यूपी कैबिनेट ने 4 एक्सप्रेसवे के 7 पैकेज मंजूर किए, एसीएस दीपक कुमार ने टेंडर गड़बड़ी के आरोपों को नकारा
सारांश
मुख्य बातें
उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने 27 अक्टूबर 2026 को चार प्रमुख एक्सप्रेसवे परियोजनाओं के सात पैकेज को मंजूरी दी, जिसके बाद सोशल मीडिया पर टेंडर प्रक्रिया में अनियमितता और कुछ कंपनियों को जानबूझकर अयोग्य ठहराने के आरोप उठने लगे। इन आरोपों पर अपर मुख्य सचिव (एसीएस) दीपक कुमार ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवेज़ इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी (यूपीडा) की ई-टेंडरिंग प्रक्रिया पूर्णतः पारदर्शी है और किसी के साथ किसी प्रकार का पक्षपात नहीं किया गया।
मंजूर किए गए पैकेज और परियोजनाएँ
एसीएस दीपक कुमार के अनुसार, कैबिनेट में स्वीकृत चार एक्सप्रेसवे परियोजनाओं में फर्रुखाबाद लिंक एक्सप्रेसवे (पैकेज-1 और पैकेज-2), आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे को पूर्वांचल एक्सप्रेसवे से जोड़ने वाली परियोजना, झाँसी लिंक एक्सप्रेसवे (पैकेज-1 और पैकेज-2) तथा जेवर लिंक एक्सप्रेसवे (पैकेज-1 और पैकेज-2) शामिल हैं। इस प्रकार कुल सात पैकेज स्वीकृत किए गए हैं। ये परियोजनाएँ राज्य की कनेक्टिविटी को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही हैं।
टेंडर दरों पर पहले आरोप का खंडन
सोशल मीडिया पर लगाया गया पहला आरोप यह था कि टेंडर दरें 5 से 7 प्रतिशत तक और नीचे जा सकती थीं। एसीएस दीपक कुमार ने इसका विस्तार से जवाब देते हुए कहा कि जब किसी परियोजना की अनुमानित लागत स्वीकृत की जाती है, उसी स्तर पर 5 प्रतिशत की कटौती पहले से की जाती है। उन्होंने उदाहरण दिया — यदि कोई विभाग 110 रुपए का प्रस्ताव लाता है, तो समितियों की समीक्षा के बाद उसे 100 रुपए किया जाता है और फिर उसमें से 5 प्रतिशत की और कटौती कर 95 रुपए के आधार पर टेंडर जारी किया जाता है।
इस आधार पर उन्होंने स्पष्ट किया कि फर्रुखाबाद लिंक एक्सप्रेसवे पैकेज-1 में दिखाई देने वाली -2.52 प्रतिशत की दर वास्तव में -7.52 प्रतिशत है, क्योंकि 5 प्रतिशत की कटौती पहले से शामिल है। इसी तरह पैकेज-2 में -0.26 प्रतिशत असल में -5.26 प्रतिशत है। शेष पैकेजों में क्रमशः -5.12, -7.46, -6.35, -6.01 और -9 प्रतिशत तक की वास्तविक कमी दर्ज की गई। दूसरे शब्दों में, टेंडर दरें अनुमानित लागत से 5.1 प्रतिशत से लेकर 9 प्रतिशत तक नीचे आई हैं।
तकनीकी अयोग्यता पर दूसरे आरोप का स्पष्टीकरण
दूसरा आरोप यह था कि कई बोलीदाताओं (बिडर्स) को तकनीकी आधार पर अनुचित तरीके से अयोग्य घोषित किया गया। एसीएस के अनुसार, टेंडर प्रक्रिया में कुल 16 बिडर्स ने भाग लिया था। उन्होंने कहा कि अयोग्यता के कई वैध आधार हो सकते हैं — निर्धारित मानकों को पूरा न करना, महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर बोली लगाना, या किसी राज्य अथवा एजेंसी द्वारा पहले से डिबार किए जाने की जानकारी न देना।
उन्होंने एक प्रतिष्ठित बिडर का उदाहरण देते हुए बताया कि उस संस्था ने यह नहीं बताया था कि उसे दो राज्यों में डिबार किया जा चुका है। शिकायत मिलने पर जाँच की गई और उसे अयोग्य घोषित किया गया। वह बिडर उच्च न्यायालय भी गया, लेकिन अदालत ने यूपीडा की कार्रवाई को सही ठहराया। इसके अलावा, कुछ बिडर्स से जुड़े अन्य राज्यों या राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की परियोजनाओं में संरचनात्मक विफलता के मामले — जैसे पुल या सड़क का ढहना — सामने आए, जिन पर जवाब संतोषजनक न पाए जाने पर संबंधित कंपनियों को अयोग्य घोषित किया गया।
वित्त मंत्री की प्रतिक्रिया
वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने भी इस विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि यूपीडा की टेंडर प्रक्रिया वर्षों से पूर्णतः पारदर्शी ई-टेंडरिंग प्रणाली पर आधारित है। उन्होंने कहा कि इसमें कोई भी पात्र व्यक्ति या संस्था भाग ले सकती है, और यदि कोई महत्वपूर्ण तथ्य छिपाकर प्रक्रिया में शामिल होती है या कहीं और डिबार होने की जानकारी देने से बचती है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जाती है।
आगे क्या होगा
एसीएस दीपक कुमार ने यह भी स्पष्ट किया कि यूपीडा की बिडिंग प्रक्रिया में किसी प्रकार का मानवीय हस्तक्षेप नहीं होता — वित्तीय बोलियाँ खुलने के समय सभी बिडर्स ऑनलाइन या भौतिक रूप से उपस्थित रहते हैं। उनके अनुसार, इन परियोजनाओं की प्रतिस्पर्धात्मक दरें पूर्व की एक्सप्रेसवे परियोजनाओं और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की परियोजनाओं से तुलना में भी बेहतर स्थिति में हैं। इन सात पैकेजों पर निर्माण कार्य आगे बढ़ने की उम्मीद है।