न्यायालय कोई भिन्न निर्णय नहीं देता, साईं की उम्रकैद की सजा यथावत जारी रहेगी।