तमिलनाडु: भूमि-उपयोग बदलाव में सुधार, जिला कलेक्टरों की जगह DTCP को मिला मंजूरी का अधिकार
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु सरकार ने 4 नवंबर 2026 को एक सरकारी आदेश जारी कर गैर-योजना क्षेत्रों में कृषि भूमि को गैर-कृषि उपयोग के लिए बदलने की मंजूरी प्रक्रिया में बड़ा बदलाव किया है। अब यह अधिकार जिला कलेक्टरों से हटाकर टाउन एंड कंट्री प्लानिंग निदेशालय (डीटीसीपी) को सौंप दिया गया है। आवास और शहरी विकास विभाग के इस फैसले से भूमि-उपयोग परिवर्तन की दो-चरणीय प्रक्रिया समाप्त हो गई है।
क्या बदला है मंजूरी की प्रक्रिया में
पहले, कोई भी डेवलपर या जमीन मालिक जो अपनी कृषि भूमि का उपयोग बदलना चाहता था, उसे पहले जिला कलेक्टर से पूर्व-सहमति लेनी पड़ती थी और उसके बाद डीटीसीपी से योजना की अनुमति लेनी होती थी। नई व्यवस्था में टाउन एंड कंट्री प्लानिंग निदेशक सीधे पूर्व-सहमति दे सकते हैं, जिससे यह दोहरी प्रक्रिया खत्म हो गई है।
यह बदलाव तमिलनाडु टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एक्ट, 1971 की धारा 47-ए और धारा 9-एफ में किए गए संशोधनों के जरिए लागू किया गया है, जिन्हें हाल ही में हुए विधानसभा सत्र में मंजूरी दी गई थी।
सुरक्षा नियम और दस्तावेज़ी शर्तें बरकरार
अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि पर्यावरण और भूमि से जुड़े सुरक्षा नियमों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। डीटीसीपी के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, आवेदकों को संबंधित विभागों से सभी ज़रूरी नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (एनओसी) लेना अनिवार्य रहेगा।
नई गाइडलाइंस के तहत आवेदकों को ऑनलाइन सिंगल विंडो पोर्टल के माध्यम से नौ दस्तावेज अपलोड करने होंगे — जिनमें मालिकाना हक या लीज के प्रमाण, पट्टा, चिट्टा और अडंगल रिकॉर्ड (पिछले तीन फसली वर्षों के), ड्रेनेज प्लान और प्रस्तावित स्थल के 500 मीटर के दायरे में मौजूद विकास कार्यों को दर्शाने वाला टोपोग्राफिकल मैप शामिल हैं। इसके अलावा एक शपथ-पत्र भी देना होगा, जिसमें यह पुष्टि करनी होगी कि संबंधित भूमि में कोई सरकारी पोराम्बोके जमीन या किसी अन्य व्यक्ति की संपत्ति शामिल नहीं है।
सरकार की मंशा और आधिकारिक बयान
आवास और शहरी विकास विभाग के सचिव आर. किर्लोश कुमार ने बताया कि इन संशोधनों का मुख्य उद्देश्य मंजूरी प्रक्रिया को अधिक कुशल और पारदर्शी बनाना है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 2017 के नियमों के नियम 6 — जिसके तहत जिला कलेक्टरों द्वारा अनिवार्य निरीक्षण होता था — को हटा दिया गया है, जबकि नियम 7 के तहत निर्धारित सुरक्षा उपाय पूर्ववत लागू रहेंगे।
यह फैसला तमिलनाडु सरकार की उस व्यापक नीति का हिस्सा है जिसका लक्ष्य भूमि-उपयोग नियमों को सरल बनाकर निवेश और विकास को बढ़ावा देना है। गौरतलब है कि यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब राज्य में रियल एस्टेट और बुनियादी ढाँचे के क्षेत्र में निवेश की माँग तेज़ी से बढ़ रही है।
निर्माण उद्योग की प्रतिक्रिया
बिल्डर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के प्रतिनिधियों ने इस फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि पहले मंजूरी प्राप्त करने में दो से तीन महीने का समय लग जाता था। नई प्रक्रिया के बाद यह अवधि घटकर 15 से 30 दिन रह जाने की उम्मीद जताई जा रही है, जिससे परियोजनाओं की लागत और देरी दोनों में कमी आएगी।
आगे क्या होगा
नई व्यवस्था के प्रभावी होने के बाद डीटीसीपी पर कार्यभार बढ़ने की संभावना है, क्योंकि अब वह पूर्व-सहमति और योजना की अनुमति — दोनों प्रक्रियाओं का केंद्र बन गया है। पर्यावरण विशेषज्ञों और कृषि भूमि संरक्षण से जुड़े समूहों की ओर से यह सुनिश्चित करने की माँग उठ सकती है कि केंद्रीकृत प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहे। तमिलनाडु के अन्य राज्य इस मॉडल को निकट भविष्य में ध्यान से देखेंगे।